अब ऑनलाइन भी हो रहा है श्राद्ध!

डिजिटल युग अब लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सुप्रभात से लेकर पूरी दिनचर्या और शादी-ब्याह के न्यौते और अब तो पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त करवाने जैसे श्राद्ध कर्म को भी लोग ऑनलाइन करवाने लगे हैं। दक्षिण मुंबई के बाण गंगा में इन दिनों सक्रिय रहनेवाले पंडा-पंडित भी अब ऑनलाइन श्राद्ध करवाने का ठेका यजमानों से ले रहे हैं। बोरीवली के एक डॉक्टर ने भी अपने पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया का सहारा लिया, ऐसा कहना है कांदिवली-पूर्व, ठाकुर विलेज में रहनेवाले पं. रामभुवन शास्त्री का।
शास्त्री जी कहते हैं कि दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई उपाय नहीं है। पितरों का श्राद्ध भादों पूर्णिमा से शुरू हो कर अश्विन अमावस्या तक मनाया जाता है। कहा जाता है कि जो लोग वर्षभर पूजा-पाठ नहीं करते, वे मात्र अपने पितरों का श्राद्ध कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्र कहता है कि ‘श्राद्धं न कुरुते मोहात तस्य रक्तं पिबन्ति ते’ अर्थात जो श्राद्ध नहीं करते, उनके पितर उनका खून पीते हैं यानी नाना प्रकार के कष्ट देते हैं।
शास्त्री जी कहते हैं कि यूं तो पितरों के श्राद्ध के लिए वर्ष में ९६ अवसर प्राप्त होते हैं लेकिन पितृपक्ष में श्राद्ध कर मनुष्य अपने पितरों की आत्मा को शांति दे सकता है। इन दिनों बनारस, गया, प्रयाग, नासिक, हरिद्वार, उज्जैन में लोग भारी संख्या में अपने पितरों को मोक्ष देने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं।
डिजिटल पिंडदान पर पं. रामभुवन शास्त्री कहते हैं कि एक दिन पहले ही मोबाइल पर यजमान को सामग्री लिखा दी जाती है। जिस दिन ऑनलाइन पिंडदान करना होता है, पंडित और यजमान दोनों अपने मोबाइल ऑन कर बैठ जाते हैं। पहले भगवान विष्णु की पूजा होती है, उसके बाद समस्त पितरों के नाम पर तर्पण किया जाता है। चावल के आंटे से १६ पिंड तैयार कराए जाते हैं।
समस्त पितरों के नाम से पिंडदान कराया जाता है। उसके बाद पिंड विसर्जन किया जाता है। पिंड विसर्जन के बाद यजमान स्नान कर पांच ग्रास गाय, कुत्ता, चींटी, कौआ तथा गरीब ब्राह्मण के लिए निकालकर रखता है। इस विधि के बाद ब्राह्मण भोजन तथा यथाशक्ति दक्षिणा का प्रावधान है। ऑनलाइन पूजा करानेवाला यजमान पंडित के बैंक खाते में दक्षिणा जमा कर देता है।