आमची मुंबई… मस्जिद बंदर कई शहरों का मिलन है

मस्‍िज‍द बंदर की दो विशेषताएं हैं। एक तो यहां महाराष्ट्र और गुजरात के बड़े शहरों का मिलन होता है। दरअसल, इन राज्यों के प्रमुख शहरों के नाम से इस इलाके के रास्तों का नाम रखा गया है। दूसरे मस्जिद बंदर नाम जिस पूजा स्थल के कारण पड़ा वह मस्जिद है ही नहीं, वह तो बेने इजरायली यहूदियों का पूजा स्थल यानी साइनागाग है। मुंबई का सबसे पुराना यह साइनागाग देश का पहला बेने इजरायली साइनागाग है। इसे गेट ऑफ मर्सी यानी शार  हामिम और जूनी मस्जिद कहा जाता है। इसी जूनी मस्जिद के कारण इलाके का नाम मस्जिद बंदर पड़ा।
फिलिस्तीन में जब तानाशाही दमन चक्र चला तो वहां के स्थानीय बेने इजरायली (इजरायल के पुत्र) लोगों के ७ जोड़े आज से २२०० साल पहले समुद्री मार्ग से भाग निकले थे। इनकी नाव उत्तरी कोकण तट पर पहुंचकर टूट गई तो इन्हें वहीं शरण लेनी पड़ी। ये नवगांव, अलीबाग, तलवली, रेवदण्डा, कोरलाई आदि जगहों पर बस गए और जीवन-यापन के लिए सुतार व तेली का काम करने लगे। इन बेने इजरायलियों को शनिवार तेली कहा जाने लगा। इन्होंने अपने-अपने गांव को सरनेम के रूप में अपना लिया मसलन पेनकर, पासकर, नवगावकर, किहिमकर, रोहेकर, चाड़गावकर, अष्टमकर आदि।
१८ वीं शताब्दी में उत्तर कोकण के बेने इजरायलियों में से अधिकांश मुंबई, ठाणे, पुणे में बस गए। ये ब्रिटिश सेना में नौकरी करने लगे। स्थाई नौकरी से पैसे आने लगे तो बेने इजरायली आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो गए। बेने इजरायलियों ने पुर्तगीज, मराठा, सिद्दीज व ब्रिटिश शासन में विभिन्न सैन्य प्रशासनिक पदों पर काम किया।
मुंबई आकर बेने इजरायली समुदाय मांडवी, भायखला, माझगांव में बस गया। शुरू के कई दशक तक ये अपने घरों में प्रार्थना करते रहे। पर इनके मन में अपना पूजा स्थल साइनागाग बनाने की चाह तो थी ही। बेने इजरायलियों को मुंबई में अपना पूजा स्थल साइनागाग बनाने का मौका भी उनकी बहादुरी के कारण मिला। साइनागाग गेट ऑफ मर्सी यानी जूनी मस्जिद के निर्माता थे सामजी हस जी दिवेकर उर्फ सैमुअल इजकील। दिवेकर बॉम्बे आर्मी में कमांडेंट थे। उन्होंने १७८३ के मैसूर युद्ध में काफी वीरता दिखाई थी पर उनकी ६ ठीं बटालियन के सैनिकों सहित उन्हें भी टीपू सुल्तान की सेनाओं ने पकड़ लिया।
जेल में दिवेकर ने परमपिता परमात्मा से मन्नत मांगी कि यदि मेरी रिहाई हो गई तो मैं मुंबई में साइनागाग बनवाऊंगा। टीपू की मां यहूदियों को खुदा के बंदे मानती थी। उसे जैसे ही पता चला कि बंदियों में यहूदी भी हैं तो उसने हस्तक्षेप कर दिवेकर को क्षमादान दिलवाया। कृतज्ञ दिवेकर ने मुंबई आते ही सन् १७९६ में दक्षिण मुंबई के एस्प्लेनेड इलाके में साइनागाग बनवाया और उसे नाम दिया गेट ऑफ मर्सी।
सन् १८६० में गेट ऑफ मर्सी का पुनर्निर्माण कर इसे मांडवी ले जाया गया, जहां बड़ी संख्या में बेने इजरायली रहते थे। यह देखने में मस्जिद की तरह लगता है लिहाजा इसे मस्जिद कहा जाने लगा और फिर इसी वजह से एक नजदीकी स्टेशन का नामकरण मस्जिद बंदर हुआ।
मस्जिद बंदर महाराष्ट्र और गुजरात का मिलन भी है। सीएसएमटी से ईस्टर्न प्रâी-वे से आगे बढ़ते ही थोड़ी दूर पर ही आपको दाहिनी ओर हर एक स्ट्रीट का नाम किसी न किसी शहर के नाम पर देखने को मिलेगा। मसलन महाराष्ट्र के शहरों पर रखे गए हैं नाम- सोलापुर स्ट्रीट, पूना स्ट्रीट, कल्याण स्ट्रीट, ठाणे स्ट्रीट जबकि गुजरात के शहरों पर हैं बड़ौदा स्ट्रीट, सूरत स्ट्रीट, भरुच स्ट्रीट, अमदाबाद स्ट्रीट जैसे नाम। ब्रिज के एक तरफ कुछ रास्ते हैं और दूसरी ओर कुछ दूसरे राज्य के शहरों के नाम पर गलियां हैं। ब्रिटिश शासन में यह इलाका बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। पास ही स्थित बंदरगाह पर बड़ी मात्रा में सामान उतरता था। जिन शहरों से अधिक माल आता था, संभवत: वहां के नाम से स्ट्रीट का नाम रखा गया ताकि व्यापार और सामान रखने में आसानी हो। चूंकि पुराने जमाने में कुछ चुनिंदा शहरों में ही अधिक व्यापार होता था इसलिए यह करना संभव हुआ होगा। गौरतलब है कि इस इलाके के आसपास आज भी बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक गतिविधियां होती हैं, यहां सैकड़ों ट्रांसपोर्टरों के ऑफिस भी मौजूद हैं। समुद्री किनारे बसा होने के कारण मस्जिद बंदर मुंबई बंदरगाह से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है, जिससे यहां पर सामान की आवाजाही बड़े पैमाने पर होती है। यहां की अधिकांश जगह मुंबई पोर्ट ट्रस्ट के अधीन आती है। १९ वीं सदी में इस इलाके में तमाम वाणिज्यिक गोदाम थे। रेलवे और पोर्ट से जुड़े होने के नाते यहां से ही माल की आवाजाही होती थी। जि‍न शहरों से यहां माल लाए जाते थे संभवत: स्‍टॉकि‍स्‍ट उन्‍हें उसी नामवाली गलियों के गोदाम में रखते थे, इसी आधार पर इसका नाम भी पड़ा होगा।