आपका भी ‘विशेष दर्जा’ खत्म हुआ!

सरकार को कश्मीर के संवेदनशील हिस्सों से तुरंत गैरकानूनी कर्फ्यू उठा लेना चाहिए, अविलंब धारा १४४ की सख्ती हटा लेनी चाहिए, सारे लैंडलाइन-मोबाइल तुरंत चालू कर देने चाहिए और तो और तमाम सुरक्षा व्यवस्था को भी वापस ले लेना चाहिए। क्यों? क्योंकि इससे ‘उदारवादी’ समाज को ठेस पहुंचती है, ‘लिबरल’ नजरिए में मानवाधिकार का उल्लंघन होता है, प्रशासकीय पारदर्शिता पर पर्दा पड़ता है, कश्मीरियोंं को रोजमर्रा के कामों में दिक्कतें पेश आती हैं, मरीजों को पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता, वगैरह-वगैरह…। जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा खत्म हुए एक महीना बीत गया और इस महीने भर देश का कथित उदारवादी वर्ग यही ‘सुधारवादी’ सुझाव सार्वजनिक करता रहा है। अब चूंकि फैसले को महीना बीत चुका है तो स्वाभाविक है लोग हालात का विश्लेषण तो करेंगे ही। परिस्थितियों का पोस्टमार्टम भी होगा ही। इस पर सार्वजनिक चर्चाएं भी होंगी, हो भी रही हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं। तकरीबन पूरा देश ही सरकार के सकारात्मक प्रयासों की प्रशंसा कर रहा है। इसमें मीडिया और बुद्धिजीवियों का वो वर्ग भी शामिल है जो परिस्थितियों की सूझबूझ रखता है, उसमें हालात के धीरे-धीरे सुधरने का भरोसा है। इससे उलट कथित बुद्धिजीवियों और ‘राष्ट्रीय’ मीडिया का वो वर्ग भी है जो खुद ही को २१वीं सदी की ‘उदारवादी’ सोच का झंडाबरदार मानता है। उस कथित सोचवाले वर्ग में कश्मीर पर तुरंत नतीजे की हठ है, सरकार को ‘फेल’ और खुद को ‘पास’ बताने का उतावलापन है। इसी उतावलेपन में यह वर्ग विशेष कश्मीर के हालात बिगाड़ने का ‘खेल’ खेल रहा है, राष्ट्रद्रोही ‘मंच’ बन रहा है। दरअसल इस वर्ग में गम कश्मीर के विशेष दर्जे के खत्म होने का नहीं बल्कि खुद को मिले ‘विशेष दर्जे’ के अंत का है।
हो सकता है कश्मीर के हवाले से आ रहे कुछ तर्क तार्किक हों। वहां हालात बिल्कुल सामान्य न हों, तब भी वे पूरी तरह नियंत्रण में तो हैं ही, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। भावनाओं का जो विस्फोट वहां अपेक्षित था, उसे काफी हद तक ‘निष्प्रभावी’ करने में सरकार सफल रही है। आगे भी हालात नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास वक्त ही बेहतर विकल्प है। केवल देश के ‘प्रबुद्ध’ वर्ग के उतावलेपन के फेरे में आकर घाटी को तुरंत नियंत्रण मुक्त कर देना बेहद आत्मघाती कदम होगा, यह किसी भी लिहाज से सही नहीं है। जो जहर कश्मीरियों के जेहन में लगातार ७ दशकों से ओता गया है, उसे महज ७ दिनों में निकाल लेने की आशा पालना कोरी मूर्खता है। इसीलिए कश्मीर में चुटकियों में सबकुछ सामान्य हो जाना चाहिए, यह ‘प्रबुद्ध हठ’ आम हिंदुस्थानी की समझ से भी परे है। वो पूछ रहा है कि क्या ७० वर्षों का जहर काबू करने के लिए ७० दिनों का समय भी नहीं लगेगा? आज जनता इन ‘लिबरल’ झंडाबरदारों से जानना चाहती है कि पानी पी-पीकर सरकार के फैसले को कोसनेवाले कश्मीर की सड़कों पर क्या आतंक का नंगा नाच देखना चाहते हैं? क्या वे पाबंदियां हटवाकर असामाजिक तत्वों को कश्मीर जलाने की छूट दिलवाना चाहते हैं? क्या घाटी को फिर उसी स्वार्थी सियासत के हवाले करना चाहते हैं जो उसको हमेशा बारूद का ढेर बनाए रखना चाहती है? क्या दुराव के दाने डालनेवाले ‘खानदानों’ को कश्मीरी भाईचारे में आग लगाने की मोहलत दिलवाना चाहते हैं? आखिर क्यों मानवाधिकार और पारदर्शिता के नाम पर कश्मीर को मारने-मरने के लिए खुला छुड़वाना चाहते हैं? कश्मीर जलेगा तब जाकर क्या इस ‘प्रबुद्ध’ वर्ग के सीने में ठंडक पहुंचेगी? क्या इससे अस्पतालों में मरीजों-घायलों की भीड़ खत्म हो जाएगी? सभी को इत्मीनान से इलाज मिलने लगेगा क्या? क्या कश्मीर के बाजार इससे गुलजार हो उठेंगे? स्कूलों में रौनक लौट आएगी? असलियत यह है कि ये ‘उदारवादी’ वर्ग सरकार से वही कराना चाहता है जो उसकी सोच के लिए सहूलियतवाला हो, देश के लिए हो न हो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
एक बारगी मान भी लिया जाए कि नए दौर के नए लिबरल्स के ‘रबिश’ तर्कों और सुझावों पर यदि सरकार अमल कर भी ले तो क्या जम्मू-कश्मीर के हालात नॉर्मल हो जाएंगे? क्या अलगाववादी आकर तुमसे गले मिलने लगेंगे? क्या सारी पाबंदियां हटा लेने के बाद अलगाववादी और स्वार्थी सियासत हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहेगी? गुमराह कश्मीरी तुरंत राष्ट्रभक्ति का गीत गाने लगेंगे? कल ही से उत्सव मनाने लगेंगे? अलगाववादी सबकुछ भुलाकर डाउनटाउन से शांति के ‘सेब’ खरीद रहे होंगे। कश्मीर जलाने के लिए ‘अधीर’ बैठा पाकिस्तान क्या चुपचाप अंगूठा चूस रहा होगा? वो कश्मीर क्रंदन छोड़ अपने देश के आर्थिक सुधार में जुटा होगा? कश्मीर में विनाश की रोपाई छोड़कर विकास के कामों में सहयोग दे रहा होगा? जो देश लगातार, दिन-रात घुसपैठ कराकर घाटी को जलाना चाहता है वो क्या शांति की नमाज पढ़ रहा होगा? जो इमरान खान चंद दिनों बाद होनेवाली संयुक्त राष्ट्र की आम सभा से पहले दुनिया को कश्मीर आक्रोशित दिखाना चाहता है, वहां लोगों को मरता हुआ दिखाना चाहता है वो क्या तुम्हारे ‘राय’ से राय-मशविरा करके हिंदुस्थान के साथ प्रâेंडली क्रिकेट खेल रहा होगा? तब क्या उसके जिहादी धमाकों से कश्मीरियों की नस्लें तबाह होना थम जाएंगी? संचार माध्यमों को पुनर्स्थापित कर देने पर क्या वहां अलगाववादी लामबंदी, हिंसक अफवाहें और राष्ट्रविरोधी फेक न्यूज पैâलाने में मदद बंद हो जाएगी, नहीं न? फिर भी क्यों जारी है इस ‘उतावले’ तबके की ‘उदारवादी’ हठ? दरअसल, इन कथित लिबरल्स का कोहराम कश्मीर हित के लिए नहीं है बल्कि खुद को ‘सच्चाई’ का लिबरल झंडाबरदार साबित करके ‘अंतर्राष्ट्रीय सम्मान’ पाने की होड़ है। इसी होड़ में कभी पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा को ही लाइव कर दिया जाता है, तो कभी अलगाववादी सोच के पढ़े-लिखे गुमराहों के कुतर्कों को आम। और फिर उनके मुंह में अपने मनचाहे सवाल ठूंस-ठूंसकर देश-दुनिया को यह जतलाने का पुरजोर प्रयास होता है कि हिंदुस्थान की सरकार झूठी है, उसके दावे झूठे हैं, उसकी करनी में खोट है। और तो और उनके अलावा सारा मीडिया ‘गोदी’ मीडिया है। सच है तो केवल उनका नजरिया, उनकी सोच, उनकी दिखाई हुई खबरें व रिपोर्ट एवं उनके ‘प्यारे’ अलगाववादियों का बताया हुआ ‘सच’। यह कथित लिबरल लॉबी हरदम इसी हठ पर रहती है कि वो जो कुछ दर्शाना चाहती है, जो वे देखते हैं, देखना चाहते हैं और दिखाना चाहते हैं वही घटित होना चाहिए, उससे अलग कुछ भी उन्हें बर्दाश्त नहीं। वे यदि बोल रहे हैं कि कश्मीर जल रहा है तो कश्मीर जलना चाहिए, इसके लिए वहां लगी प्रशासकीय पाबंदियों को हटाना जरूरी हो तो तुरंत हटा दिया जाना चाहिए। अन्यथा कश्मीरियों के साथ सरकार का रवैया अन्यायपूर्ण करार दिया जाएगा। सरकार को दमनकारी माना जाएगा। दुर्भाग्य से यदि उनके मन-मुताबिक नहीं होता तब उनकी वैचारिक सहिष्णुता जवाब दे देती है। तब वे अपने मंच पर ही नफरत की नुमाइश शुरू कर देते हैं।
सच्चाई यह है कि कश्मीर में हालात नियंत्रित होंगे तो सरकार की सामयिक और सकारात्मक नीति से ही होंगे। जो राष्ट्रहित में होगा वहां वही किया जाएगा और जो राष्ट्रहित में नहीं होता वह कभी सकारात्मक नहीं हो सकता। यह सिर्फ आम हिंदुस्थानी की सोच नहीं है, बल्कि दुनिया के हर देश का नागरिक, माफ कीजिएगा, सच्चा नागरिक यही सोच रखता है और दुनिया का हर मुल्क इसी सोच से चलता है। इसलिए ऐसे ‘उदारवादी’ वर्ग को चाहिए कि वो अलगाववादियों की आवाज बनने की बजाय राष्ट्र की आवाज बने। देश का ‘उतावला’ मीडिया परिस्थितियों का पोस्टमार्टम करना ही चाहता है तो सकारात्मक दृष्टिकोण से करे। दूसरों को ‘गोदी मीडिया’ की संज्ञा देनेवाला यह सोचना छोड़ दे कि राष्ट्रहित की बात करना यानी सरकार की गोद में बैठना है। ऐसा है भी तो यूपीए के कार्यकाल में खुद कौन-सी गोद में थे उसका भी एक बार ईमानदारी से लाइव मूल्यांकन कर लिया जाए। याद रहे नकारात्मकता वैचारिक नर्क में ले जाती है। घाटी के मात्र ४ जिलों की चंद बस्तियों में सारा कश्मीर नहीं बसता, कश्मीर देखना है तो उससे बाहर निकलकर, अलगाववादियों के दायरे से उठकर जम्मू और लद्दाख तक नजर दौड़ानी पड़ती है। आज देश के इस प्रबुद्ध वर्ग के लिए अपनी कथित संकीर्ण सोच पर लगे ‘कर्फ्यू’ को हटाने का समय आ गया है। समय आ गया है ‘ देश के सच’ को साकार करने का। अपने ‘विशेष’ वायरस को जेहन से निकालकर, अपनी आत्मा में लगे ‘अनुच्छेद ३७०’ को निष्प्रभावी करने का। अगर आपने ऐसा कर लिया तो राष्ट्र की मुसीबत भी खत्म हो जाएगी और खुद आपकी सोच की भी।याद रहे आपका ‘विशेष दर्जा’ भी खत्म हो चुका है!