आरक्षण नहीं तरक्की चााहिए

आम चुनाव की आहट के बीच आम जनता को कई तरह के वादों, नारों, आंदोलनों, मान-मनव्वल, रूठने-मनाने जैसे राजनैतिक पैतरों की बानगी दिखनी शुरू हो जाती है। ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में भी हो रहा है। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के साथ ही अब मुस्लिम समाज ने भी आरक्षण के लिए लामबंद होना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों ने मुस्लिम संगठनों को आगे कर मुस्लिम आरक्षण की मांग करते हुए राज्य सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। मुसलमानों ने ‘मराठा क्रांति मोर्चा’ की तर्ज पर ‘मुस्लिम क्रांति मोर्चा’ का गठन कर मांग कर दी है कि राज्‍य सरकार उन्‍हें नौकरियों और शिक्षा में ५ फीसदी आरक्षण दे। दरअसल मुसलमानों को लगने लगा है कि मुंबई हाईकोर्ट के शिक्षा में ५ फीसदी आरक्षण देने की अनुमति के बाद भी राज्‍य सरकार मुस्लिम आरक्षण पर खामोश है। ऐसे में आरक्षण के लिए महाराष्‍ट्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुस्लिम संगठनों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने की तैयारी चल रही है। बैठकें हो रही हैं, विशेषज्ञों की राय ली जा रही है और आगे की रणनीति तैयार की जा रही है। लेकिन राहत की बात है कि आरक्षण के लिए सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने और मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र को बंद कराने की धमकी देनेवाले मुस्लिम नेताओं और संगठनों के प्रतिनिधियों के सुर बदल गए हैं। अब मुस्लिम नेता प्रतिनिधिमंडल के जरिए मुख्यमंत्री से मिलने की बात कह रहे हैं। यह प्रतिनिधिमंडल उनसे जल्द से जल्द मुस्लिमों को आरक्षण लागू करने की बात करेगा। एकदूसरे को फूटी आंख न सुहानेवाले कांग्रेस, एनसीपी, समाजवादी पार्टी और एमआईएम नेता इस विषय पर एक प्लेटफॉर्म पर हैं।

मुस्लिम रहनुमाओं द्वारा लगातार राजनैतिक लाभ लेने के लिए दिए गए बयानों के आधार पर मुस्लिम समुदाय में यह विचार घर कर गया है कि आरक्षण हासिल करने की दौड़ में वे बहुत पीछे छूट गए हैं इसलिए संगठित होना, आंदोलन की भूमिका अपनाना या फिर सरकार से बात करना अब जरूरी हो गया है। मुसलमानों को आरक्षण देने के मामले में पिछले कई वर्षों से विवाद रहा है। मराठा और धनगर समाज के साथ मुस्लिमों के लिए भी आरक्षण की मांग इसलिए की जा रही है क्योंकि मुस्लिम सामाजिक और आर्थिक दोनों ही रूप से पिछड़े हैं और ‘स्पेशल बैकवर्ड कैटिगरी-ए, मुस्लिम आरक्षण’ के तहत आते हैं। वैसे केंद्र सरकार मुसलमानों को शेड्यूल कास्ट का दर्जा देने से हमेशा बचती रही है जबकि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट कहती है कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर देश के मुसलमानों की हालत दयनीय है। रंगनाथ मिश्र आयोग ने तो अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया है कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों में से ज्यादातर लोगों की हालत हिंदू दलितों से भी बदतर है। इसी रिपोर्ट ने मुस्लिम समाज में बेचैनी पैâलाई और मुस्लिम नेताओं के हाथ एक बेहतरीन मुद्दा लग गया।

मुसलमान पिछले ७० सालों से सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक बना हुआ है। मुस्लिम समाज को वोट बैंक बनाकर रखनेवाली राजनैतिक पार्टियां जानती हैं कि आजादी के बाद से अपनी शिनाख्त के लिए मुस्लिम समुदाय तड़प रहा है और खुद को मुख्यधारा में लाने की जद्दोजहद करता रहा है। वे जानते हैं कि इस समाज को सुविधा देने के लिए अगर आरक्षण का झुनझुना हाथ में थमा दिया  जाए तो सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना आसान हो जाएगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि शिक्षा के मामले में पिछड़ा और नेताओं के आश्वासनों की आस में जीता-मरता मुसलमान ऐसे झुनझुनों से बहलता भी खूब है। मुस्लिम और दलित ईसाइयों को आरक्षण देने और अन्य पिछड़ा वर्ग में मुसलमानों का हिस्सा बढ़ाकर १५ फीसदी करने की रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट आने के बाद शायद इसीलिए मुस्लिम वोटों को अपनी जागीर समझनेवालों ने और भी सक्रियता बढ़ा दी। संविधान के पैरा ३ में राष्ट्रपति के आदेश १९५० का उल्लेख है, जिसके मुताबिक हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म को माननेवाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। बाद में बौद्धों और सिखों को भी एससी का दर्जा दिया गया, लेकिन मुस्लिम, ईसाई, जैन और पारसी धर्म के लोगों को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा नहीं मिल सका। मुस्लिम समुदाय की दयनीय स्थिति का हवाला देते हुए आयोग ने इसीलिए संविधान से पैरा ३ हटाने की भी सिफारिश की थी। इसी के बाद मुस्लिम आरक्षण की मांग ने और जोर पकड़ा।

ज्ञात हो कि २०१४ के लोकसभा चुनाव में करारी हार मिलने के बाद विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की आस पर कांग्रेस-एनसीपी की गठबंधन सरकार ने मराठा और मुस्लिम आरक्षण का दांव खेला था। तब सरकार ने एक महत्वपूर्ण पैâसले में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठों को १६ फीसदी और मुस्लिमों को ५ फीसदी आरक्षण देने की घोषणा कर सबको चौंका दिया था। हालांकि सरकार का फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के विपरीत ही था जिसमें उसने आरक्षण की सीमा ५० फीसदी रखी थी। तब सरकार ने स्पष्टीकरण दिया था कि सच्चर कमेटी, रंगनाथन मिश्रा कमेटी और डॉ. महमूद रहमान अध्ययन समूह की सिफारिशों के आधार पर मुस्लिम समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा व नौकरी में आरक्षण देने का फैसला किया गया है। इस आरक्षण को चुनौती देते हुए मुंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए १४ नवंबर २०१४ को मराठा आरक्षण के साथ मुस्लिम आरक्षण को भी स्थगित कर दिया था। लेकिन उच्च न्यायालय ने मुसलमानों को शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण देने पर रोक नहीं लगाई थी। बाद में महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने मार्च २०१५ में मुसलमानों को दिया गया पांच फीसदी आरक्षण भी रद्द कर दिया था। सरकार ने मुस्लिम आरक्षण रद्द किए जाने संबंधी शासनादेश जारी करते हुए कारण बताया था कि मुंबई उच्च न्यायालय के मुसलमानों के आरक्षण पर रोक लगाए जाने से इस पर जारी अध्यादेश कानूनी रूप नहीं ले सका। तभी से मुस्लिम आरक्षण के नाम पर राजनैतिक गहमागहमी बनी रही। हमेशा ही राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार रहनेवाले मुसलमानों को उनका हक मिले, इस विषय पर विचार-विमर्श करने की बजाय क्या ऐसा नहीं लगता कि खुद मुस्लिम रहनुमा पूरे मुद्दे को विवादास्पद बनाकर अपनी रोटी सेंकते नजर आ रहे हैं?

इस बात को समझना होगा कि देश का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ५० फीसदी तक आरक्षण देने की बात कहकर आरक्षण के मुद्दे की हवा निकाल रखी है। तब ऐसे में मुस्लिम नेता किस आधार पर यह जंग लड़ने पर आमादा हैं, यह समझ से परे है। आरक्षण प्राप्त करने के लिए कोई संवैधानिक मार्ग ही चुनना होगा। मुसलमानों को यह भी बताना होगा कि कि अन्य पिछड़ा वर्ग के मुसलमान समुदायों को पहले से ही नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिल रहा है। आखिर मुस्लिम रहनुमा इस बात पर क्यों मौन हो जाते हैं कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के आधार पर आरक्षण देता है। क्या आरक्षण की मांग करने के लिए कोई ठोस आधार तैयार करते हुए किसी मुस्लिम नेता को देखा गया है? दरअसल इन नेताओं को केवल चुनावी राजनीति से ही सरोकार रह गया है। चुनावी वर्ष के मौसम में आरक्षण की हरियाली ढूंढते नेताओं को शायद मुस्लिम समाज के बहुमुखी उत्थान की फिक्र नहीं है। वरना आरक्षण के नाम पर आंदोलन करने की बजाय वह मुस्लिम समाज के सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक सशक्तिकरण पर ध्यान देते। अधिक से अधिक विद्यालय, महाविद्यालय, प्रोफेशनल कोर्स से लैस अन्य आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण पर जोर देते। मुस्लिम रहनुमाओं का लक्ष्य केवल मुसलमानों को आरक्षण दिलाना न होकर, उनका सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास कर देश की तरक्की में मिलनेवाले अवसरों में बराबरी का हक दिलाने का होना चाहिए। पर क्या इस कसौटी पर मुस्लिम नेतृत्व खरा उतर रहा है?