आखिर कब तक…?

इस बार संयुक्त राष्ट्र आम सभा में दुनिया की नजरें हिंदुस्थान और पाकिस्तान पर ही थीं। कारण था कश्मीर का ताजातरीन मामला। कश्मीर हिंदुस्थान का अभिन्न अंग है, आंतरिक मसला है। इसलिए इस पर क्या निर्णय लेना है, क्या करना है, यह हिंदुस्थान का निजी विषय है। संयुक्त राष्ट्र भी यह मानता रहा है पर पाकिस्तान ने इसे हमेशा सिरे से खारिज किया है। विभाजन के वक्त से आज तक वो कश्मीर को लेकर अड़ा है। संयुक्त राष्ट्र में भी उसका यही रोना रहा है। कश्मीर कुचक्र का प्रायोजित कार्यक्रम चलाते-चलाते वो आज इस हद तक बढ़ गया है कि अब वो जानते-बूझते आतंकी आकाओं, उनकी खूनी ख्वाहिशों, जिहादी जुनून और विषैली विचारधारा का ही ‘खुले मंच’ समर्थन करने लगा है। वो शह देने लगा है कट्टरवादी इस्लामी आतंकवाद को, जायज ठहराने लगा है इस नाजायज वैश्विक जंग को। वो जहरीले ‘जिहाद’ को इस्लाम हित में बताने लगा है। दुनिया जिससे बुरी तरह परेशान है, पीड़ित है उस खूनी खुराफात को वो ‘धर्म’ का जामा पहनाने लगा है। इस बार भी संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के ‘ताजातरीन’ वजीर-ए-आजम इमरान खान ने इस्लामी ‘जिहाद’ की जमकर वकालत की। उसे पाक साफ बताने का कोई मौका नहीं छोड़ा और उसे हर तरह की सियासी मान्यता देने का वैश्विक कबूलनामा मंच से ही स्वीकार कर लिया। इमरान की इन हरकतों से एकबारगी तो दुनिया का सभ्य समाज चकित हुआ। परंतु आतंक-पोषण के नापाकी पुराने पन्नों को पढ़ चुके विश्व को इस पर कोई खास अचरज भी नहीं हुआ।
१९४७ में जब हिंदुस्थान का बंटवारा हुआ था तब कश्मीर का हिंदुस्थान में पूर्ण विलय हो चुका था। यदि उसी वक्त पाकिस्तान इस सच्चाई को मान लेता कि कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य होने के बावजूद आज उसका हिस्सा नहीं है और महाराजा हरि सिंह ने अन्य रजवाड़ों की तरह ही हिंदुस्थान में अपने साम्राज्य का पूर्ण विलय कर दिया है तो आज पाकिस्तान की सूरत कुछ और होती। वो अपने नापाकी मंसूबों पर खर्च करने की बजाए तरक्की की राह पर निवेश कर रहा होता। उसे कश्मीर के एक झूठ के लिए हजार झूठ का सहारा न लेना पड़ता। बलोचों की समस्या भी शायद तब इस हद तक न बढ़ती, क्योंकि तब कश्मीर पर भ्रम और जिहाद पैâलाने की बजाए पाकिस्तान बलूचिस्तान का विकास करने के लिए समय और पैसा खर्च करने की सूरत में होता। सिंध भी तब नाराज न होगा। न ही खैबर पख्तूनखा में विद्रोह हो रहे होते। तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर हमारा मजाक उड़ाने की बजाए वो इस क्षेत्र में हिंदुस्थान से स्वच्छ प्रतिस्पर्धा कर रहा होता। औद्योगीकरण में भी वो हमसे मुकाबले की स्थिति में होता। और तो और तब उसे विस्तारवादी ड्रैगन के लालच का निवाला न बनना पड़ता। आज पाकिस्तान उसके जबड़ों में फंसा अपने वजूद को छटपटा रहा है। पाकिस्तान ने एक असत्य त्याग दिया होता तो वो कश्मीर से ज्यादा और बहुत कुछ हासिल कर चुका होता। आज जब एक छोटा-सा इजराइल यदि पूरी दुनिया में अपनी उपस्थिति का लोहा मनवा सकता है तो क्या कश्मीर-बलोचिस्तान रहित पाकिस्तान क्षेत्रफल में छोटा रहकर यह नहीं कर सकता था? क्या वो वैश्विक मंडी में अपने हुनर का हिस्सा हासिल नहीं कर सकता था? उसने जानबूझकर ऐसे सुनहरे विकास वाला भविष्य त्यागकर मुफलिसी वाले विनाश का रास्ता चुना और उस पर उसने अपनी आवाम को भी धकेल दिया। कश्मीर पर झूठ बोया, काटा और उसे ही अपनी पुश्तों को खिलाया भी। आज समय आ गया है पाकिस्तानी आवाम को अपने हुक्मरानों से सवाल करने का, सेना से सीना तानकर पूछने का कि कश्मीर पर बेजा मोह पालकर उन्होंने पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को क्या दिया भला? कश्मीर-कश्मीर करके आज तक पाकिस्तान के लिए क्या हासिल किया भला? हमें गुरबत में रखकर गूरूर से क्या मिला? आवाम को पूछना चाहिए उनसे कि कश्मीर पर पाकिस्तान के पास क्या लीगल स्टैंड है? क्या पॉलीटिकल स्टैंड है? कोई स्ट्रैटेजिक स्टैंड भी है क्या कश्मीर पर या कोई मोरल स्टैंड ही हो तो बताएं? सिर्फ रिलिजियस स्टैंड पर, इस्लामिक इमोशनल इश्यू बनाकर इस मुद्दे को कब तक चलाया जाएगा? कब तक चुनाव जीतने और नाकामयाबियों को छिपाने के लिए इसे भुनाया जाएगा?