अंतिम प्रश्न अनीति का खात्मा है!

गांधी विश्व इतिहास की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है। वे गृहस्थ थे। महात्मा थे। वेदांती थे। राजनैतिक कार्यकर्ता थे। आंदोलनकारी थे। पत्रकार थे, लेखक थे, सत्याग्रही थे। व्यावहारिक दार्शनिक थे। वे विश्व इतिहास का आश्चर्य हैं। हम उन्हें भाषा और परिभाषा से नहीं पकड़ सकते। गांधी के जीवन और दर्शन पर हजारों पुस्तकें हैं। अनेक अंतर्राष्ट्रीय शोध हुए हैं, हो रहे हैं। गांधी जी अफ्रीकी नेता नेल्शन मंडेला की प्रेरणा थे। गांधी प्रत्येक देश में स्मरणीय हैं। मैंने युगांडा में नाईलो (नील) नदी के उद्गम पर गांधी की सुंदर मूर्ति का दर्शन स्वयं किया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा गांधी के प्रशंसक हैं। मार्टिन लूथर किंग गांधी के प्रशंसक थे। गांधी पुराण पुरुष जैसे हैं। उन्होंने सार्वजनिक जीवन को नए प्रतीक दिए। नया आकाश दिया। आकाश तक व्याप्त एक मर्यादा रेखा खींची। त्याग, विचार सादगी और शील की उस मर्यादा तक नहीं पहुंच सका। उन्होंने १९०९ में ‘हिंद स्वराज्य’ लिखी थी। पुस्तक सभ्यता दर्शन और संस्कृति पर गांधी का दृष्टिकोण है। पुस्तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक प्रतिष्ठित है। धम्म पद बौद्धों का आस्था ग्रंथ है। तिब्बती नेता सामदोंग रिपोछे ने इसकी तुलना ‘धम्म पद’ से की। ईसा मसीह का पहाड़ पर दिया गया प्रवचन ‘सरमन आन दि माउंट’ कहा जाता है। अमेरिकी विद्वानों ने हिंद स्वराज्य को ‘सरमन आन सी’ कहा था। हिंद स्वराज में पश्चिमी सभ्यता और संसद पर तीखी टिप्पणियां हैं।
गांधी जी सत्य प्रयोग के अभ्यासी थे। दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य से टकरा रहे थे। ब्रिटिश सभ्यता और संस्कृति को उसके ही मैदान में ललकार रहे थे। उन्होंने ब्रिटिश संसद को वेश्या कहा था। ब्रिटिश सत्ता बौखलाई थी। ‘हिंद स्वराज’ पर ब्रिटिश सत्ता ने प्रतिबंध लगाया था। मैंने स्वयं देखा है कि अब उसी ब्रिटिश संसद के परिसर में गांधी जी की विशाल मूर्ति है। वे ईश्वरनिष्ठ थे लेकिन ईश्वर को लेकर जिज्ञासु भी थे। भारतीय संस्कृति के शील आचार के अभ्यासी गांधी हिंदुस्थान के राष्ट्रपिता कहे गए। संयुक्त राष्ट्र ने २००७ में गांधी जन्मदिवस को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया था। भारतीय मुद्रा पर उनका चित्र है। धन व्यय करते समय गांधी का स्मरण फिजूलखर्ची रोकता है। उनकी १५०वीं जयंती पर हिंदुस्थान और विश्व में विशेष आयोजन चल रहे हैं।
शस्त्र बल यूरोपीय सभ्यता की शक्ति है। आत्मबल भारतीय सभ्यता का सार है। आत्मबल आत्मबोध का परिणाम है। गांधी जी ने इसे सभ्यता की मस्ती और खुमारी कहा है ‘सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है जो आत्मबल के कारण तोपबल से नहीं डरता। सच्ची मस्ती उसी को होगी जो समझता है कि हिंद की सभ्यता सबसे अच्छी है।’ यहां भारतीय सभ्यता की गहन समझ से ही आनंद प्राप्ति है। उन्होंने सभ्यताओं की तुलना की और लिखा ‘हिंदुस्थान की सभ्यता में नीति की मजबूती है, पश्चिम की सभ्यता का झुकाव अनीति को मजबूत करने की ओर है।’ हिंदुस्थान और भारतीयता गर्व करने लायक है। गांधी जी ने इसके पक्ष में एच.एस. मेन, विलियम हंटर आदि अनेक पश्चिमी विद्वानों के उदाहरण भी दिए थे। गांधी जी के विचार भारतीय अनुभूति का पेय व श्रेय हैं। उनके कर्म भारतीय सभ्यता का आधुनिक व्यवहार शास्त्र है। उन्होंने भोग और सदुपयोग की व्याख्या की थी। गांधी दृष्टि उपभोक्तावादी जीवन का संपूर्ण विकल्प भी हैं।
गरीबी आर्थिक होती है, मानसिक भी होती है। ‘हिंद स्वराज्य’ में ‘स्वैच्छिक गरीबी’ की चर्चा है, ‘जैसे भोगवाद से संयम ब्रह्मचर्य है वैसे ही उपभोक्तावाद से संयम स्वैच्छिक गरीबी का चयन है।’ यहां गरीबी का मतलब हिंसक उपभोक्तावाद से बचाव है। भौतिक साधन स्टेटस सिंबल माने जाते हैं। लेकिन उन्होंने आत्म संयम व सादगी को स्टेटस सिंबल बनाया। खादी, चरखा और त्याग गांधी समर्थकों के स्टेटस सिंबल बन रहे थे। गांधी जी के ऐसे आग्रह पिछड़ेपन भी कहे गए। लेकिन गांधी गहरे अनुभूतिकर्ता थे। गीत-संगीत जैसी कला विधाएं आधुनिक उपलब्धियां हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत देह से आत्मा की मधुर यात्रा है। गांधी जी ने लिखा था, ‘हम पर संगीत का बहुत प्रभाव पड़ता है। वेदों की रचना संगीत के आधार पर हुई जान पड़ती है। मधुर संगीत आंतरिक उद्विग्नता को शांत करता है। संगीत की शुद्ध शिक्षा मिले तो बच्चों का समय बचे।’ गांधी जी का ध्यान वैदिक मंत्रों की संगीतमय रचना पर था। वे सत्याग्रही होने के साथ ही सौंदर्यबोध से भी भरे-पूरे थे। गांधी ने ब्रह्मपुत्र नदी का वर्णन किया, ‘नदी की भव्य शांति मनोहर प्रतीत होती है। बादलों में छुपा चंद्र जल को प्रकाशित कर रहा है लेकिन मेरा मन अशांत है।’ परिवर्तनप्रेमी की चित्त अशांति स्वाभाविक है। गांधी के अशांत मन का परिणाम ही बड़ी उपलब्धियां हैं।
गांधी जी प्रकृति के गोचर प्रपंचों के प्रति गहन जिज्ञासु थे। उन्होंने १८९४ में अपने प्रश्नों की सूची बनाई थी ‘आत्मा क्या है? क्या वह कर्ता है? क्या उस पर कर्म का प्रभाव होता है? ईश्वर क्या है? क्या जगत्कर्ता है? मोक्ष क्या है? क्या देह में रहते हुए वह जाना जा सकता है? पढ़ने में आया है कि मृत्यु के बाद मनुष्य कर्मानुसार जानवरों की भी योनि धारण करता है। क्या यह सही है? आर्य धर्म क्या है? वेद किसने रचे? क्या अनादि हैं? अनादि का अर्थ क्या है? गीता किसने रची? ईसाइयों के अनुसार बाइबिल ईश्वर प्रेरित है? क्या ईशा ईश्वर के पुत्र थे? क्या अनीति का अंत होगा?’ अंतिम प्रश्न ‘अनीति’ का खात्मा है। शेष प्रश्न वैज्ञानिक जिज्ञासा हैं। वे पूरी जिजीविषा के साथ अनीति से ही टकरा रहे थे। उन्होंने गीता पर किताब लिखी। पुस्तक में प्रकृति पर जोर है। लिखा है ‘प्रकृति ही ब्रह्म है।’ लेकिन उन्होंने इस प्रत्यक्ष ब्रह्म के सामने भी समर्पण नहीं किया। उन्होंने १९१६ में अछूत समस्या पर कहा, ‘मैं नहीं मानता कि यह कलंक अनादि काल से चलाआ रहा है। अस्पृश्यता का शर्मनाक भूत हमारे इतिहास में तब आया होगा जब हम कालगति में पतन की पराकाष्ठा पर थे।’ गांधी अछूतोद्धार के लिए आजीवन सक्रिय रहे। उन्होंने ‘हरिजन’ नाम के अखबार के माध्यम से लगातार लोक जगाया।
गांधी जी ब्रिटिश सभ्यता के साथ ही वे ब्रिटिश संसदीय पद्धति के विरोधी थे। उनका स्वप्न था कि ‘सांसदों को संसद में भलाई के लिए जाना चाहिए। संसद को श्रेष्ठ काम करने चाहिए।’ कुछ विवेचक उनकी असफलताओं का उल्लेख करते हैं। वे खिलाफत आंदोलन में शामिल हुए। यह निर्णय गलत था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे स्वाधीनता आंदोलन में मुसलमानों का सहयोग चाहते थे। मई १९४७ में अरुणा आसफ अली ने उनसे पूछा ‘क्या पाकिस्तान का कोई विकल्प है?’ गांधी जी ने कहा कि इसका विकल्प अखंड हिंदुस्थान ही है।’ लेकिन हिंदुस्थान बंटा, पाकिस्तान अब आतंकी छावनी है। लेकिन दोष गांधी पर मढ़ना सही नहीं है। तत्कालीन नेतृत्व ही दोषी हैं। नेतृत्व हिंदुस्थान को अंग्रेजों द्वारा बनाया राष्ट्र मानता था। गांधी ने लिखा ‘यह धारणा अंग्रेजों की है। हिंदुस्थान अंग्रेजी राज के पहले भी राष्ट्र था।’ गांधी ने लोकमत के लिए इंडियन ओपीनियन जैसे तमाम अखबार निकाले। लेखन को रचनात्मक परिवर्तन का उपकरण बनाया। गांधी का व्यक्तित्व आकाशस्पर्शी है। गांधी किसी पद के अभिलाषी नहीं थे। चाहते तो बड़े मजे से प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनते। कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें राष्ट्रपति नहीं राष्ट्रपिता कहा।