आमदनी अठन्नी-खर्चा रुपैया,  कैसे चले बेस्ट बसें?

‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया’ यह मुहावरा बेस्ट पर सटीक बैठता है। बेस्ट कर्मचारियों द्वारा पिछले चार दिनों से किए जा रहे हड़ताल से मुंबईकर बेहाल हो गए हैं। घाटे में होने के बावजूद मुंबईकरों को अपनी सेवा देनेवाली बेस्ट को रोजाना छह करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। सालाना ९०० सौ करोड़ रुपए का घाटा बेस्ट को हो रहा है। इससे अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि इतने घाटे में बेस्ट बसों को वैâसे चलाया जाए?
बता दें कि बेस्ट मुंबई की दूसरी लाइफलाइन मानी जाती है। समय पर बसें न आने पर मुंबईकरों के क्रोध का शिकार होनेवाली बेस्ट की खस्ताहाल की भी जानकारी मुंबईकरों को होनी चाहिए। शेयर टैक्सी और ऑटोरिक्शा के किराए से भी कम दर में मुंबईकरों को अपनी मंजिल पर पहुंचानेवाली बेस्ट को टिकिट की बिक्री से भी उतनी आमदनी नहीं होती जितना बेस्ट खर्च करती है। टिकिट, बस स्टॉप, बसों और बिजली के खंभों पर लगे विज्ञापनों से सालाना १०० से सवा सौ करोड़ रुपए की आय होती है। वर्तमान में बेस्ट की ३,३०० बसें हैं जो रोजाना ७ लाख किमी का सफर तय करती हैं। एक बस से बेस्ट को रोजाना ९ हजार रुपए की आय होती है जबकि नुकसान १९ हजार रुपए का होता है। आंकड़ों का आकलन करें तो रोजाना बेस्ट को एक बस के पीछे दस हजार रुपए का नुकसान सहन करना पड़ता है। एक लीटर पेट्रोल पर बस तीन किलोमीटर का सफर तय करती है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से बढ़े वाहनों की संख्या, मेट्रो कार्य के कारण होनेवाले ट्रैफिक से बेस्ट बसें १ लीटर पेट्रोल पर तीन किलोमीटर के सफर का अपना लक्ष्य तय नहीं कर पाती हैं।