" /> आमची मुंबई : …और स्पेनिश लेडी मुंबई में घुस गई

आमची मुंबई : …और स्पेनिश लेडी मुंबई में घुस गई

१९१८ के मुंबई फ्लू की कहानी

पुलिस अस्पताल, मुंबई में १० जून, १९१८ को ७ पुलिसकर्मी भर्ती कराए गए। इन सबकी ड्यूटी गोदी में लगी थी। इन्हें बुखार के साथ पूरे शरीर में दर्द की शिकायत थी, पर इनका बुखार मलेरिया नहीं था। डॉक्टरों के अनुसार ये कुछ अजीब तरह की बीमारी थी, जो कि दवा से काबू नहीं हो रही थी। पांच दिन बाद एक शिपिंग कंपनी डब्ल्यू एंड ए ग्राहम कंपनी के कुछ कर्मचारी भी बीमार पड़ गए। फिर मुंबई पोर्ट ट्रस्ट, हांगकांग एंड शंघाई बैंक, टेलीग्राफ ऑफिस, टकसाल, रैशेल ससून मिल के कर्मचारियों की तबीयत खराब हो गई। जल्द ही बैंक व अन्य दफ्तर खाली-खाली से दिखने लगे क्योंकि इनमें काम करनेवाले बीमार पड़ गए थे। २४ जून तक तो ऐसे मरीजों की अस्पताल में बाढ़-सी आ गई। ३ जुलाई को स्थिति ये हो गई कि इस बीमारी से एक दिन में २३० लोग मृत्यु के मुंह में समा गए।
ये बीमारी थी स्पेनिश एन्फ्लूएंजा, स्पेनिश फ्लू जो मुंबई में आकर ‘मुंबई सिकनेस’, ‘मुंबई फ्लू’ और मुंबई फीवर के नाम से जानी गई। इसे आम भाषा में ‘स्पेनिश लेडी’ भी कहा गया। इसका ये नाम इसलिए पड़ा कि शेष दुनिया को इस बीमारी की खबर सबसे पहले स्पेन ने ही दी थी। दरअसल, वह प्रथम विश्वयुद्ध का समय था। स्पेन इसमें न्यूट्रल था, इसलिए वहां प्रेस सेंसरशिप लागू नहीं थी, वह निष्पक्ष खबरें छापने के लिए स्वतंत्र था। इसलिए बाद में मीडिया ने ‘स्पेनिश फ्लू’ का नाम ‘स्पेनिश लेडी’ रख दिया।
मुंबई में इस स्पेनिश लेडी का आक्रमण बहुत चुपके से हुआ। शहर के स्वास्थ्य अधिकारी जान एंड्रयू टर्नर के अनुसार, ‘प्लेग, कॉलरा, चेचक आदि की तरह यह स्पेनिश बीमारी चोरों की तरह रात में शहर में घुस गई। स्पेनिश लेडी ४ सप्ताह तक मुंबई में रही। इस दौरान इसकी बलि १,६०० से ज्यादा लोग चढ़े। कुल १ मिलियन मानव कार्य दिवसों का नुकसान स्पेनिश लेडी की वजह से हुआ। जो भी इसके सामने पड़ा चाहे वो बच्चा हो या बुजुर्ग, इसने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया। मुंबई से यह महाराष्ट्र के कुछ इलाकों से होती हुई उत्तर व मध्य भारत, उत्तर प्रदेश, बंगाल व असम और दक्षिण में तमिलनाडु भी गई। सितंबर, १९१८ में इस महामारी की वजह से गंगा नदी में लाशों की बाढ़ आ गई थी। अपनी दूसरी लहर मुंबई के बाद में इसने २० से ४० वर्ष के लोगों को शिकार बनाया।
आज यदि हवाई जहाज एवं क्रूज शिप कोरोना वायरस को पूरी दुनिया में पैâला रहे हैं तो १९१८ में रेलवे के जरिए स्पेनिश फ्लू शहरों से कस्बों व देहातों में गया। वह प्रथम विश्व युद्ध का जमाना था इसलिए यह कहा जाता है कि स्पेनिश फ्लू युद्धभूमि से वापस लौटे सैनिकों तथा चीन के व्यापारिक जहाजों के नाविकों के जरिए दुनिया के अन्य हिस्सों में पैâला। यह मई, २०१८ के आखिर में मुंबई गोदी में उतरा। उस समय शहर का माहौल किसी भी किलर वायरस को न्यौता देनेवाला था। बेहद भीड़-भाड़, मजदूर वर्ग की बहुतायत व खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं। अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी तथा प्लेग, चेचक, टीबी, कॉलरा का प्रकोप। ऐसे भी स्पेनिश फ्लू को पैâलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। तब इसकी कोई दवा नहीं थी, कोई वैक्सीन नहीं थी, लिहाजा फ्लू के शिकार पटापट मरने लगे। फ्लू के आने के कुछ दिनों में मुंबई की मृत्युदर दोगुनी हो गई।
स्पेनिश फ्लू से उस समय हिंदुस्थान में १० से २५ मिलियन लोगों की मौत का अंदाजा लगाया गया था। वैसे, नवीनतम आकलन के मुताबिक हिंदुस्थान के ब्रिटिश नियंत्रित इलाकों में फ्लू ने १४ लाख जानें ली थीं। वैसे पूरी दुनिया में इससे २० से ५० मिलियन लोगों की मृत्यु हुई थी। हालांकि यह भी कहना ठीक होगा पहले विश्वयुद्ध में जितने नागरिक एवं सैनिक मारे गए उससे ज्यादा तो १९१८-१९ के मुंबई फीवर से लोग मरे। इस बीमारी का सफाया १९२० में हुआ था। यानी १९२० के बाद फिर यह बीमारी नजर में नहीं आई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने २० शताब्दी की तीन प्रमुख महामारियों स्पेनिश एन्फ्लूएंजा-१९१८, एशियन एन्फ्लूएंजा-१९५७ तथा हांगकांग एन्फ्लूएंजा-१९६८ में स्पेनिश एन्फ्लूएंजा को सबसे घातक व सबसे मारक का दर्जा दिया है। इस विषय पर जॉन एम. बैरी की बेस्ट सेलिंग हिस्ट्री बुक ‘द ग्रेट एन्फ्लूएंज’ है जबकि ‘मुंबई फीवर’ मुंबई की स्पेनिश लेडी पर आधारित सिडीन वडुकुट का मेडिकल थ्रिलर है।
कोरोना वायरस से पूरी दुनिया में संक्रमण के फिलहाल ४ लाख मामले सामने आए हैं। इसकी वैक्सीन का कार्य दुनिया के कई देशों में युद्धस्तर पर चल रहा है। कई देशों की सीमाएं सील कर दी गई हैं, हेल्थ इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई है, पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी आपरेटिंग सेंटर शुरू कर दिए गए हैं। व्यापार, आर्थिक स्थिति व सामाजिक ताने-बाने पर कोरोना ने काफी दुष्प्रभाव डाला है। जैसे मुंबई फीवर लुप्त हो गया था, वैसे हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि कोरोना भी लुप्त हो जाए।