" /> अभिभावक की भूमिका में महिलाएं

अभिभावक की भूमिका में महिलाएं

बच्चों के लिए आदर्श उनके माता-पिता ही होते हैं। सभी माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण अपने सीमित साधनों से पूरा करने का प्रयास करते हैं। किंतु इस पालन-पोषण में मां की भूमिका सदैव ही महत्वपूर्ण होती है। दरअसल बच्चे अपनी मां से भावनात्मक रूप से कुछ अधिक ही जुड़े होते हैं। मां जब अपने बच्चे को दुग्धपान कराती है तब से ही बच्चा अपनी मां से कुछ विशेष जुड़ाव महसूस करने लगता है। दरअसल एक नन्हा बच्चा भी स्पर्श को समझता है। बड़े होते-होते मां के हाथ से नहाना, खाना, सोना, हाथ में हाथ डाले घूमना, यह सब प्रक्रियाओं से गुजरते हुए वह मां से कुछ अधिक ही जुड़ जाता है। हालांकि पिता भी कई बार यह भूमिका निभाते हैं किंतु ईश्वर ने मां को कुछ ऐसे गुण दिए हैं, जो मूलत: पुरुषों में नहीं होते। ऐसे में बड़े होते हुए बच्चों के साथ मां की भूमिका भी कुछ अधिक संवेदनशील होने के साथ-साथ जिम्मेदारी से भरी होती है।
हमारे हिंदुस्थानी समाज में बेटों के खाने-पीने और स्वास्थ्य को लेकर मां कुछ अधिक सतर्क होती है पुत्र-प्रेम आज भी अधिक है, किंतु दूसरी ओर बढ़ती हुई बेटी की ओर मां का ध्यान बेटे से कम होता है क्योंकि वह तो ‘पराया धन’ है जैसी मानसिकता अब भी भारतीय समाज में है। जबकि आज के दौर में हम बेटा-बेटी को एक समान कहते हैं किंतु वास्तव में क्या ऐसा होता है? बेटी को बाहर निकलते हुए माता-पिता कई हिदायतें देते है किंतु बेटे की ओर से बेफिक्र होते हैं। बेटी पर तमाम बंदिशें होती हैं किंतु बेटा सभी बंदिशों से बाहर होता है क्योंकि वह बेटा है या पुरुष है। क्या बेटों को संस्कारों की आवश्यकता नहीं है? क्या बेटे को भी अपनी सीमाएं और मर्यादाएं ज्ञात नहीं होनी चाहिए? फिर सारी मर्यादाएं, संस्कार और आदर्श मापदंड केवल बेटी के लिए ही क्यों? आज बेटियों के साथ दुर्व्यवहार होता है, उनके साथ छेड़छाड़ की घटनाएं होती है, उन पर अश्लील फब्तियां कसी जाती है, यहीं नहीं उनके साथ बलात्कार भी होता है, तो यह सब करनेवाले पुरुष या किसी के बेटे ही होते होंगे न?
समाज में इस तरह जो बुराइयां व्याप्त हैं उसके पीछे का मुख्य कारण यही है कि हम बेटियों को तो बहुत संस्कार देते हैं, तमाम मर्यादाओं के पाठ सिखाते हैं किंतु यही सब हम अपने बेटों को नहीं सिखाते कि सभी लड़कियों का सम्मान करें, उन्हें उतना ही सम्मान दें जितना वे अपनी मां या बहन को देते हैं क्योंकि वह भी किसी और की बहन या बेटी होगी। किंतु इस ओर हमारा ध्यान जाता ही नहीं क्योंकि हम सोचते है हमारे बेटे ऐसे होंगे ही नहीं। किंतु ऐसा होता नहीं। कुछ वर्षों पूर्व एक रिपोर्ट में बताया गया कि अपने महंगे शौक को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षित बेटे या बड़े घरों के बच्चे और बड़े पदों पर रहनेवाले लोगों के बच्चे चोरी, जालसाजी जैसे कुकर्म में लिप्त पाए गए। आज के संदर्भ में समाज में बढ़ते हुए कुकर्म कहीं न कहीं पुरुष समाज द्वारा ही संचालित होते हैं। अंडरवर्ल्ड हो, ड्रग्स के माफिया हों अथवा किसी और क्राइम के सिंडिकेट के संचालनकर्ता हों सभी पुरुष ही तो हैं। ये सब कहीं न कहीं बेटों को दी हुई अतिरिक्त स्वतंत्रता का ही परिणाम है जो अंत में कुकर्मों में तब्दील हो जाती है।
मां की भूमिका परिवार में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह बेटों में भी बेटियों की तरह ही संस्कार डाले तो समाज में व्याप्त बुराइयों पर बहुत हद तक लगाम लग जाएगी। मां को अपनी बेटियों को भी संस्कार के साथ ही आत्म-सुरक्षा और आत्मविश्वास के गुणों का महत्व जताकर उसे सशक्त बनाना होगा। उसे स्वयं भी बेटी के समक्ष एक सशक्त मां के रूप में खड़े रहना होगा। मां जब बच्चों के लिए आदर्श होती है तो इस संदर्भ में उसकी भूमिका और अधिक गंभीर और जिम्मेदारी से भरी होती है। बेटी को मर्यादाएं तो जरूर सिखाएं किंतु समय आने पर विपरीत स्थितियों में उसे दुर्गा या काली बनाना भी सिखाए अर्थात पूरे शक्ति के साथ स्थिति का मुकाबला करना भी सिखाए। मर्यादाएं तब तक ही ठीक हैं जब तक बेटी या महिला के चरित्र और देह तक कोई पहुंच न पाएं। किंतु यदि इन पर कोई आंच आने की जरा भी गुंजाइश हो तो बेटियों को अपनी आत्म सुरक्षा के लिए कुछ विशेष कौशल भी अवश्य सिखाएं मां होने की बहुत सारी जिम्मेदारियां होती हैं और एक मां ही आदर्श समाज की जननी है।

– डॉ. सुषमा गजापुरे ‘सुदिव’