" /> अवॉर्ड मना है!

अवॉर्ड मना है!

हाल ही में एक गीतकार ने शपथ ली कि वह अब किसी भी अवॉर्ड समारोह में नहीं जाएगा। इसकी वजह थी कि देसी ऑस्कर में उनकी फिल्म को अवॉर्ड नहीं मिला। उनकी जगह एक फालतू से गीत को अवॉर्ड दे दिया गया। पूर्व में आमिर खान ने भी कुछ ऐसी ही कसम खाई थी। अजय देवगन, जॉन अब्राहम और इमरान हाशमी भी अवॉर्ड समारोहों से दूर ही रहते हैं। इसके पहले ग्रेट अभिनेता प्राण ने भी ऐसी ही कसम खाई थी। इसके बावजूद ये अवॉर्ड देने और न देने का सिलसिला चलता रहता है।
अब सवाल है कि ये अवॉर्ड आखिर होता है क्या? एक सम्मान। किसी के कार्यों का सम्मान। अब आज जो स्थिति है उसमें कुछ गिने-चुने गिनती के अवॉर्ड ही होंगे जो खुद सम्मानित हैं, जिनकी साख बची हुई है। वरना तो भाई लोगों ने अपनी-अपनी दुकानें सजा ली हैं। अवॉर्ड जब बिजनेस बन जाए तो ऐसा ही होता है। अब तो एक गजब का खतरनाक ट्रेंड मुंबई में देखने को मिल रहा है। जिसे देखो वही अवॉर्ड की दुकान खोले घूम रहा है। एक बार कई साल पहले शक्ति कपूर के घर में गया था। उन्होंने अपना अवॉर्ड रूम दिखाया था, जिसमें कुछ सौ अवॉर्ड करीने से रखे थे। ‘अब लोग दे देते हैं तो मैं क्या करूं!’ कहना था उनका। ये छुटभैये टाइप के लोग १०० से लेकर ५०० तक की ट्रॉफीज् बनवा लेते हैं। एक बैनर बनवा लिया। किसी सस्ते से हॉल में बैनर टांगकर अवॉर्ड दनादन बांट देते हैं। २०-२५ या ५० अवॉर्ड रेवड़ियों की तरह बंटते हैं। इनमें कुछ अवॉर्ड मालदारों को बेचे जाते हैं, जिससे अवॉर्ड समारोह का खर्च निकलने के साथ प्रॉफिट भी आ जाता है। आखिर इसी प्रॉफिट यानी कमाई के लिए तो सारा प्रपंच रचा जाता है। साल में ३-४ संस्थाएं मुझे भी अवॉर्ड देने के लिए संपर्क करती हैं और मुझे समझ में ही नहीं आता कि मैंने ऐसी कौन सी खोज कर डाली है या उपलब्धि हासिल कर डाली है जो ये देसी ‘नोबेल’, ‘मैग्सेसे’ और ‘ऑस्कर’ मुझे सम्मानित करना चाहते हैं। आजकल फेसबुक काफी सारे फेसबुकियों के चेहरे दिखाते रहते हैं। बड़ी हंसी आती है जब निजी तौर पर कुछ परिचित बड़े गर्व से अवॉर्ड उठाए वॉल पर अपनी फोटो चिपकाते हैं। फिर वाह-वाह और कांग्रेच्युलेशंस का दौर। कुछ साल पहले एक खास मित्र के काफी अनुनय-विनय करने के बाद मैं उनका अवॉर्ड लेने चला गया था। एक बड़े नेता ने मुझे अवॉर्ड भी थमाया। उसी दौरान जिस कमरे से अवॉर्ड आ रहे थे, मैंने वहां झांक लिया था। यकीन मानिए उस कमरे में करीब २५०-३०० ट्रॉफीज् एक-दूसरे पर पटी पड़ी थीं। देखकर सिहरन सी हुई। वह कारोबार बड़ा अजीब लगा। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरा शिकार कर लिया हो। एक अनजाना अपमान सा महसूस हुआ। बाद में जब अवॉर्ड के लिए फोन आने लगे तो वही सीन याद आ जाता और मैं बड़ी विनम्रता से उन्हें ना कह देता। यह सिलसिला आज भी जारी है।
पहले कुछ गिने-चुने अवॉर्ड के नाम ही सुनने को आते थे। देश मंदी के दौर से गुजर रहा है पर अवॉर्ड उद्योग उफान मार रहा है। फिल्मोद्योग का सर्वोच्च अवॉर्ड है दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड। इस अवॉर्ड के नाम में थोड़ा इधर-उधर मिलावट करके करीब आधा दर्जन क्लोन तैयार कर लिए गए हैं। अब अवॉर्ड ज्यादा हो गए और पानेवाले कम तो क्या करें! मेकअप मैन, स्पॉट ब्वॉय को भी पकड़ो और दे डालो, दादासाहेब अवॉर्ड। वो भी गर्व से कहता मिल जाएगा कि उसे दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड मिला है। उसकी सीवी में बाकायदा इसका जिक्र रहता है। एक आर्ट डायरेक्टर पुराने परिचित हैं। छोटी-मोटी काफी फिल्में कर चुके हैं। संख्या १०० से ऊपर ही होगी। किसी सीरियल के सिलसिले में जब उनका सीवी देखा तो वहां दादासाहेब फालके अवॉर्ड का जिक्र देखकर चौंकना स्वाभाविक था, फिर इस गोरखधंधे का पता चला। तो ऐसा धंधा चल रहा है। ये अवॉर्ड देना और लेना दोनों ही एक खुजली है। अब यह खुजली जब जोर पकड़ती है तो फिर खेल-तमाशे होंगे ही, पर इसी तमाशे के बीच कुछ आंखें उठेंगी और कहेंगी, अवॉर्ड मना है!