अकेलेपन के अकाल में अधेड़

अकेलापन वर्तमान में जीवन की एक दुखद सच्चाई है। यह समस्या उन लोगों के साथ और भी अधिक होती है जो किन्हीं कारणों से उम्र बढ़ने के साथ अपनों से और समाज से दूर हो जाते हैं। २०१७ में एजवेल फाउंडेशन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार ४७.४९ प्रतिशत बुजुर्ग अकेलेपन से जूझ रहे हैं। बढ़ती आबादी के साथ हिंदुस्थान में भी अकेलेपन की महामारी शुरू हो गई है। जब हम बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार और हेल्थीr एजिंग की बात करते हैं तो सबसे पहले अकेलेपन की समस्या सामने आती है, जिसका समाधान सबसे पहले ढूंढ़ने की जरूरत है। इसके लिए कई कदम उठाया जाना चाहिए, जैसे कि सोशल सपोर्ट नेटवर्क बनाना, बुजुर्गोँ के लिए डेवेलपिंग अवेन्यू स्थापित करना ताकि वे उत्पादक तौर पर समाज के लिए कुछ कर सकें।
अकेलेपन का नुकसान
अकेलेपन से बुजुर्गों में डिप्रेशन की समस्या बढ़ती है और स्वास्थ्य बिगड़ते रहने की वजह से बार-बार डॉक्टर के चक्कर लगाने पड़ते हैं। एक अध्ययन यह बताता है कि अगर कोई व्यक्ति सामाजिक संबंधों में सक्रिय नहीं होता है तो उसे कोरोनरी हार्ट डिजीज और स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ जाता है। अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में बढ़ोत्तरी और घातक स्वास्थ्य समस्याओं जैसे कि डायबिटीज के खतरे को भी बढ़ाता है। २०१७ की एक रिसर्च बताती है कि अधिक सामाजिक सक्रियता जल्द मृत्यु के खतरे को ५० प्रतिशत तक कम करती है। इसी प्रकार के अन्य अध्ययन में पाया गया कि अकेलापन और सामाजिक दूरियां समय से पहले मृत्यु के खतरे को बढ़ाता है।
जापान की नेशनल ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क की रिपोर्ट के अनुसार २००९ में देशभर में ३२,००० बुजुर्गों की अकेले में मौत हो गई। हिंदुस्थान में भी, हम अक्सर अखबारों में ऐसी खबरें पढ़ते हैं कि विदेशों में रह रहे बच्चे बुजुर्ग मां-बाप से नियमित संपर्क नहीं कर पाते हैं और उनको एक दिन पता चलता है कि उनकी कई दिनों पहले अकेले में मौत हो चुकी है।
जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढ़ती है, वह सामाजिक रूप से खुद को अलग-थलग करने लगता है। शारीरिक क्षमताओं का संकुचन, परिवार पर निर्भरता के साथ-साथ आर्थराइटिस, डायबिटीज, दिल की बीमारियों आदि की शुरुआत उनके लिए सामाजिक अलगाव का कारण बन जाती है। चूंकि रिटायरमेंट व्यक्ति को कार्य से मुक्त कर देता है ऐसे में उनमें रक्त का संचार बेहद कम हो जाता है। ऐसे में अगर उनके जीवनसाथी, दोस्त और अन्य करीबियों की मृत्यु हो जाती है तो धीरे-धीरे वह और भी दुखी हो जाते हैं। शारीरिक रूप से कमजोर और दोस्तों से अलगाव के चलते वे अक्सर अकेला और डिप्रेस्ड महसूस करने लग जाते हैं।
यूएन पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) की २०१७ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०५० तक हिंदुस्थान की करीब २० प्रतिशत आबादी ६० साल की उम्र से ऊपर की होगी। ऐसे में हमें ऐसे प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है जिससे बढती उम्र की समस्याओं को नियंत्रित किया जा सके और बुजुर्ग आबादी के जीवन के इस चरण को खुशहाल बनाया जा सके।
उम्र बढ़ने के साथ-साथ स्वास्थ्य समस्याएं आती ही हैं, यह सोचकर बैठ जाना और एकदम से निर्भर हो जाना सही नहीं है। हमें लोगों को जागरूक करने की जरूरत है कि वे किस प्रकार से स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर, खान-पान अच्छा रखकर, शारीरिक फिटनेस और प्रिवेंटिव मेडिकल केयर पर ध्यान देकर बढती उम्र में भी स्वस्थ रह सकते हैं और खुद को दूसरों पर निर्भर होने से बचा सकते हैं। इस जागरूकता की शुरुआत युवा और अधेड़ के उम्र के लोगों को शिक्षित करने से हो सकती है ताकि वे आज से ही ऐसी जीवनशैली अपनाएं जिससे आगे चलकर उन्हें क्रोनिक और डेलिबरेटिंग बीमारियों का सामना न करना पड़े।