अब युद्धनौका ही भेजो!, असल में ‘असली’ खूनी को ढूंढ़ो!!

दाभोलकर, पानसरे, गौरी लंकेश और कलबुर्गी के खूनी (मतलब असली) कब पकड़े जाएंगे, दुनिया के सामने यह गहन प्रश्न है। पुलिस, विशेष जांच दल, सीबीआई और उच्च न्यायालय भी जांच में सक्रिय है। जैसे ‘सामना’ फिल्म में ‘मारुति कांबले का क्या हुआ?’, यह प्रश्न पूछा गया। इसी प्रकार इन विचारकों का खून किसने किया? यह जटिल प्रश्न है। इन सभी महत्वपूर्ण लोगों का खून हो गया और उनका खूनी पकड़ा ही नहीं जा रहा। ये हत्याएं दिन-दहाड़े हुई हैं और अब तक ‘खूनी पकड़ा गया होऽऽऽ’ ऐसा दावा करते हुए कम-से-कम पांच-पच्चीस खूनी कई विभागों द्वारा पकड़े गए। इन हत्याओं के बाद हुए गिरफ्तार लोगों ने आरोप कबूल कर लिया और हत्यारे पकड़े गए। सूत्रधार और अन्य संबंधित चीजें भी मिल गर्इं, ऐसा कहा गया। लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही ‘खूनी’ के जेल में रहते हुए उसी कांड में दूसरे किसी ‘खूनी’ को पकड़ा जाता है। ऐसे करीब ५० हत्यारों ने ‘मैंने ही खून किया है’ की स्वीकारोक्ति की है। उसी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए हैं और मामले का पर्दाफाश होने की घोषणा जांच दलों ने की है। अब न्यायालय का निरीक्षण आया है कि ‘दाभोलकर, पानसरे, पत्रकार गौरी लंकेश और कलबुर्गी की हत्या करके इस हत्या के मुख्य सूत्रधारों ने बहुसंख्यकों के मतों से असहमति दर्शानेवाले और उनका विरोध करनेवालों की ‘आवाज’ बंद कर दी जाएगी, ऐसा संदेश समाज को दिया है।’ यह न्यायालय का निरीक्षण है और उनके निर्देश का आदर करना चाहिए। लेकिन ऐसी स्वतंत्र और सूक्ष्म निरीक्षण दूसरे लोगों के भी हो सकते हैं। मूलत: मतभेदों की आवाज मतलब क्या? मतभेद का मामला क्या था और इन लोगों ने ऐसा कौन-सा क्रांतिकारी विचार व्यक्त किया था कि उसके कारण महाराष्ट्र के बहुसंख्यकों के मन को चोट पहुंची। इस पर न ही मृतकों के परिजनों ने प्रकाश डाला और न ही हमारे प्रिय न्यायालय ने। दाभोलकर ने कोई नया विचार व्यक्त नहीं किया था। वे अंधश्रद्धा निर्मूलन का अच्छा काम कर रहे थे। लेकिन दाभोलकर ही ऐसा काम करनेवाले अकेले नहीं थे। महाराष्ट्र की परंपरा रूढ़िवादिता और अंधश्रद्धा के विरोध में लड़ने की रही ही है। गाडगे महाराज अंधश्रद्धा के विरोध में खड़े हुए। लेकिन साथ ही धर्म की खोखली संकल्पना और रूढ़ियों से भी लड़े। इसके कारण महाराष्ट्र में किसी ने उनकी हत्या नहीं की। ‘सुधारक’ आगरकर, महात्मा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहू महाराज, तुकडोजी महाराज और प्रबोधनकार ठाकरे की अंधश्रद्धा से लड़ाई दिवंगत दाभोलकर की अपेक्षा अधिक प्रखर थी। उनका भी विरोध हुआ था लेकिन किसी ने उनकी हत्या नहीं की क्योंकि यह महाराष्ट्र की परंपरा नहीं है। इसलिए दाभोलकर और पानसरे की आवाज बंद करने के लिए यह हत्या की गई ये विचार तर्कसंगत नहीं लगता। पानसरे कम्युनिस्ट थे और कोल्हापुर के आसपास उन्हें कोई नहीं पहचानता रहा होगा। कामरेड पानसरे ने हिंदू धर्म पर कीचड़ उछाला। लेकिन कोई दिव्य विचार प्रेषित नहीं किया। हिंदू धर्म पर टिप्पणी करना कम्युनिस्टों की नीति है और कम्युनिस्टों की आवाज देशभर में जनता ने लोकतंत्र के माध्यम से ही बंद किया। पानसरे की बात को महाराष्ट्र में कोई गंभीरता से नहीं लेता था। कामरेड श्रीपाद अमृत डांगे और कामरेड सोमनाथ चटर्जी सहित कई लोगों ने अपनी बात रखी। ये बातें कई बार प्रवाह के विरुद्ध थीं। लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। महाराष्ट्र की यही परंपरा है। कलबुर्गी की हत्या का मामला कर्नाटक का है। गौरी लंकेश की हत्या के शक की सुई नक्सलवादियों तक पहुंची है। महाराष्ट्र में भीमा-कोरेगाव प्रकरण में ‘विचारक’ नक्सलवादियों ने राज्य सरकार को उथल-पुथल करने के लिए ये साजिश रची, ऐसे सबूत मिले हैं। हिंदू धर्म पर प्रहार करना, दलितों-मुसलमानों को भड़काना, समाज में असंतोष पैâलाना और देश को अस्थिर करना यदि इन बुद्धिमान विचारकों की नीति होगी तो उनसे मतभेद होगा ही। हालांकि इस कारण से कोई उनकी हत्या नहीं करेगा। दाभोलकर और पानसरे की हत्या किसने की अदालत के सामने यह सवाल है। लेकिन ऐसा सवाल महाराष्ट्र की जनता के सामने भी है। राज्य में हजारों किसान आत्महत्या करते हैं। अन्य मुद्दे भी हैं। लेकिन सरकार पर सबसे बड़ा पातक दाभोलकर और पानसरे के खून का है। दाभोलकर और पानसरे प्रकरण में कई खूनियों को पकड़ा गया और उन्होंने आरोप को स्वीकारा है। उस आरोप के स्वीकार पत्र की स्याही सूखने के पहले ही एक नया खूनी पकड़ लिया जाता है, यह एक रहस्य ही है। दाभोलकर की हत्या में प्रयोग में लाई पिस्तौल ठाणे की खाड़ी में फेंकी गई, ऐसा जांच अधिकारियों का कहना है। उस पिस्तौल को ढूंढ़ने के लिए खाड़ी में एक तात्कालिक प्लेटफॉर्म बनाने की अनुमति सीबीआई ने राज्य सरकार से मांगी है। लेकिन सरकार सहयोग नहीं कर रही, ऐसी शिकायत सीबीआई ने अदालत से की है। सही में अगर ऐसा हुआ है तो ये ठीक नहीं। सरकार को इस जांच के दौरान आवश्यकता पड़ने पर युद्धनौका भी उपलब्ध करानी चाहिए। राफेल भी दिए जाएं। सेना का भी प्रयोग हो लेकिन हत्यारों का पता लगाओ। ‘असली’ खूनी को असल में ढूंढ़ो! मतभेद की आवाज किसने बंद की, ये पता चलना ही चाहिए।