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अनिद्रा, चिंता घबराहट व डिप्रेशन!

महामारी कोरोना वायरस के टेंशन से पूरी दुनिया में चिंता, डर, घबराहट व डिप्रेशन का जो दौर शुरू हुआ वो थमने का नाम नहीं ले रहा है। खुद के संक्रमित होने के डर की वजह से हिंदूस्थानियों की नींद उड़ गई है। दुनिया के अन्य देशों में भी घबराहट व डिप्रेशन के मामले बढ़े हैं। संक्रमण के डर से आत्महत्याएं बढ़ गई हैं। कुछ लोग अपने परिवार की सेहत को लेकर भी चिंतित हैं।
लगातार लॉकडाउन ने हिंदुस्थान में भले ही संक्रमण की दर कम की है पर कोरोना वायरस के साथ ही नहीं दिखाई देने वाली एक और मुसीबत बढ़ गई है। देश में २५ मार्च से लगे लॉकडाउन के पांचवे दिन ही स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा था कि कोरोना वायरस के डर और लॉकडाउन के चलते लोगों में मानसिक तनाव की खबरें मिल रही हैं।
आइसोलेशन या क्वारंन्टीन में रह रहे तथा दो महीने से ज्‍यादा समय से घर में बैठे लोगों में अकेलेपन, खालीपन और संक्रमण के डर के कारण डिप्रेशन और घबराहट की स्थिति पैदा हो रही है। एक शोध के मुताबिक हिंदुस्थान में १० फीसदी से ज्‍यादा लोग ऐसे हैं, जो कोरोना वायरस के डर के कारण ठीक से नींद भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। वहीं, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देशों में डिप्रेशन के मरीजों की संख्‍या तेजी से बढ़ रही है।
कोरोना संकट के दौर में लोगों को नींद नहीं आ रही है। लोग उदास और डरा हुआ महसूस कर रहे हैं। वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्गेनाइजेशन- डब्ल्यू एचओ की रिपोर्ट, कई यूनिवर्सिटी के शोध और मेडिकल जर्नल में पहले ही ये सामने आ चुका है कि इस दौरान लोग डिप्रेशन में जा रहे हैं। हिंदुस्थान में भी जैसे-जैसे कोरोना मरीजों की संख्‍या और मौत के मामले बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे लोगों में घबराहट भी बढ़ रही है।
नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के एक सर्वे में २८ज्ञ् लोगों ने स्वीकार किया कि कोरोना की वजह से लॉकडाउन में वे डिप्रेशन के शिकार हैं। उनके डिप्रेशन की सबसे बड़ी वजह कोरोना का डर है। यह डिप्रेशन पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा पाया गया है। बेरोजगार, अकुशल मजदूर, निम्न वर्ग में डिप्रेशन का औसत ज्यादा पाया गया।
इस स्टडी के बारे में सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन के प्रमुख डॉ. जुगल किशोर ने कहा कि इससे तो यह साफ हो गया कि कोरोना के डर और लॉकडाउन की वजह से लोग डिप्रेशन में हैं। चिंता की बात यह भी है कि यह डिप्रेशन निम्न वर्ग, बेरोजगार और अकुशल मजदूर में ज्यादा है। हालांकि, उनकी संख्या कम थी क्योंकि ऑनलाइन सर्वे की वजह से वे इसमें हिस्सा नहीं ले पाए। वरना, यह संख्या भी ज्यादा हो सकती थी। इस सर्वे को एक इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल ने प्रकाशित किया है।
डॉक्टर जुगल ने कहा कि सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ८९ पर्सेंट लोग सीवियर डिप्रेशन के शिकार पाए गए।
एशियन जर्नल ऑफ सायकाइट्री में प्रकाशित शोध के मुताबिक, हिंदुस्थान में १० फीसदी से ज्‍यादा लोग कोरोना वायरस के डर की वजह से पर्याप्त नींद भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। सर्वे के अनुसार हिंदुस्थान में ४० फीसदी लोग ऐसे हैं, जिनका दिमाग कोरोना का विचार आते ही अस्थिर हो जाता है। वे काफी देर तक इसके अलावा कोई दूसरी बात सोच ही नहीं पाते हैं दूसरी तरफ कोरोना संकट के बीच अपने परिवार की सेहत को लेकर बहुत ज्‍यादा चिंतित रहने वालों की संख्या ज्यादा है। सर्वे में शामिल ४१ फीसदी लोगों ने कहा कि अगर उनकी पहचान या उनके ग्रुप या उनके दफ्तर का कोई व्‍यक्ति बीमार होता है तो घबराहट कई गुना बढ़ जाती है। वहीं, घर के नजदीक किसी के संक्रमित पाए जाने पर तो हिम्‍मत ही जवाब दे जाती है। तब एक तरह से आंखों के सामने अंधेरा ही छा जाता है।
यहां पर यह भी ध्यान रखें कि डब्ल्यू एच ओ की २०१९ की एक रिपोर्ट के मुताबिक ७.५ फीसदी हिंदुस्थानियों को कोई ना कोई मानसिक रोग है। इनमें ७० फीसदी को ही इलाज मिल पाता है। इसी रिपोर्ट में कहा गया था कि २०२० में हिंदुस्थान की २० फीसदी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा। साथ ही बताया गया था कि हिंदुस्थान में उपलब्‍ध ४,००० विशेषज्ञों के लिए यह संख्या बहुत ज्यादा होगी। यानी कि कोरोना व लॉकडाउन हमारे देश के मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा घातक है।
हिंदुस्थान के अलावा अन्य देशों में भी हालत खराब है। अमेरिका में केजर फैमली फाउंडेशन के सर्वे में करीब ५० फीसदी लोगों का कहना था कि कोरोना वायरस उनके दिमागी संतुलन को खराब कर कर रहा है। फाउंडेशन ने १,२२६ लोगों पर ये सर्वे किया था। सर्वे में ४५ फीसदी व्‍यस्‍कों ने कहा कि महामारी उनके दिमाग पर नकारात्‍मक असर डाल रही है। वहीं १९ फीसदी का कहना था कि इससे उनके दिमाग पर बहुत बुरा असर हो रहा है। होम क्‍वारंटीन या क्‍वारंटीन सेंटर्स में रखे गए लोगों की हालत ज्यादा खराब नजर आई है।
ब्रिटेन में २३ मार्च को लॉकडाउन की घोषणा के अगले ही दिन डिप्रेशन और नर्वसनेस के मामलों में तेज उछाल दर्ज किया गया था। द गाजिर्‍यन की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में लोगों में अवसाद के ज्‍यादा मामले सामने आ रहे हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ शेफिल्ड और अल्सटर यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक लॉकडाउन के बाद यहां अचानक डिप्रेशन बढ़ गया है। दूसरे ही दिन ३८ फीसदी लोगों में डिप्रेशन और ३६ फीसदी लोगों में घबराहट के लक्षण सामने आए थे। जबकि लॉकडाउन की घोषणा से एक दिन पहले तक ब्रिटेन में डिप्रेशन के मामले १६ फीसदी और घबराहट के मामले १७ फीसदी ही थे। २,००० से ज्‍यादा लोगों पर किए गए इस शोध में पता चला कि सबसे ज्‍यादा डिप्रेशन के मामले ३५ साल से कम उम्र के लोगों में सामने आए थे यानी ज्‍यादा उम्र के लोग इसे डील करने में कुछ हद तक सक्षम होते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या इन दिनों घरों में कैद है। इन्हें अपनी नौकरी जाने का डर है, खुद और परिवार के लोगों को कोरोना होने का डर है, किसी ने अपनो को खोया है, कोई क्वारंटीन तथा आइसोलेशन में रहकर मानसिक रोगों का शिकार हो रहा है। अलग-अलग देशों की सरकारें लोगों में देखे जा रहे इस मानसिक डिप्रेशन को दूर करने के लिए अपने-अपने स्तर पर कोशिशें कर भी रही हैं।
बहरहाल कोरोनाकाल में अवसाद, चिंता, घबराहट, डर व मानसिक तनाव को दूर करने के लिए इससे जुड़ी कम से कम खबरें पढ़ें। ज्यादा खबरें पढ़ने से पैनिक अटैक होने की संभावना है। क्योंकि इनसे मन में नकारात्मक विचार आते हैं और बेचैनी सी महसूस होती है। आप खुद को और अपने आस-पास के लोगों को लेकर बेवजह भी परेशान हो सकते हैं। इस दौरान सोशल मीडिया पर भी कम से कम समय बिताएं। दरअसल सोशल मीडिया पर फेंक व अफवाह वाले मैसेजों की भी भरमार रहती है जिनका मन पर बुरा असर पड़ता है। लिहाजा सरकार और अन्य भरोसेमंद जरियों से मिलने वाली सूचनाओं को ही पढ़ें। सोशल मीडिया पर कम से कम वक्त बर्बाद करें। इसकी जगह पर अच्छी किताबें पढ़ें। अच्छी किताबें पढ़ने से आपको सकारात्मक ऊर्जा का एहसास होगा और आपके मन में किसी तरह का डर नहीं रहेगा। साथ ही आप घर की साफ सफाई कर सकते हैं। बागवानी को समय दे सकते हैं। आपको अच्छा लगेगा।
एक बात का ध्यान रहे कि सोशल डिस्टेंसिंग शब्द को गलत अर्थ में इस्तेमाल किया जा रहा है। सही शब्द फिजिकल डिस्टेंसिंग है। शारीरिक दूरी बनाइये। सामाजिक दूरी नहीं। यानी मित्रों, शुभचिंतकों, रिश्तेदारों आदि को फोन करके उनका हाल-चाल पूछते रहें और उन्हें यह एहसास कराते रहें कि इस मुश्किल घड़ी में आप उनके साथ हैं। इस तरह दूर रह कर भी आप खुद को अकेला नहीं महसूस करेंगे। चैट, वीडियो कॉल करके अपने विस्तारित परिवार से जुड़ें रहें। यह समझ लीजिए कि कोरोना महामारी जल्दी जाने वाली नहीं है। दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए जब भी मुमकिन हो प्रकृति और सूर्य की रोशनी में जाएं। योग, प्राणायाम, एरोबिक्स करें। संतुलित भोजन करें और खूब पानी पीएं।