आंखों देखी… खिड़की

दृश्य १
हर घर की खिड़की कुछ कहती है। ये खिड़की सुख-दुख, हंसी-मजाक, चहल-पहल, मनभावन दृश्यों के अतिरिक्त सूनेपन और नीरसता की भी साक्षी है। कभी गौर किया है आपने अपने घर की खिड़की की ओर? आप घर से बाहर जो कुछ भी देखते हैं, उसमें खिड़की ही माध्यम है। खिड़की जीवन के रंग या बेरंग, दोनों दिखाती है।
मैं खिड़की में बैठा था। घर वाली गली ज्यादा संकरी भी नहीं है लेकिन डबल पार्विंâग गाड़ियों की वजह से कई बार मुसीबत खड़ी हो जाती है। ऐसा ही एक वाकया हुआ।
सायरन बजाती दमकलकर्मियों से लदी एक गाड़ी गली में आयी। सायरन की आवाज सुनकर खिड़की में आना स्वाभाविक था। देखा तो किसी ने अपनी कार डबल पार्विंâग में खड़ी की हुई थी, जिससे दमकल की गाड़ी गली के अंदर नहीं जा पा रही थी। सायरन की आवाज बंद करके दमकलकर्मियों ने आवाज देनी शुरू की। ‘कोणा ची गाड़ी आहे ही?’ (ये किसकी गाड़ी है?) लेकिन कहीं से कोई सुगबुगाहट नहीं हुई। आसपास के लोग भी चिल्लाने लगे। तब किसी की सूचना पर एक महिला गाड़ी की चाभी लेकर उतरी और बताया कि उसके पति घर पर नहीं हैं। कोई गाड़ी रास्ते से एक ओर कर ले, उसे गाड़ी चलाने नहीं आती। तुरंत एक व्यक्ति ने चाभी ली। गाड़ी स्टार्ट करके रास्ते के एक ओर लगा दी। दमकलकर्मियों ने उस वक्त उस महिला से कुछ बोलना उचित नहीं समझा क्योंकि उन्हें ‘कॉल’ पर तुरंत पहुंचना था।
इस दौरान लोग दमकल की गाड़ी के रास्ते में आनेवाली मोटरसाइकिल और रास्ते में रखे डिब्बे आदि सामान हटाने में जुट गए। पास में खड़ी एक बुजुर्ग महिला जिनकी उम्र लगभग ८० साल की रही होगी, वह भी खड़ी होकर सारा माजरा देख रही थीं। सबको काम करते देख शायद उन्हें भी उनके काम में हाथ बंटाने की सूझी। अपनी उम्र और ताकत को नजरअंदाज करके उन्होंने तीन बड़ी सी लाल र्इंटों को रास्ते से हटाया। शायद कुछ बच्चों ने क्रिकेट खेलने के लिए उन र्इंटों को स्टंप बनाया था। खैर, एक के बाद एक तीन र्इंटों को उठाकर सड़क के एक किनारे रखने में ही उस वृद्धा की सांसें फूल गर्इं। फिर भी उनके चेहरे पर सुकून का भाव था। दमकल की गाड़ी सायरन बजाते अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गई।
मुझे उस गिलहरी की याद आ गई जिसने राम सेतु बनाते वक्त एक-एक करके कई कंकर समुद्र में डालने का योगदान दिया था। शायद आज वो गिलहरी बूढ़ी हो चुकी थी लेकिन कहा गया है न कि ‘राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहां बिश्राम’!
हर सद्कार्य राम काज ही होता है। हमें विवेक को जागृत रखते हुए कंकर-कंकर जुटाना पड़ता है या रास्ते से हटाना पड़ता है।
दृश्य २
घर की बालकनी में बैठा था। मेरे घर के पास ही एक नामचीन स्कूल है। स्कूल में शायद बच्चों का पैंâसी ड्रेस आदि कार्यक्रम रहा होगा। कई बच्चे कृष्ण और राधा बनकर स्कूल से लौट रहे थे।
इसी बीच एक ‘राधा’ नाराज हो गई। सजी-धजी राधा रो रही थी क्योंकि नटखट ‘कृष्ण’ ने स्कूल से मिली चॉकलेट अकेले हजम कर ली थी। अब बालकृष्ण की ‘यशोदा’ मैया राधा को दूसरा अच्छावाला चॉकलेट देने का आश्वासन देते हुए उसे चुप कराने लगीं।
राधा अब शांत हो गई और कृष्ण से पुन: दोस्ती कर उनके हाथ में हाथ डाले चल रही है…!
कृष्ण आज भी नटखट हैं…
राधा आज भी कृष्ण प्रेम में दीवानी…!