अटल जी थे ‘अटल’

हो गई वाणी नि:शब्द
अश्रु आंखों से बह रहे।
हे विधाता तू ही बता,
अब दु:ख में कैसे हम सहें?
सूर्य थे वे, चांद थे वे
धूप में वे छांव थे।
उनके किस्से व चहेते,
हर गली, हर गांव में थे।
क्या बताएं किस कदर,
चाह उनकी थी बड़ी?
घंटों-घंटों दीदार खातिर,
भीड़ रहती थी खड़ी।
काल के कपाल पर,
लिख गए जो गीत ऐसा।
दूरदर्शी, शख्सियत की,
खासियत हरमीत जैसा।
लोकप्रियता के शिखर पर,
जो चले, चलते गए।
मानकों पर मानवीयता पर,
जो खरे उतरते गए।
क्या हुआ, कुछ यूं हुआ,
आज बिछुड़कर चल दिए।
जितना मिला जीवन उन्हें,
खूब जिए, हर पल जिए।
सेवाभावी भावना थी,
नेतृत्व क्षमता अद्वितीय।
अजातशत्रु, अनमोल, छवि
अमित, अजित, भारतीय।
शब्दों की जादूगरी से,
जो सदा थे खेलते।
विक्रमी, विशाल, हृदयी,
अटल निश्चय, स्वीकारते।
ऐसे मसीहा युग पुरुष को,
आखिरी संदेश प्रेषित।
आपका जाना खले, आने,
का फिर करें निश्चित।
हे कवि … मन सोचिएगा,
आइएगा… जरूर आइएगा।
-विद्यासागर यादव,
सानपाड़ा, नई मुंबई
पैâसले थे अटल
सर्वमान्य नेता।
महान राष्ट्रकवि।।
आजीवन अजातशत्रु।
युगपुरुष की छवि।।
उदारवादी व्यक्तित्व।
फैसले थे अटल।।
वाजपेयी अलविदा।
सदियों तक हलचल।।
-कृष्णेंद्र राय, मुंबई