अयोध्या फैसला एक ओर मुसलमान, एक ओर लॉ बोर्ड!

अरसे से सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानने की बात कहनेवाला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब अपने रुख से पलट गया है। अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों में मानने को लेकर एक राय है, वहीं उलेमा व नेताओं की मौजूदगीवाले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपनी अलग राह चुनी है। पूरे मामले के अहम मुस्लिम पक्षकार हाजी इकबाल अंसारी और बाबरी मस्जिद के प्रबंधन का दावा करनेवाले सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड तक बोर्ड के राय से इत्तेफाक नहीं रखते हैं।
मुसलमानों का बड़ा तबका दुनिया के सबसे चर्चित और लंबे चले मुकदमे के पैâसले के बाद इस मसले को दफन कर तरक्की की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है। दूसरी ओर सियासी धड़ों से ताल्लुक और विदेशों से इसी मसले पर लाखों करोड़ों का चंदा वसूलनेवाले लोग हैं, जिन्हें यह धंधा मंदा होने का डर है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के पैâसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन दिए जाने की पेशकश को भी नामंजूर कर दिया है। बोर्ड की बैठक में तीन मुस्लिम पक्षकारों ने रिव्यू याचिका डालने को लेकर अपनी सहमति दे दी है।
अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का पैâसला आने के बाद देश में मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अहम बैठक बीते हफ्ते लखनऊ में बुलाई गई। बैठक में अयोध्या पैâसले के बाद उठाए जानेवाले कदम पर विचार हुआ तो सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या में मुसलमानों को मस्जिद के लिए दी गई पांच एकड़ जमीन लेने या न लेने पर भी पैâसला लिया गया। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सहित जमीयत उलेमा ए हिंद व कई अन्य मुस्लिम संगठनों ने अयोध्या में मस्जिद के लिए पांच एकड़ भूमि न लिए जाने को लेकर राय जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट के पैâसले पर पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने को लेकर मुस्लिम संगठनों में विरोधाभास है। बाबरी मस्जिद मामले के पक्षकार हाजी इकबाल अंसारी व जफरयाब जिलानी बीच बैठक से बाहर निकल गए।
वहीं मुकदमे के पक्षकार सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जुफर फारुकी ने अब किसी तरह का मुकदमा न दाखिल किए जाने की बात कही है। फारुकी का कहना है कि मुप्रीम कोर्ट का पैâसला आने से पहले सभी ने इसे मानने की बात कही थी। इस हालात में जब पैâसला आ गया है तो पुनर्विचार की बात करना बेमानी है। उनका कहना है कि अयोध्या में सभी लोगों से बात कर पांच एकड़ जमीन लेने की बात स्वीकार की जाएगी।
पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में कहा गया कि उन लोगों को मालूम है कि पुनर्विचार याचिका का क्या हश्र होने जा रहा है? बैठक के बाद जमीयत नेताओं ने कहा कि याचिका खारिज हो जाएगी पर हम अपने हक से पीछे नहीं हटेंगे और पैâसले पर विरोध जरूर दर्ज कराएंगे। बोर्ड ने पैâसले को न्यायसंगत न मानते हुए सुप्रीम कोर्ट के गुंबद के नीचे मूर्तियां रखे जाने व मस्जिद को ढहाने को गलत ठहराने का हवाला देते हुए कहा कि इसके बाद भी हमारे हक में पैâसला नहीं हुआ। बोर्ड ने कहा कि अदालत ने माना है कि १९४९ को मूर्तियां रखे जाने तक मस्जिद में नमाज पढ़ी गई थी। इन्हीं बातों को लेकर बोर्ड ने अब पुनर्विचार याचिका दाखिला करने का पैâसला किया है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि उसे मस्जिद के बदले में दूसरी जगह पर दी जानेवाली पांच एकड़ जमीन मंजूर नहीं है। बोर्ड ने कहा कि वो हक की लड़ाई लड़ने गए थे न कि दूसरी जमीन पाने के लिए। कार्यकारिणी की बैठक में कहा गया कि उन्हें वही जमीन चाहिए, जहां पर बाबरी मस्जिद बनी थी। गौरतलब है कि बड़ी तादाद में मुस्लिम संगठनों ने पांच एकड़ जमीन न लिए जाने की बात कही है। राम जन्मभूमि न्यास ने भी अयोध्या धर्मनगरी में पांच एकड़ नहीं बल्कि कहीं बाहर दिए जाने की बात कही है। बोर्ड में जहां सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कई बातों को लेकर बहिष्कार किया, वहीं जफरयाब जिलानी और बाबरी मामले के पक्षकार हाजी इकबाल अंसारी भी बीच बैठक से उठकर बाहर निकल आए।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक रविवार सुबह ११ बजे से लखनऊ के नदवा कॉलेज में प्रस्तावित थी। आखिरी मौके पर बैठक का स्थान बदल कर नदवा की जगह मुमताज डिग्री कॉलेज कर दिया गया। बैठक का स्थान बदलने को लेकर सूचना न होने के कारण बोर्ड के तमाम सदस्य नदवा पहुंच गए थे। बाद में उन्हें इस बात की जानकारी दी गई। बोर्ड के एक सदस्य के मुताबिक कार्यकारिणी सदस्य सलमान नदवी के अलग रुख रखने और नदवा कॉलेज में हंगामे की आशंका के चलते बैठक का स्थान बदला गया। सलमान नदवी न केवल सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे को लेकर पहले से सुलह समझौते की बात करते रहे हैं बल्कि समझौते के लिए कोर्ट के आदेश पर बनी कमेटी के सदस्य श्री श्री रविशंकर से भी बातचीत करते रहे हैं। सलमान नदवी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी में भी मतभेद जगजाहिर है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में शामिल होने के लिए देशभर के मुस्लिम नेता, उलेमा लखनऊ पहुंचे थे। सांसद असदुद्दीन ओवैसी जो पिछली कई बैठकों से गैर हाजिर रहे थे, इस बार भाग लेने मुमताज कॉलेज पहुंचे। मौलाना महमूद मदनी, अरशद मदनी, मौलाना जलालुद्दीन उमरी, सांसद ईटी बशीर, खालिद सैफउल्लाह रहमानी, वली रहमानी, जफरयाब जिलानी और खालिद रशीद फिरंगीमहली फिलहाल बैठक में मौजूद रहे। शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक बीमारी के चलते मीटिंग में नहीं पहुंच पाए हैं। अयोध्या पैâसले पर जहां बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी संयोजक जफरयाब जिलानी का मत पुनर्विचार याचिका दायर करने का था, वहीं पर्सनल लॉ बोर्ड के ज्यादातर सदस्यों का मानना है कि पूरे प्रकरण में अहम किरदार निभानेवाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन की सलाह के मुताबिक चलना चाहिए। पैâसला आने के बाद से अयोध्या मामले में सभी पक्षों ने राजीव धवन की मेहनत और कोशिशों का पुरजोर समर्थन करते हुए उनकी तारीफ की है।
डीएचएफएल और यूपीपीसीएल दोनों अदालत पहुंचे
उत्तर प्रदेश में इन दिनों सियासी भूचाल मचानेवाले बिजली कर्मचारियों के पीएफ मामले में नया मोड़ आ गया है।
पहले डीएचएफएल और अब उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन ने भी बिजली कर्मचारियों के भविष्य निधि के पैसों के भुगतान को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इसके बाद अब अपने पीएफ के पैसों को लेकर बिजली कर्मचारियों को राहत मिलने के आसार बढ़ गए हैं। पावर कॉरपोरेशन ने अदालत से अपने कर्मचारियों के भविष्य निधि (पीएफ) के पैसों की अदायगी की गुहार लगाई है। उधर इससे पहले ही उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मचारियों के भविष्य निधि का पैसा लौटाने के लिए डीएचएफएल ने उच्च न्यायालय से अनुमति मांगी थी। कंपनी ने अदालत से सावधि जमा पर ब्याज व मूलधन के भुगतान पर लगी रोक हटाने का अनुरोध करते हुए कहा था कि वह कर्मचारियों का पैसा वापस करने को लेकर प्रतिबद्ध है। मुंबई उच्च न्यायालय ने डीएचएफएल को सुरक्षित मियादी जमा के भुगतान की अनुमति दे दी है जबकि असुरक्षित मियादी जमा पर भुगतान के मामले की सुनवाई २० नवंबर को करेगी। पावर कॉरपोरेशन के भी इसी तरह का अनुरोध किए जाने के बाद कर्मचारियों सहित डीएचएफएल को न्यायालय से सकारात्मक पैâसले की उम्मीद बंध गई है।
गौरतलब है कि रिलायंस निप्पान की ओर से दायर एक याचिका के आधार पर बीते महीने डीएचएफएल को किसी तरह का भुगतान किए जाने पर रोक लगा दी थी। डीएचएफएल ने एक शपथपत्र दाखिल कर उच्च न्यायालय से परिपक्वता पर सार्वजनिक जमा पर भुगतान की मंजूरी मांगी है। इस याचिका पर डीएचएफएल को सुरक्षित मियादी जमा के भुगतान की अनुमति न्यायालय ने दे दी है।