आरक्षण का तिलिस्मी मकड़जाल

केंद्र की मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्णों के आरक्षण की घोषणा कर सियासी हलचल मचा दी है। मोदी सरकार ने सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में १० प्रतिशत आरक्षण देने का पैâसला किया है। यह मौजूदा ५० प्रतिशत आरक्षण से अलग होगा। आरक्षण लागू हो जाने पर यह आंकड़ा बढ़कर ६० फीसदी हो जाएगा। पैâसले को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद १५ और १६ में संशोधन करना होगा। इसका लाभ ईसाइयों व मुस्लिमों सहित ‘अनारक्षित श्रेणी’ के लोगों को नौकरियों व शिक्षा में मिलेगा। इस कोटा में किसी भी आरक्षण के प्रावधान के तहत नहीं आने वाले वर्गों जैसे, ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, जाट, गुज्जर, मुस्लिम व ईसाई शामिल होंगे। सरकार की इस घोषणा से मुस्लिम आरक्षण की मांग करनेवाले नेताओं की समझ में नहीं आ रहा है कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दें? ठेठ मुस्लिम राजनीति करनेवाले नेताओं ने इस निर्णय से असहमति जरूर जताई है।
आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रावधान से पहले सामान्य आरक्षण श्रेणी में ओबीसी सहित अन्य आरक्षणों का लाभ मुसलमानों की कई बिरादरी को मिलता रहा है। संविधान में आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता रहा है। किसी की आय या संपत्ति के आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान अब तक नहीं रहा है। संविधान के अनुच्छेद १६(४) के मुताबिक आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है। किसी व्यक्ति विशेष को आरक्षण देने का संविधान में कोई नियम नहीं है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के पैâसलों पर रोक लगा चुका है। अपने पूर्व के पैâसलों में सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने को समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन बताया था लेकिन महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण और तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण की गहमागहमी में मुसलमान अपने आरक्षण की मांग पर जोर देने लगा है लेकिन जब से केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण जातियों को भी आरक्षण का लाभ देने की बात कही है, तबसे मुसलमानों में और भी बेचैनी पाई जा रही है। कांशीराम के नारे ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी भागीदारी’ को वह पैमाना मानकर अपनी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण चाहता है। जिसकी कोई गुंजाइश नजर नहीं आती।
देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग को आरक्षण हैं। पिछड़ा वर्ग में ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ को छोड़कर पूरा हिंदू समाज शामिल है, वहीं मुसलमानों में भी केवल सैयद, शेख, मुगल और खान-पठान को छोड़कर लगभग पूरा मुस्लिम वर्ग शामिल है। अगर आरक्षण लागू होता है तो बाकी सवर्णों की तरह शेख, सैयद, पठान और मुगल को भी आरक्षण का लाभ मिल सकता है। इसमें एक धार्मिक और दूसरा सामाजिक पेंच है। दीनी ऐतबार से मुसलमानों में मजहबी और सामाजिक तौर पर जाति व्यवस्था और ऊंच-नीच का कोई चलन नहीं है। दूसरी बात ये कि अगर कोई यह दावा करे कि मैं सैयद, पठान, मुगल या शेख हूं तो वो साबित वैâसे करेगा? हालांकि मुस्लिम जीवन का व्यवहारिक पहलू यह है कि उसमें अनगिनत जातियां और उपजातियां हैं। भले ही मुस्लिम समाज के ठेकेदार न मानें लेकिन मुसलमानों में भी वर्ण और वर्गभेद का जबरदस्त बोलबाला है जो सही इस्लाम की नजर में सरासर गलत है।
बात आरक्षण की नहीं अगर केवल मुस्लिम समाज के भीतर की करें तो वहां भी वर्णव्यवस्था के विरोध में आवाज बुलंद करनेवाले इस्लाम की असल मान्यताओं के खिलाफ हर तरह के भेद पाए जाते हैं। फिरकों के भेद के अलावा भी मुसलमानों में बिरादरीवाद का बोलबाला है। सैयद बिरादरी का दावा है कि वो पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के वंशज हैं, जिसके चलते समाज में उन्हें ऊंचा ओहदा मिला है। सैयद का अर्थ है मुखिया या श्रीमान। वहीं मुगलों और पठानों का मानना है कि है कि वे सेनाओं का संचालन करने के साथ ही दूसरे समुदाय को सुरक्षा देते थे और हुकूमत भी करते थे इसलिए श्रेष्ठ हैं। मुगल भी पठानों में से ही एक हैं। दूसरे शब्दों में उदाहरण दिया जाए तो पठान और मुगल क्षत्रियों की तरह योद्धा बिरादरी मानी जाती है। एक बात और, मुस्लिम समाज में शेख कोई बिरादरी नहीं थी बल्कि बुजुर्ग के लिए इस्तेमाल होनेवाला लकब था। अरबी में शेख का मतलब होता है बुजुर्ग। शेखों के बारे में कहा जाता है कि एक बुजुर्ग हुए थे जो अपने नाम के साथ शेख लिखते थे। इसी वजह से उनके आस-पास के लोग भी शेख लिखने लगे और शेख लिखनेवालों ने अपने को एक अलग वर्ग मान लिया यानी वर्णव्यवस्था ने मुसलमानों को इस तरह जकड़ लिया कि उच्च जातियों से संबंधित मुसलमान आमतौर से अपने अंदर श्रेष्ठता का भाव रखने लग गए और निम्न जातियों को अपने स्तर का कभी समझा ही नहीं।
देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह मुस्लिम समुदाय की त्रासदी यह रही कि वह सही रहनुमा और दूरदर्शिता के अभाव में एक तरफ तो विकास की प्रक्रिया में हाशिये पर पहुंच गया तो दूसरी तरफ असुरक्षा, भेदभाव, संदेह और तुष्टिकरण के आरोपों का भी शिकार रहा। देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक दशा जानने के लिए यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष २००५ में जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। ३० नवंबर, २००६ को लोकसभा में पेश की गई ४०३ पन्नों की रिपोर्ट से पहली बार ज्ञात हुआ कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति से भी खराब है। सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट के जरिए मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन और ठोस आंकड़ों की बुनियाद पर सच्चाई को देश के सामने लाने का काम किया। उन सच्चाइयों को रेखाकिंत करते हुए उन्हें औपचारिक स्वीकृति दिलाई, जिन पर पहले ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। साथ ही साथ मुस्लिम समाज को लेकर इस रिर्पोट में बहुत सारे ऐसे मिथकों, भ्रामक दुष्प्रचारों व तुष्टिकरणी के आरोपों को भी झूठा साबित किया गया, जिसे एक बड़ा जनसमूह सच माने बैठा था।
सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मुसलमान आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं और सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व केवल ४.९ प्रतिशत है। इसमें भी ज्यादातर वे निचले पदों पर हैं। उच्च प्रशासनिक सेवाओं, जैसे आईएएस, आईएफएस और आईपीएस जैसी सेवाओं में उनकी भागीदारी सिर्फ ३.२ प्रतिशत है। सच्चर समिति ने हालात को देखते हुए मुस्लिम समुदाय की स्थिति को सुधारने के लिए कई सुझाव भी दिए थे और अनेक सिफारिशें की थीं लेकिन सवाल यह है कि उम्मीद जगानेवाली इस रिपोर्ट और सिफारिशों के जारी होने के १२-१३ सालों में क्या मुसलमानों के हालात जरा भी बदले नजर आते हैं? क्योंकि सिफारिशें ज्यादा थीं और पहल नाकाफी। जो थोड़े बहुत कदम उठाए भी गए उनका जमीन पर कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण जातियों को भी आरक्षण देने का लाभ जब मुसलमानों को भी मिलेगा, तब देखना यह होगा कि कितने मुसलमान इस स्थिति का लाभ उठा पाने में सक्षम होंगे।
जहां तक मुसलमानों के बीच वर्गीकरण की बात है तो चंद मौलवियों और समाज के ठेकेदारों द्वारा बनाई गई सामाजिक वर्ण व्यवस्था का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। मुसलमानों का धार्मिक सिद्धांत जाति, वर्ण या मसलकी विचारधारा के आधार पर विभाजन को सख्ती से मना करता है। कुरआन में तो यहां तक कहा गया है कि जो लोग मसलक या जाति के आधार पर विभाजन पैदा करते हैं वह सरासर अल्लाह की नाफरमानी करते हैं। ऐसे में आरक्षण की इस बंदरबांट में मुसलमानों को पंâूक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। वर्तमान आरक्षण की घोषणा कहीं सिर्फ राजनैतिक लाभ के लिए ही न हो इस बात पर भी खासतौर पर गौर करने की जरूरत है। बेहतर शिक्षा, बेरोजगारी से जंग और देशवासियों का विश्वास कायम रखना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए और यही बात उसे राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने में मददगार होगी, वरना आरक्षण का तिलिस्मी मकड़जाल उसे तरक्की देने की बजाय राह से भटकी कौम बनाकर रख देगा।