" /> आतंकवाद का खात्मा जरूरी!

आतंकवाद का खात्मा जरूरी!

कुदरत के खेल बड़े निराले हैं। जो किसी ने कभी ख्वाब-ओ-ख्याल में नहीं सोचा होगा वो अमेरिका और अमेरिका से जुड़ी मुस्लिम राजनीति में हुआ है। अंतरराष्ट्रीय आतंक का पर्याय रहे ओसामा बिन लादेन से बेइंतहा नफरत करने वाले अमेरिका को आतंकवाद से दूर रखने के लिए ओसामा बिन लादेन की भतीजी का बयान पूरे विश्व में चर्चा का विषय बन गया है। आतंकी ओसामा बिन लादेन की भतीजी नूर बिन लादिन का मानना है कि अमेरिका को अगले ९/११ से सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप ही बचा सकते हैं। नूर ओसामा के सौतेले बड़े भाई यसलाम बिन लादिन की बेटी हैं। अपने चाचा के खराब कारनामों और लादेन नाम से नफरत को देखते हुए नूर ने अपना सरनेम लादेन से बदलकर लादिन कर लिया है। वह नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें या उनके परिवार को लादेन के परिवार से जोड़े। ज्ञात हो कि इस्लाम के नाम पर जिहाद करने वाले ओसामा ओसामा बिन लादेन की अगुवाई वाले आतंकी संगठन ‘अलकायदा’ ने ११ सितंबर २००१ को अमेरिका में ४ हमले किए थे। इन आतंकी हमलों में २,९७७ लोगों की मौत हो गई थी, जबकि २५ हजार से ज्यादा लोग घायल हुए थे। उस घटना के बाद से ही अमेरिका ने ओसामा के खिलाफ खोजी अभियान चलाया और आखिरकार साल २०११ में उसे पाकिस्तान में मारकर अपने निरपराध नागरिकों की मौत का बदला ले लिया। जिस इस्लाम की गलत व्याख्या को ओसामा ने अपनाया उस इस्लाम को शायद इस्लाम की जन्मस्थली सऊदी अरब ने भी नकार दिया। खुद सऊदी अरब ने भी ओसामा का शव लेने से इनकार कर दिया था जबकि ओसामा सऊदी नागरिक ही था। आज उसी ओसामा की भतीजी ने ओसामा की विचारधारा को खारिज कर दिया है। इतना ही नहीं, इस से एक कदम आगे बढ़कर उसने अमेरिका की आतंकवाद से हिफाजत को ज्यादा अहमियत दी है।
ऐसा नहीं है कि ट्रंप ओसामा विरोधी हैं और उनके प्रतिद्वंद्वी बिडेन ने ओसामा का समर्थन किया हो। नूर मानती हैं कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौर में आतंकवाद ज्यादा तेजी से फैला। कारण कुछ भी हो लेकिन ओसामा की भतीजी ने उसी का खून होते हुए भी अमेरिका से अपने प्रेम का इजहार किया है। नूर अमेरिका को दिलोजान से चाहने का दावा करती हैं। जब अमेरिका में ९/११ हमला हुआ था, तब वे केवल १४ साल की थीं। उनके दिमाग में तभी से अपने चाचा के कारनामों से नफरत भर गई जो आज खुलकर सामने आ गई है। दरअसल अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होना है और वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। ट्रंप से पहले बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे। उनके कार्यकाल में उपराष्ट्रपति रहे जोसेफ बिडेन ट्रंप के सामने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। ऐसे में आतंक रोकने के नाम पर ट्रंप के समर्थन में उतरकर नूर ने ओसामा विचारधारा के इस्लाम को नकार दिया है। नूर लेखिका हैं, बुद्धिजीवी हैं, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि वह इस्लाम को बेहतर समझती होंगी। ट्रंप का समर्थन करना अलग मसला हो सकता है, लेकिन नूर का आतंकवाद के खात्मे की बात करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
बात केवल नूर की नहीं बल्कि पूरे आलम-ए-इस्लाम की है। ओसामा या अन्य कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरुओं की व्याख्या से अलग सही इस्लाम ने समाजी इत्तेहाद को हमेशा सर्वोपरि बताया है। यहां तक कि पवित्र कुरआन के शब्दों में गिरोही या नस्लीय पूर्वाग्रहों को अल्लाह का अज़ाब कहा गया है। रोचक और विचित्र बात यह है कि मुस्लिम समाज संप्रदायों या व्यक्तिगत हितों के आधार पर या फिरके के आधार पर विभाजित है, जबकि गैर-मुस्लिम दुनिया उन्हें सुन्नी, शिया, बरेलवी, अहले हदीस की नजर से नहीं देखती, न ही यह लोग तुर्की, पाकिस्तानी, अरबी, ईरानी की नजर से देखे जाते हैं। उन्हें सिर्फ मुसलमान समझा जाता है। दुर्भाग्य से मुस्लिम समाज के किसी भी हिंसक गिरोह का जिम्मेदार हर मुसलमान को मान लिया जाता है, लेकिन दरहकीकत मुसलमान खुद एक उलझी हुई कौम बनकर रह गई है। उसे सही इस्लाम के जिस रास्ते पर चलना चाहिए उसे छोड़कर उसके युवा जिहाद की गलत की गई व्याख्या से जुड़े इस्लाम की तरफ जल्दी आकर्षित होते हैं। ऐसे युवा गरीबी, भटकी हुई शिक्षाप्रणाली और फिरकावाराना धर्मगुरुओं की किताबों के जाल में फंसकर अलकायदा, आइसिस जैसे आतंकी संघटनों का मोहरा बनते हैं और उनके कर्मों का खामियाजा आम मुसलमानों को भुगतना पड़ता है। जलील आम मुसलमान होते हैं। लेकिन सही इस्लाम की समझ रखने वाले अधिकांश युवा और बुद्धिजीवी मोहम्मद साहब की वफात के सौ-दो सौ साल बाद रची-गढ़ी गई इस्लामी मान्यताओं और रीति-रिवाजों से आजादी चाहते हैं और उसके लिए मुखर भी हो रहे हैं। शायद इसी मर्म को ओसामा की भतीजी नूर ने पकड़ा है।
दूसरी बात यह है कि मुसलमानों के कर्मों को आधार मानकर और इस्लाम को लेकर फैली भ्रांतियां भी मुस्लिम समाज को लेकर पैदा होने वाले विवाद के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। मजहबी गिरोहबंदियों और संप्रदायवाद को इस्लामी नजरिये से देखना और इस्लाम से संप्रदायवादी पूर्वाग्रहों को साबित करने की कोशिश करना कभी भी इस्लाम का सही अर्थ नहीं कहा जा सकता। ऐसा करने के कई विपरीत परिणाम आंखों के सामने हैं। इस्लाम के जिहाद को गलत अर्थों में पेश कर इस्लामी मुल्कों की कल्पना करने वालों ने भी इस्लाम और मुसलमानों को कम नुकसान नहीं पहुंचाया है। धर्म के आधार पर देश बनाने का मंसूबा और उसका नतीजा दोनों, पाकिस्तान को देखकर समझा जा सकता है। पाकिस्तान बनाने का मतलब था कि यह धर्म ही उनका समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति का आधार बन जाएगा। लेकिन व्यवहार में हुआ क्या? आधी सदी से भी अधिक समय के बाद भी आम पाकिस्तानी मुसलमान उस मंजिल तक नहीं पहुंच पाए हैं, जिसकी देश को तलाश थी। रंगीन और हसीन सपने दिखाकर मुल्क बन तो जाता है लेकिन उसका हश्र पाकिस्तान सा होता है यह अब किसी से छुपा नहीं है। फिर भी पाकिस्तानी और विश्व भर में फैले कुछ आतंकवादी समर्थक इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं। आखिर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के दो बड़े चेहरे दाऊद इब्राहिम और ओसामा को पाकिस्तान में शरण किस आधार पर मिली क्या इसका कोई तर्क है? क्या असल इस्लाम की शिक्षा प्राप्त कोई मुस्लिम देश ऐसा करता? असल इस्लाम तो बेकसूरों का खून बहाने वालों को सख्त सजा देने का हिमायती है। इस आधार पर ओसामा और दाऊद किस श्रेणी में रखे जाएंगे यह शायद बताने की जरूरत भी नहीं है।
कहने को तो दुनिया का हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है। दुनिया में लगभग डेढ़ अरब मुसलमान हैं। कई इस्लामी मुल्कों के पास अच्छा खनिज और कृषि संसाधन हैं। मुसलमानों की सबसे अच्छी भौगोलिक स्थिति यह है कि पूर्व से पश्चिम तक सभी मुस्लिम देश आपस में जुड़े हुए हैं। उनका केंद्र और धुरी इस्लामिक दुनिया के बीच में काबा शरीफ है। शिक्षित मुसलमानों के पास दुनिया को समझने की अच्छी मानसिक और बौद्धिक क्षमता भी है, लेकिन इन सब के बावजूद, मुस्लिम देश परेशानहाल हैं। चीन, अमेरिका और रूस जैसे देशों की गिरोहबाजी में उलझे हुए हैं। वजह यही है कि सबका अपना-अपना एजेंडा है। इसलिए जब भी पाकिस्तान या किसी मुस्लिम मुल्क से धर्म की अफीम हवा में उछाली जाए, इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश की जाए, तो सबसे पहले उन्हें उनके प्रतिद्वंद्वी मुस्लमि मुमालिक से बेहतर संबंध क्यों नहीं हैं, क्या यह सवाल पूछा जाना चाहिए। ईरान-ईराक, सऊदी अरब-तुर्की, पाकिस्तान-बांग्लादेश की आपसी रंजिश का उदहारण सामने है। मुस्लिम समाज की समस्या है वह खुलकर मूल मुद्दों पर नहीं मुखर होता जबकि बेकार के मुद्दों पर सड़कों पर उतर आता है। उसे कानून तो सब पैगंबर मोहम्मद साहब के जमाने के लागू करवाने होते हैं लेकिन चलना पश्चिमी देशों के नक्श-ए-कदम पर होता है। यही ऊहापोह और दोहरा मापदंड उसे दुनिया से अलग कर देता है। लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। ३३ साल की युवती नूर ने मूल इस्लाम से अलग, मौलवियों द्वारा प्रचलित इस्लाम के प्रचारक ओसामा की मानसिकता को जिस तरह नकारा है, उसी तरह बुद्धिजीवी मुसलमानों की नई पीढ़ी भी उभरकर सामने आएगी और आ भी रही है। वह इस्लाम को लेकर फैली कई गलतफहमियों को दूर करेगी। वक्त करवट ले रहा है। आतंकवाद के सरगना रहे किसी शख्स का खून अगर आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाता है तो यह केवल स्वागतयोग्य ही नहीं, बल्कि प्रशंसनीय भी है।