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अयोध्या के बाद, अब मथुरा पर क्या?

अयोध्या विवाद में जीत के बाद अब कृष्ण जन्मभूमि को लेकर मामला अदालत में पहुंच गया है। उधर काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद की वाराणसी की अदालत में तारीखें चालू हैं। हालांकि अभी भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ व इनसे जुड़े संगठन इस विवाद में कूदे नहीं बल्कि चुपचाप हवा का रुख भांप रहे हैं। संत समाज ने तो बड़े पैमाने पर कृष्ण जन्मभूमि के मामले से खुद को अलग कर लिया है। मथुरा के आम लोगों को भी इस तरह की कवायद रास नहीं आ रही है।लेकिन असल सवाल है कि आनेवाले समय में भाजपा की राजनीति के लिए कृष्ण जन्मभूमि खाद पानी का काम करेगी या पार्टी विकास के एजेंडे के ईर्द-गिर्द ही रहने वाली है।
लगातार कई चुनावों में भाजपा के लिए राम मंदिर ने जिस तरह वैतरणी का काम किया है, कम से कम उससे तो यह नहीं लगता है कि पार्टी आसानी से कृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे पर आंख बंद किए बैठी रहेगी। इतना साफ है कि इस मामले पर जनमानस के समर्थन की बुनियाद पर उसका अगला कदम तय होगा। विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इंकार के बाद भी मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराने की मुहिम उत्तर प्रदेश में परवान चढ़ने जा रही है। माना जा रहा है कि विहिप और संघ की ना-नुकुर के बाद भी इनसे जुड़े कई अनुषांगिक संगठन इसका साथ देंगे। हालांकि मथुरा के स्थानीय नेताओं और लोगों का कहना है कि यहां जन्मभूमि को लेकर कोई विवाद नहीं है और कुछ लोग अमन चैन को बिगाड़ने की कोशिश करते रहते हैं।
गौरतलब है कि विहिप के एजेंडे में पहले से ही अयोध्या के साथ ही मथुरा और काशी विश्वनाथ मंदिर को मुक्त कराना रहा है। हालांकि अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद विहप और संघ दोनो ने खुल कर इस एजेंडे पर चलने के लिए हामी नहीं भरी है। विहिप के महासचिव चंपत राय ने जरूर कुछ दिनों पर पहले मथुरा का दौरा किया था और हालात को समझा था।
ताजा मामला यह है कि भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु शंकर जैन ने याचिका दायर की है। याचिका के मुताबिक, जिस जगह पर शाही ईदगाह मस्जिद खड़ी है, उसी जगह कारागार था, जहां भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। जिस समय उत्तर प्रदेश की रामनगरी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का काम जोरों से चल रहा है। इस बीच, मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर का मामला स्थानीय कोर्ट में पहुंच गया है। इसे लेकर एक सिविल केस दायर किया गया है, इसमें १३.३७ एकड़ जमीन पर दावा करते हुए स्वामित्व मांगा गया है और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की गई। हालांकि, श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के सचिव का कहना है कि उनका इस केस से कोई लेना-देना नहीं है।
भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु शंकर जैन ने याचिका दायर की है। इसमें जमीन को लेकर १९६८ के समझौते को गलत बताया। यह केस भगवान श्रीकृष्ण विराजमान, कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से वकील रंजना अग्निहोत्री और ६ अन्य भक्तों की ओर से दायर किया गया है। गौरतलब है कि यह तीनों वकील वही हैं जिन्होंने राम जन्मभूमि का मुकदमा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लड़ा था।
इस बार याचिका ‘भगवान श्रीकृष्ण विराजमान’ और स्थान ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि’ के नाम से दायर की गई है। हालांकि, इस केस में प्लेसेज आफ वरशिप एक्ट १९९१ की रुकावट है। इस एक्ट के मुताबिक, आजादी के दिन १५ अगस्त १९४७ को जो धार्मिक स्थल जिस संप्रदाय का था, उसी का रहेगा। इस एक्ट के तहत सिर्फ रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को छूट दी गई थी।
दूसरी ओर श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ट्रस्ट व श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास का कहना है कि ट्रस्ट से इस याचिका या इससे जुडे़ लोगों से कोई लेना-देना नहीं है। इन लोगों ने अपनी तरफ से याचिका दायर की है। हमें इससे कोई मतलब नहीं है।
दरअसल, हरिशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन हिंदू महासभा के वकील रहे हैं और इन्होंने रामजन्मभूमि केस में हिंदू महासभा की पैरवी की थी, जबकि रंजना अग्निहोत्री लखनऊ में वकील हैं। बताया जा रहा है कि जिस तरह राम मंदिर मामले में नेक्स्ट टू रामलला विराजमान का केस बनाकर कोर्ट में पैरवी की थी, उसी तरह नेक्स्ट टू भगवान श्रीकृष्ण विराजमान के रूप में याचिका दायर की गई है।
अब से कई दशक पहले १९५१ में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर यह तय किया गया कि वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा। इसके बाद १९५८ में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम की संस्था का गठन किया गया था। कानूनी तौर पर इस संस्था को जमीन पर मालिकाना हक हासिल नहीं था, लेकिन इसने ट्रस्ट के लिए तय सारी भूमिकाएं निभानी शुरू कर दीं।
इस संस्था ने १९६४ में पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए एक सिविल केस दायर किया, लेकिन १९६८ में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ समझौता कर लिया। इसके तहत मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्जे की कुछ जगह छोड़ी और उन्हें (मुस्लिम पक्ष को) उसके बदले पास की जगह दे दी गई। इस समझौते के बाद से मथुरा में कभी कृष्ण जन्मभूमि को लेकर कोई विवाद खड़ा नही हुआ।
राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने और अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू होने के बाद जरूर कृष्ण जन्मभूमि निर्माण न्यास के नाम से इस आंदोलन को चलाने के लिए संस्था २३ जुलाई को हरियाली तीज के मौके पर पंजीकृत कराई जा चुकी है। संस्था की कमान संत देव मुरारी आचार्य के हाथों में है। दावा किया जा रहा है कि पंजीकृत कराए गए न्यास से देश के १४ राज्यों के ८० से ज्यादा संत जुड़े हुए हैं। देव मुरारी पर बीते महीने ही सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का मुकदमा भी दायर हो चुका है।
मथुरा के स्थानीय लोगों व संतों का कहना है कि जमीन को लेकर यहां दोनो पक्षों में काफी पहले से सहमति बन चुकी है और कोई विवाद नहीं है। उनका कहना है कि बाहर से आए हुए कुछ संत यहां विवाद पैदा करने का प्रयास करते हैं पर स्थानीय लोगों के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है। उनका कहना है कि मथुरा व वृंदावन में दो तरह के संत हैं। एक जो यहीं के हैं और दूसरे वो जो केवल राजनीति के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक ईदगाह की जमीन के उपयोग पर दोनो समुदाय एक हैं और कोई झगड़ा नहीं है। यहां किसी तरह के विवाद को खड़ा करने की मुहिम को कम से कम स्थानीय जनता का साथ नहीं मिलेगा।
संघ ने हालांकि साफ कह दिया है कि राम मंदिर उसका प्रमुख एजेंडा था और अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही वह इस मामले से पूरी तरह से अलग हो जाएगा। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में इसे साफ कर दिया था। माना जा रहा है कि संतों की ओर से कृष्ण जन्मभूमि आंदोलन को तेज करने की दशा में संघ उसे समर्थन दे सकता है। दरअसल पूरी कवायद पर बारीकी से नजर रख रही भाजपा और संघ पहले इस मुद्दे पर जनता का रुख जान लेना चाहती है। कृष्ण जन्मभूमि को लेकर अगर जनता के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो वह जरूर इस पूरे आंदोलन की बागडोर संभालेगी वरना इस पूरे विवाद से खुद को अलग ही रखेगी।