आंखों देखी… परेशानियों पर पैबंद

अपनी इच्छाओं और ममत्व के बीच जब किसी एक को चुनना हो तो अकसर ममता जीत जाती है। इच्छाओं पर ममत्व का पैबंद लगता रहता है। अपनी महत्वाकांक्षाओं की तिलांजलि देकर अपने बच्चों की इच्छाओं की पूर्ति करने का संस्कार इस पावन धरा की परंपरा रही है। आहत, दमित और पीड़ित जीवन धैर्य या कुंठा का मीत बन जाता है। इसकी एक बानगी देखने को मिली।
हाल ही में दिवाली का त्योहार संपन्न हुआ। इस दौरान सभी ने खरीददारी की। स्टेशन के करीब बाजार में कपड़ों की एक बहुत पुरानी दुकान है। उस दुकान में प्रवेश किया। दुकान साफ-सुथरी थी। पुराने फर्नीचरों में करीने से रखे गए कपड़े दुकान की शोभा बढ़ा रहे थे। ये दुकान अपने औसत दाम लेकिन अच्छे कपड़ों के लिए मशहूर है। `उधार मांगकर शर्मिंदा न करें’, `आज नगद-कल उधार’ जैसे घोषवाक्यों के साथ ही कई डिजिटल पेमेंट के स्टीकरों से दुकान सजी हुई थी। भगवान की तस्वीरों के अलावा नींबू-मिर्च एक धागे के सहारे लटका हुआ था। नजर लगानेवालों से लड़ते-लड़ते नींबू लगभग सूख चुका था। इस तरह की दुकानों में दिखनेवाला आम बुजुर्ग का एक चेहरा यहां भी मौजूद था। बुजुर्ग दुकान की `मुद्रागद्दी’ पर विराजमान थे। सेल्समैन अलग-अलग वेरायटी के कपड़े दिखा रहा था। मैंने कपड़ों को पसंद करना शुरू किया। बुजुर्ग की `मुद्रागद्दी’ की दराज में छोटी-छोटी कटोरीनुमा व्यवस्था बनी थी जिसमें कई सिक्के रखे हुए थे। बुजुर्ग समय-समय पर कुछ छुट्टे पैसे उठाते और पूरा हाथ बाहर न निकालते हुए फिर से सिक्कों को वापस कटोरी में डाल देते। सिक्कों के गिरने से छन-छन की आवाज होती रही। काउंटर पर गौसेवा के लिए एक छोटी-सी दानपेटी रखी हुई थी, जिसमें १०-२० के कुछ नोट और एक सौ का नोट कुछ धर्मानुरागियों ने दानस्वरूप डाला हुआ था।
`मम्मी वो देख, ये वाला!’
एक छोटी बच्ची अपनी मां का हाथ पकड़े दुकान के शो पीस में लगे कपड़े को दिखाकर दुकान में घुस जाना चाहती थी। उसकी मां हिचकते हुए दुकान में आई। दिखने में महिला दिहाड़ी मजदूर या फुटकर व्यवसाय करनेवाली प्रतीत होती थी।
`ये वाली प्रâॉक कितने की है?’ मैली-सी साड़ी पहनी उस गरीब महिला ने बच्ची के
प्रâॉक की कीमत धीमे स्वर में पूछी।
`९०० की है!’ महिला के कपड़ों से उसकी हैसियत मापकर सेल्समैन ने बड़ा रूखा सा जवाब दिया।
महिला का दिल धक कर गया। चेहरा मानो सूख गया।
फिर वो दुकान में कुछ और प्रâॉक देखती रही और सबकी कीमत पूछती रही। इधर मैंने शर्ट पसंद कर लिया था लेकिन फिर भी मैं वहां थोड़ी देर रुकना चाहता था। उधर महिला ने अपनी बिटिया को एक सस्तेवाला प्रâॉक ये कहकर खरीदने को तैयार कर लिया कि ये प्रâॉक उसपर बहुत फब रहा है। बिटिया तो इसी में खुश थी कि उसे नया प्रâॉक मिल रहा है। प्रâॉक खरीद लिया गया।
महिला ने फुटकर आदि गिनकर प्रâॉक के पैसे चुकाए।
`आपके पास सुई-धागा मिलेगा क्या?’ महिला ने सेल्समैन से फिर पूछा।
`क्यों?’ सेल्समैन का सवाल।
`नहीं, वो मेरी साड़ी थोड़ी-सी फट गई है न, उसी पर पैबंद लगाना था।’
`सुई-धागा मिलेगा। ५० रुपए का सेट है।’ ये सेल्समैन का जवाब था।
`ओह, कोई बात नहीं मैं बाद में खरीद लूंगी।’ शायद उसके पास पैसे कम थे। महिला ने बिटिया का हाथ पकड़ा और दुकान से बाहर निकल गई। फटी साड़ी पहनी मां ने अपनी बेटी का हाथ मजबूती से पकड़ा हुआ था। नया प्रâॉक लेकर बिटिया लगभग उछलती हुई चल रही थी और वह महिला सुई-धागा भी नहीं खरीद पाई कि अपनी साड़ी पर पैबंद लगा सके।
मैं सोच रहा था कि कैसा होता जो उसे अपनी तकदीर का पैबंद सिलने का हक मिल पाता, परेशानियों की फटेहाली पर वह खुशी का पैबंद सिल लेती…!