अरुण जेटली गुनहगार हैं क्या?

विजय माल्या एक नंबर का झूठा है। शराबी और झूठों पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन विजय माल्या द्वारा लंदन कोर्ट में दिए वक्तव्य के कारण केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली अड़चन में आ गए हैं। देश छोड़ने के पहले मैं अरुण जेटली से मिला था। इस मुलाकात में मैंने बैंकों के लेन-देन मामले में सुलह करने के बारे में कहा था, ऐसा दावा विजय माल्या ने लंदन के एक कोर्ट में किया। इस पर अरुण जेटली को कटघरे में खड़ा करने की वजह क्या है? लेकिन कांग्रेस ने यह किया है। हजारों करोड़ का कर्ज डुबोकर विजय माल्या ने देश छोड़ दिया। माल्या इस समय लंदन में है और उसका गट्ठर फिर हिंदुस्थान में लाने के लिए लंदन के वेस्टमिंस्टर न्यायालय में मामला शुरू है। अनेक उद्योगपतियों ने बैंकों से कर्ज लेकर उसे डुबोया है। १६ राष्ट्रीयकृत बैंक ‘एनपीए’ग्रस्त हैं व कर्ज लेनेवाले सभी बड़े उद्योगपति हैं। उनमें से एक माल्या है। माल्या ने लगभग १३ हजार करोड़ रुपए का कर्ज लिया तथा किंगफिशर एयरलाइन्स डूबने के कारण उसने कर्ज डुबो दिया। उसे कर्ज लौटाना संभव नहीं, ऐसा उसने कहा (कई बड़े उद्योगपतियों के लिए वह संभव नहीं होता)। इसलिए ‘वन टाइम सेटलमेंट’ का रास्ता वे अपनाते हैं। माल्या ने भी ऐसा प्रयास किया लेकिन बैंकों ने ‘सेटलमेंट’ का रास्ता स्वीकार नहीं किया। उसे क्यों स्वीकार नहीं किया और इसके पीछे उनकी राजनैतिक अर्थनीति क्या थी यह वे ही जानें। ऐसा कहते हैं कि माल्या कर्ज की बड़ी रकम लौटाने को तैयार था। उसकी संपत्ति भी जब्त हुई। इसके बावजूद अब माल्या के प्रत्यर्पण के लिए सरकार देश और विदेश की न्याय प्रक्रिया पर जो बड़ा खर्च कर रही है, इसे देखें तो सरकार उद्योगपतियों के कर्ज के लिए डूबा हुआ प्रयास ही कर रही है, ऐसा प्रतीत होता है। कर्ज वापस करूंगा यह कहनेवालों को कर्ज लौटाने का मौका मिले यही अर्थनीति है। बैंक कर्ज दें, उसे डुबोने के लिए उचित माहौल तैयार करें और उद्योगपति भगाने के बाद फिर उनके प्रत्यर्पण का ढोल पीटना। माल्या अब आर्थिक विषय न होकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय हो गया है। माल्या ने अब लंदन कोर्ट में कहा कि ‘बैंकों का हम पर कर्ज था। बकाया भुगतान को हम तैयार थे। सुलह के लिए मैंने बैंकों को कई बार पत्र लिखा था लेकिन मुझे उनकी तरफ से कोई प्रतिसाद नहीं मिला इसलिए बैंकों से सुलह हो, इसके लिए हमने वित्तमंत्री से मुलाकात की थी।’ माल्या के इस बयान के बाद इतनी खलबली मचने का कारण क्या है? इस प्रकार की मुलाकात हो सकती है और यह कांग्रेस को पता होना चाहिए। जिस पार्टी में मनमोहन सिंह जैसे जबरदस्त अर्थशास्त्री हैं, उनकी सलाह तो कांग्रेस को लेनी चाहिए थी। सुलह का मसौदा माल्या ने दिया था और वह बैंकों को मान्य नहीं था। इसके लिए माल्या ने वित्तमंत्री से मदद मांगी ऐसा यह मामला है। फिर माल्या वित्तमंत्री से मिला तो संसद परिसर में। माल्या सांसद था, वह सांसद की हैसियत से संसद में कहीं भी घूम सकता था। सांसद का वह अधिकार है इसलिए संसद के मध्यवर्ती सभागृह में हमने माल्या को अरुण जेटली से बात करते हुए देखा था इसलिए जेटली इस माल्या प्रकरण के एक गुनहगार हैं, ऐसा जब कांग्रेस के एक अगुवा पुनिया कहते हैं तो हंसी नहीं रुकती। सच तो यह है कि कांग्रेस और भाजपा ने संसद में जिस चरित्र के लोग चुनकर लाए हैं उसे देखते हुए मंत्री किससे मिलें और किससे मिलना टालें, यह एक सवाल ही है। फिर माल्या कर्ज डुबोनेवाला अकेला नहीं है। संसद में ऐसे कर्जदार और कर्ज डुबोनेवाले ‘एक से बढ़कर एक’ हैं और वो बतौर सांसद जहां चाहे घूम रहे हैं। नीरव मोदी के एक पारिवारिक कार्यक्रम में राहुल गांधी मौजूद थे यह भी सामने आ चुका है। मतलब मोदी के पलायन के पीछे राहुल गांधी थे ऐसा माने क्या? बोफोर्स प्रकरण में क्वात्रोची फरार हो गया। सरकार और सीबीआई की मदद के बगैर क्वात्रोची का फरार होना संभव ही नहीं था। इस काले इतिहास को इतनी आसानी से नहीं मिटाया जा सकता है। जेटली को विजय माल्या मिला। माल्या ने यह सब इतने साल बाद कोर्ट में बताया। कांग्रेस को इस मुलाकात की जानकारी थी तो इतने साल तक इसे दबाकर क्यों रखा कि कांग्रेस और माल्या का मुंह खोलनेवाला धनी कोई और ही है? एक दूसरे का पैर खींचने का प्रयास दिल्ली में शुरू है। २०१९ की पूर्व तैयारी है। जो नहीं चाहिए उन्हें अभी ही छांट दो। उसमें सूखे के साथ गीला भी जल रहा है। जेटली के प्रकरण में यही होता दिख रहा है।