अच्छी नहीं ‘संगत की रंगत’

कठिन परिस्थितियों व विपरीत माहौल में रहकर भी कोई अगर सफलता की ऊंचाइयां छूता है तो उसके बारे में कहा जाता है कि ’कमल का पूâल तो कीचड़ में ही खिलता हैं’। कहने का तात्पर्य बेहद सरल व साफ है कि आपके आस-पास की स्थितियां, लोग चाहे जैसे भी हों अगर आपको निखरना है तो आपको कोई नहीं रोक सकता लेकिन ये अब बीते दिनों की बात है। समय धीरे-धीरे इतनी तेजी से पतन की ओर जा रहा है, जिसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब अपराध व उम्र का कोई मेल नहीं रहा यानी आपके अपने घर में बड़ी मासूमियत से पल रहा बच्चा कब अपराध की ओर अपने कदम बढ़ा ले, शायद इसका अंदाजा आपको भी न हो।
जी, यहां डरने नहीं संभलने की बात है। बात आपके अपने बच्चे पर सावधानीपूर्वक नजर रखने की है। सोसायटी के संगी-साथी, स्कूल या कॉलेज के दोस्त या सहेली। किन लोगों के साथ उसका उठना-बैठना है और आमतौर पर अमल में लानेवाली उसकी दिनचर्या हर चीज की जानकारी एक दोस्त की तरह आपके पास होनी भी जरूरी है। आज के दौर में नाबालिगों ने खतरे की घंटी बजा दी है।
बच्चे अपराधी क्यों बनते हैं, यह सब उनके जीवन में घटित होनेवाली कई बातों से संबंधित है, जो उन्हें अपराध की ओर प्रवृत्त करती है। वैसे तो बाल अपराधों के लिए समाज का संपूर्ण ढांचा ही उत्तरदायी है, जिसमें उनका व्यक्तित्व ढलता है पर अगर उसके मूल में जाएं तो उसके इर्द-गिर्द रहनेवालों से वह अधिक प्रभावित होता है पर कहते हैं न संगत या यूं कहे अच्छी संगत का प्रभाव बमुश्किल पड़ता है पर बुरी संगत को बड़ी आसानी से बच्चे अपने साचे में ढाल लेते हैं फिर बच्चे तो आखिर बच्चे होते हैं।
सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम से सिमटती जा रही दुनिया से ग्लैमर की दुनिया भी उनके करीब आ गई है, जिससे वे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। जीवनशैली में इस्तेमाल किए जानेवाले कपड़े, कार, आलीशान घर, रहन-सहन, शराब यह सब आकर्षण का केंद्र बन जाता है। फिर उस पर कलाकार, बड़ी हस्तियों की रोजमर्रा की घटनाओं की चर्चा फोटो व वीडियो उन्हें बौना बना देती है, तिस पर दोस्त भी वैसे मिल जाएं, जो एक मृगतृष्णा होती है, को पाने की ललक उनसे कुछ भी करवा सकती है, जिसे समाज ने एक शब्द दिया हुआ है ’अपराध’।
बच्चों में ज्यादातर अपराधों की शुरुआत संगत से ही होती है। शुरुआत घर में चोरी, बेवजह होनेवाले खर्च और मिलनेवाले जेब खर्च से मीलों का फासला। यह फासला तय करने के लिए एक बच्चा अपराध की सीढ़ियां दर सीढ़िया चढ़ता जाता है, पहले घर या विद्यालय में छोटी-मोटी चोरी से आगे कुछ करने की हिम्मत बच्चों में नहीं होती थी पर अब इसने विकराल रूप ले लिया है। चोरी, मारपीट, किडनेपिंग और अब तो विद्यालय से विद्यार्थी हत्या तक को अंजाम देने लगे हैं। हालांकि उसका प्रतिशत अभी नगण्य है पर शुरुआत ही काफी है किसी बदरंग समाज को बनाने की ओर इसी का आइना होता है हर घर में पल रहा बच्चा, वही जो आनेवाला कल का भविष्य है, उसकी छवि समाज की छवि बनेगी।
अपने आपको समाज के उच्चस्तर पर बनाए रखने के लिए पैसों के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है। बहुत जल्दी और आसानी से पैसा कमाने का लक्ष्य बच्चों को न जाने किस-किस गलत दिशा में ले जा रहा है। जुए की लत असामाजिक तत्वों से मेलजोल के बाद धूम्रपान, ड्रग्स की लत के बाद अपने चरित्र को दांव लगाने से भी अब लोग नहीं हिचकिचाते और यह कतई समझने की गलती न करें ऐसा सिर्फ पैसों के अभाववाले घरों में होता होगा? आजकल तो कई संपन्न घराने, उद्योगपति, नामी गिरामी व पढ़े-लिखे शिक्षित घरों के बच्चों को भी पैसों के लिए डगमगाते देखा गया है। रोमांचक लाइफस्टाइल जीने के लिए अपनी जान की बाजी तक बच्चे व युवा लगाने लगे हैं।
माना कि अपने खुद के घर में बच्चा बहुत अच्छी संगत में सुरक्षित रहता है पर जरा गौर कीजिए कि वह घर के बाहर कितनी देर व किसके बीच रहता है। उनके सही गलत होने का आप अंदाजाभर लगा सकते हैं। समाज या देश का यह काम नहीं है कि वह हर बच्चे पर नजर रखे, यह हमारा आपका काम है। नजर रखिए, उन पर क्योंकि अगर उनके कदम डगमगा रहे हैं तो उसके लक्षण भी दिखाई देंगे। जैसे बच्चा झूठ बोलने लगेगा। नजरें चुराकर बात करेगा। खान-पान व दिनचर्या अचानक से बदल जाएगी। पढ़ाई के नाम पर देर रात तक जागने की प्रक्रिया बढ़ेगी। फोन कॉल का आना-जाना बढ़ जाएगा। परिवार के सदस्यों से दूर होने लग जाएगा। अचानक से दोस्तों के नाम पर नए चेहरे दिखाई देने लगेंगे या तो वह बहुत गुस्से से व्यवहार करने लगेगा या फिर पूरी तरह शांत हो जाएगा। कुल मिलाकर व्यवहार में पूरी तरह से परिवर्तन आ जाएगा।
यहां यह भी बताना जरूरी है कि संगत का मतलब सिर्फ इंसानी संगत से न होकर भौतिक चीजों से भी है अर्थात बच्चा भले ही किसी से अधिक मेलजोल न रखता हो पर अकेले रहकर अकेलेपन की संगत टेलीविजन, कंप्यूटर, इंटरनेट के जरिए वह ई अपराध में आसानी से कदम रख सकता है तो अभिभावक सावधान हो जाइए, अपने मासूम अबोध बच्चों पर गलत संगत की रंगत न चढ़े।