अनिश्चितता के भंवर में कांग्रेस, मध्य प्रदेश में अध्यक्ष को लेकर घमासान

पिछले एक पखवाड़े से मध्य-प्रदेश में नया कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर जबरदस्त घमासान मचा है। अनुशासन की सभी मर्यादाएं लांघकर कांग्रेस की यह आपसी लड़ाई सरकार में मंत्रियों के भ्रष्टाचार को भी उजागार करने लग गई। फिलहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष हैं। उन्हीं की अध्यक्ष में प्रदेश १५ साल से निर्वासित कांग्रेस सत्तारूढ़ हुई है। कमलनाथ स्वयं अध्यक्ष पद छोड़ने की पहल कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और इसके पहले राहुल गांधी से कर चुके हैं। लेकिन अनिश्चय के भंवर में गोते खा रही कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व कोई निर्णय नहीं ले पा रहा है। लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना-शिवपुरी सीट से चुनाव हारने के बाद से लगातार कोशिश में हैं कि उन्हें पार्टी की नुमाइंदगी मिल जाए। इसके लिए वे पर्दे के पीछे रहकर ऐसा दांव खेल रहे हैं, जो उनके कद और गरिमा को छोटा कर रहा है। उनकी पाली के विधायक और मंत्री उन्हें कभी राष्ट्रीय अध्यक्ष, कभी प्रदेश अध्यक्ष तो कभी मुख्यमंत्री बना देने तक की अनुचित मांग कर डालते हैं। कुछ दिनों से यूट्यूब चैनलों पर ऐसे वीडियो भी आए हैं, जो सिंधिया को भाजपा में अपने निष्ठावान विधायकों के साथ जाते हुए दिखाकर उन्हें मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री अथवा केंद्र में राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के साथ रेल मंत्री तक बना देने की पैरवी कर रहे हैं। इन समाचारों का हास्यास्पद पहलू यह है कि इनका पुरजोरी से खंडन नहीं किया गया। साफ है, यह सब प्रायोजित रहा है। ये अटकलें तब और बढ़ गई थीं, जब अनुच्छेद-३७० हटाए जाने के बाद सिंधिया ने पार्टी लाइन के विपरीत इसे सही ठहराया था। हालांकि अब स्वयं सिंधिया ने इन अटकलों पर विराम लगा दिया है।
मध्य प्रदेश में लंबे मंथन और लंबे दौर की चर्चाओं के बाद फिलहाल अध्यक्ष का पेंच फंसा नजर आ रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का नाम इस पद के लिए आगे बढ़ने और फिर दिग्विजय सिंह द्वारा ही ग्वालियर में यह मंशा जताने की प्रदेश अध्यक्ष के लिए कोई युवा चेहरा सामने आना चाहिए। इस जुमले को उछालने के पीछे का रहस्य उनके द्वारा अपने पुत्र व मंत्री जयवर्धन सिंह को भी आगे लाया जाना हो सकता है? वैसे भी सिंह गोटियां इतनी चतुराई से चलते हैं कि यह समझना मुश्किल होता है कि इसकी मार किसे झेलनी होगी? हालांकि कांग्रेस में प्रदेश स्तर पर जितने भी गुट हैं, उन्होंने नए-नए नाम सामने लाकर कांग्रेस अध्यक्ष किसे बनाया जाए, इस गुत्थी को गहरा उलझा दिया है। कमलनाथ ने स्वयं गृहमंत्री बाला बच्चन, उमंग सिंघार और ओमकार सिंह मरकाम के नाम आगे बढ़ा दिए हैं। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह ने सहकारिता मंत्री डॉ. गोविंद सिंह और अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह का नाम आगे बढ़ाया है। सिंधिया ने भी अपने विकल्प के रूप में रामनिवास रावत को आगे किया है। ये सब नाम योग्यता से कहीं ज्यादा गुटीय राजनीतिक गुणा-भाग का हिस्सा हैं। अजय सिंह और रावत विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। रावत तो हाल ही में मुरैना से लोकसभा का चुनाव भी हारे हैं। इससे पता लगता है कि इनका अपने पारंपरिक क्षेत्रों में ही जनाधार घट गया है। अजय सिंह जब प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में विपक्ष के नेता थे, तब भी उनकी उपलब्धियां और पार्टी के लिए महत्व उल्लेखनीय नहीं रहा। अपनी मां से विवाद ने भी उनकी छवि खराब की है। लिहाजा डॉ. गोविंद सिंह और बाला बच्चन जरूर ऐसे नाम हैं, जो अध्यक्ष बनने की योग्यता रखते हैं। गोविंद सिंह विपरीत लहर में भी जीत का परचम फहराते रहे हैं जबकि उन्हें सिंधिया का कभी भी दमदार समर्थन नहीं मिला। क्षेत्र की समस्याओं पर भी उनकी गहरी पकड़ है।
दिग्विजय का नाम जरूर उनके अनुयायियों ने चलाया है लेकिन लगता नहीं कि वे इस पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करेंगे? हालांकि प्रदेश में एकमात्र दिग्विजय ऐसे नेता हैं, जिनकी पकड़ प्रत्येक विधानसभा के साथ सभी कस्बाई इलाकों में है। नर्मदा नदी की परिक्रमा करके उन्होंने न केवल अपने धुंधले पड़ गए कांग्रेसियों से संबंधों को पुनर्जीवित किया बल्कि कांग्रेस की जीत में भी उल्लेखनीय वातावरण बनाने का काम किया। एक तरह से कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उनकी यह धार्मिक आस्था के बहाने की गई यात्रा राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने का एक उपक्रम थी। दिग्विजय सिंह के पास अभी भी कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ा रहता है और वह हरेक अर्जी पर कार्रवाई करके कार्यकर्ता को आश्वस्त करते हैं। इसीलिए उन्होंने मंत्रियों से जबाव तलब भी किया है कि उन्होंने जो काम बताए हैं, उनके क्या नतीजे रहे? भोपाल से चुनाव हारने के बाद भी वे पूरी तरह सक्रिय हैं।
दूसरी तरफ सिंधिया हार के अवसाद से अभी तक उबर नहीं पाए हैं। उनके चेहरे की चिर-परिचित रौनक आज भी गायब है। यह उनकी इच्छाशक्ति की कमजोरी जताती है। सिंधिया दिल्ली में अपने कार्यकर्ताओं से भी खुले दिल और शीघ्रता से मिल नहीं रहे हैं। इस वजह से दूर-दराज के कार्यकर्ता उनसे दूरी बनाने की मानसिकता में आ गए हैं। सिंधिया के साथ संकट यह भी है कि उनके जितने भी विधायक और मंत्री हैं, उनमें से ज्यादातर अपनी गरिमा को बनाए नहीं रख पा रहे हैं। इसका अप्रत्यक्ष नुकसान सिंधिया को उठाना पड़ा है। सिंधिया के साथ दिक्कत यह भी है कि वे न तो कमलनाथ से और न ही दिग्विजय सिंह से तालमेल बिठा पा रहे हैं इसलिए जब भी सिंधिया को किसी अहम पद से नवाजने की बात उठती है तो गुटीय राजनीति प्रबल ढंग से उनके विरुद्ध उठ खड़ी होती है। सिंधिया को उनके नुमाइंदे विकास का मसीहा करार देते हैं लेकिन हकीकत यह है कि उनका परंपरागत गुना-शिवपुरी संसदीय क्षेत्र ही विकास के बहाने गड्ढों में तब्दील हुआ पड़ा है। यहां शुरू की गई सभी योजनाएं अधूरी हैं। इससे यह पता चलता है कि विकास का संबंध विदेश में पढ़कर ग्रहण की शिक्षा से कतई नहीं है। बहरहाल अध्यक्ष पद के इस घमासान को इस शर्त पर शांत करने की कवायद केंद्रीय नेतृत्व ने की है कि सिंधिया को प्रदेश सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद दे दिया जाए लेकिन सिंधिया को अब लंबी पारी खेलने के लिए अपने परिवार की पारंपरिक राजनीति से भी मुक्ति पानी होगी और खुले दिल से कांग्रेस कार्यकर्ताओं व गुटीय नेतृत्व से समन्वय बिठाना होगा। अन्यथा भाजपा और नरेंद्र मोदी के बड़े प्रभाव में उन्हें अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखना मुश्किल होगा।