अयोध्या इतिहास की नई इबारत

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआईवाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या विवाद पर पिछले शनिवार, ९ नवंबर को अपना पैâसला सुना दिया। संविधान पीठ द्वारा ४५ मिनट तक पढ़े गए १,०४५ पन्नों के फैसले ने देश के इतिहास के सबसे अहम और एक सदी से ज्यादा पुराने विवाद का अंत कर दिया। ६ अगस्त २०१९ से सुप्रीम कोर्ट में इस विवाद पर लगातार ४० दिन तक सुनवाई हुई। फैसले के मुताबिक अयोध्या की २.७७ एकड़ की पूरी विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी गई। शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए ३ महीने में ट्रस्ट बने और इसकी योजना तैयार की जाए। चीफ जस्टिस ने मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को ५ एकड़ वैकल्पिक जमीन दिए जाने का पैâसला सुनाया यानी विवादित जमीन का करीब दोगुना। चीफ जस्टिस के अनुसार ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। हिंदू संगठनों ने १८१३ में पहली बार बाबरी मस्जिद पर दावा किया था और उनका दावा था कि अयोध्या में बाबर ने १५२८ में राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई थी। इसके ७२ साल बाद यह मामला पहली बार किसी अदालत में पहुंचा था। महंत रघुबर दास ने १८८५ में राम चबूतरे पर छतरी लगाने की याचिका लगाई थी, जिसे पैâजाबाद की जिला अदालत ने ठुकरा दिया था। १३४ साल से तीन अदालतों में इस विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। भले ही पैâसला आने में वर्षों लग गए लेकिन पैâसले के बाद देश भर से एक सुर में यह आवाज उठी कि राम जन्मभूमि-बाबरी भूमि विवाद के संबंध में आम सहमति से दिए गए इस ऐतिहासिक पैâसले का सभी को सम्मान करना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम नेताओं, धर्मगुरुओं, बुद्धिजीवियों ने एक सुर में कहा कि यह पैâसला किसी की जीत और हार का नहीं है और सभी को शांति बनाए रखनी चाहिए।
पैâसले के तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ कहा कि ‘मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद बनवाई। धर्मशास्त्र में प्रवेश करना अदालत के लिए उचित नहीं होगा। बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनाई गई थी। मस्जिद के नीचे जो ढांचा था, वह इस्लामिक ढांचा नहीं था।’ तो दूसरी तरफ यह भी कहा कि ‘अदालत अगर उन मुस्लिमों के दावे को नजरंदाज कर देती है, जिन्हें मस्जिद के ढांचे से पृथक कर दिया गया तो न्याय की जीत नहीं होगी। इसे कानून के हिसाब से चलने के लिए प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्ष देश में लागू नहीं किया जा सकता। गलती को सुधारने के लिए केंद्र पवित्र अयोध्या की अहम जगह पर मस्जिद के निर्माण के लिए ५ एकड़ जमीन दे।’ इन दो पहलुओं के अलावा धर्म और आस्था पर भी कोर्ट की टिप्पणी मायने रखती है जिसमें कहा गया कि अदालत को धर्म और श्रद्धालुओं की आस्था को स्वीकार करना चाहिए। अदालत को संतुलन बनाए रखना चाहिए। हिंदू इस स्थान को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं। मुस्लिम भी विवादित जगह के बारे में यही कहते हैं। प्राचीन यात्रियों द्वारा लिखी किताबें और प्राचीन ग्रंथ दर्शाते हैं कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि रही है। ऐतिहासिक उद्धरणों से संकेत मिलते हैं कि हिंदुओं की आस्था में अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि रही है। ऐसे में यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को गंभीरता से लिया और पैâसला भी उसी के आधार पर दिया। पैâसले में महत्वपूर्ण रही आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की रिपोर्ट जिसके अनुसार मस्जिद के नीचे जो ढांचा था, वह इस्लामिक ढांचा नहीं था। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था। कोर्ट ने कहा भी कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना एएसआई का अपमान होगा। हालांकि एएसआई ने यह तथ्य स्थापित नहीं किया कि मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाई गई लेकिन तथ्य तब भी वही थे कि मस्जिद खाली जगह पर नहीं बनी थी।
मुस्लिम समाज ने इस पैâसले पर नपी-तुली लेकिन सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दीं। एकाध राजनैतिक संगठनों को छोड़कर सभी ने पैâसले का एहतेराम किया और उसे सहर्ष स्वीकार कर हर तरह के विवाद को समाप्त कर दिया। वैसे भी मुस्लिम समाज की जिम्मेदार संस्थाएं और बुद्धिजीवी वर्ग शुरू से कहता आ रहा था कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी पैâसला आएगा, वह उसे स्वीकार होगा। यूं भी इस्लाम की मान्यता के अनुसार कब्जे की जमीन पर किसी मस्जिद की तामीर नहीं की जा सकती। यह शरई ऐतबार से गलत है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के पैâसले से मुसलमानों में भी यह पैगाम गया कि अगर जमीन का टाइटल ही गलत है तो मस्जिद का निर्माण भी भूल ही कहा जाएगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसी जमीन पर वर्षों तक नमाज पढ़ने की बुनियाद पर मस्जिद के लिए अयोध्या के भीतर ही वैकल्पिक जमीन देने की बात कहकर मुस्लिम समाज की भावनाओं का भी ख्याल रखा। यही इस देश की खूबसूरती है। यही इस देश के संस्कार हैं। उन्हीं संस्कारों का अक्स सुप्रीम कोर्ट के पैâसले में नजर आया, जिसे मुसलमानों ने तहे दिल से स्वीकार भी किया। बातें तो यहां तक होने लगीं कि इस पैâसले के बाद हिंदुओं को मस्जिद बनाने में योगदान देना चाहिए और इसी तरह मुस्लिमों को भी राम मंदिर के निर्माण में योगदान देना चाहिए यानी सुप्रीम कोर्ट का यह एक पैâसला देश की गंगा-जमनी तहजीबवाले मुल्क में ऐतिहासिक मौका बन सकता है, जिसका फायदा उठाते हुए हिंदू-मुस्लिम अपने बीच की वर्षों पुरानी कड़वाहट को भूलकर एक हो सकते हैं। एक बात और ध्यान देने की है कि अयोध्या में रह रहे बड़ी संख्या में मुसलमान बहुत पहले से दर्जनों मंदिरों से जुड़े हुए हैं और जिनके जीवनयापन का मुख्य जरिया उन छोटे कारोबार से पैदा होता है जो श्रद्धालुओं और स्थानीय हिंदुओं से जुड़ा हुआ है। सिर्फ अयोध्या में ही नहीं बल्कि देश भर में कई ऐसे कारोबार और काम-धंधे हैं जो हिंदुओं से जुड़े हैं।
शुरू में सुन्नी वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से संतुष्ट नहीं था लेकिन बाद में उसने भी तय किया कि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन नहीं डालेगा। यहां तक कि मामले के सबसे महत्वपूर्ण पक्षकार इकबाल अंसारी भी सुप्रीम कोर्ट के पैâसले से खुश हैं। ये वही इकबाल अंसारी हैं, जिनके पिता हाशिम अंसारी ने ७० साल तक इस मामले में मुकदमा लड़ा, जिनकी ३ साल पहले ही मौत हो गई। उनके बाद इकबाल अंसारी इस मामले के पक्षकार बने। वैसे इस पैâसले का एक पहलू यह भी है कि खुद मुस्लिम समुदाय इस पैâसले के खिलाफ जाकर अपने लिए किसी प्रकार का विवाद नहीं बढ़ाना चाहता। मुस्लिम समाज इस बात को समझ रहा है कि कोर्ट-कचहरी में फंसे रहने और हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होगा। वैसे भी पहले से ही अयोध्या मामला मुस्लिम समाज के जीवन में मुसीबत की तरह रच-बस गया है। देश के किसी भी विवाद में अगर हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश होती है तो हर बार यही मामला तूल पकड़ता रहा है। अब मुस्लिम समाज इन सब विवादों और भेदभाव से उकता गया है। अयोध्या विवाद खुद उनके गले की हड्डी बना हुआ था। पैâसले के बाद अब मुस्लिम समाज के लिए भी इस विवाद से निकलकर रचनात्मक भविष्य बनाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। पैâसले से हिंदू-मुस्लिम एकता के इतिहास की नई इबारत लिखने का स्वर्णिम मौका है और कोई भी मुसलमान इस मौके को गंवाना नहीं चाहता। खासकर नई पीढ़ी के लिए यह पैâसला उनके लिए अतीत की कटुता भुलाकर और धार्मिक भेद से ऊपर उठकर राष्ट्रनिर्माण का अवसर लाया है। अब मुस्लिम समाज इस अध्याय को बंद कर वैचारिक और भावनात्मक रूप से रचनात्मक कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाए तो बेहतर है। आखिर कब तक कथित मुस्लिम रहनुमा और कथित सेक्युलर राजनेता उनकी भावनाओं के रथ पर अपनी सत्ता की सवारी का जुगाड़ करते रहेंगे।