`आरसेप और राष्ट्रवाद’ 

आरसेप यानी रिजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप कहते हैं इससे हिंदुस्थान का अलग होना हिंदुस्थान का अपने राष्ट्रवाद के प्रति दृढ़ता को व्यक्त करता है। आरसेप जिसमें दक्षेश देशों के अलावा ५ और देश भी शामिल हैं, उसमें से हिंदुस्थान का अलग होना और गांधी के राष्ट्रवाद का उल्लेख करना एक बार फिर से भारतीय राष्ट्रवाद के विमर्श को जिंदा करता है। आरसीईपी में शामिल होने से इनकार करते हुए, पीएम मोदी ने कहा कि समझौता हिंदुस्थान के बकाया मुद्दों और चिंताओं को संतोषजनक रूप से संबोधित नहीं करता है। आरसेप समर्थकों की शिकायत थी कि हिंदुस्थान ने अपनी मांगों को ‘अंतिम समय’ पर उठाया। हालांकि हिंदुस्थान का कहना है कि हिंदुस्थान ने बातचीत के दौरान इन मुद्दों को उठाया था और हिंदुस्थान में नीति आयोग, उद्योग और किसानों ने आरसीईपी पर अपनी गंभीर चिंताओं को व्यक्त किया था। नीति आयोग का मानना है कि प्रâी ट्रेड एग्रीमेंट से हिंदुस्थान का आयात ही बढ़ता है, निर्यात नहीं। अत: ऐसे एफटीए से दूर ही रहना चाहिए। वैसे भी इस आरसेप से चीन को ही ज्यादा फायदा होनेवाला था और विकसित देशों को हिंदुस्थान फिर से उपभोक्ता राज्य ही बनकर रह जाना था। ऐसे समय में जब इकोनॉमी स्लो डाउन है और हिंदुस्थान अपने मैन्युफेक्टरिंग को बढ़ाने की राह पर है, ऐसे अनुबंध हिंदुस्थान के हाथ बांधने जैसे हैं। दरअसल, यह हिंदुस्थान सरकार का नया राष्ट्रवाद है, जो अपने राष्ट्र की कीमत पर वैश्विक दबाब में नहीं आनेवाला।
आइए, जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर यह राष्ट्रवाद क्या है? मैंने पाया, राष्ट्रवाद दरअसल एक लगाव या भावना है जो कोई व्यक्ति या व्यक्तिओं का समूह एक भूगोल या समूहों के समुच्चय को लेकर रखता है। यह राष्ट्रवाद यदि भूगोल को लेकर है तो यह वर्तमान राज्यों/राष्ट्रों की सीमाओं के भीतर रहनेवाले लोगों का उस सीमा रेखा के अंदर पड़नेवाले भूगोल के प्रति उनका विशेष आग्रह है, जिसमें वह उस आग्रह को उस भूगोल के इतिहास से जोड़ कर देखते हैं और यदि यह राष्ट्रवाद समूहों के समुच्चय को लेकर है तो यह भाषा, धर्म, संस्कृति या ऐसे ही किसी समरूपों के आधार पर होता है। राष्ट्र का निर्माण या तो भौगोलिक आधार पर होता है या तो भाषा धर्म संस्कृति या ऐसे ही किसी समरूपों के आधार पर होता है और ऐसे राष्ट्रों के प्रति जो भावनात्मक आग्रह होता है, वह राष्ट्रवाद होता है। हिंदुस्थान का राष्ट्रवाद दोनों रूप में मौजूद है। भौगोलिक सीमा को लेकर भी हिंदुस्थान में एक आग्रह हैं, जिसमें कश्मीर को हिंदुस्थान का मस्तक तो दिल्ली को दिल बताया गया है, वहीं हिंदुस्थानी विरासत और संस्कृति को लेकर भी एक राष्ट्रवाद है और राष्ट्र की आर्थिक नीतियों को लेकर भी राष्ट्रवाद है।
हिंदुस्थान के संदर्भ मे यह पश्चिम राष्ट्रवाद से अलग है। हालांकि अंग्रेजों से पहले भी हिंदुस्थान पूरब से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण तक जुड़ा था लेकिन वह धार्मिक उद्देश्यों तक ही सीमित था, समूचा क्षेत्र छोटे-छोटे राज-पाट में विभक्त था। हिंदुस्थान में विभिन्न धर्म, संस्कृति, भाषा और विरासत के लोग तो मिल जाएंगे लेकिन इस राष्ट्र का निर्माण धर्म, संस्कृति, भाषा और विरासत के आधार पर नहीं हुआ।
मौजूदा दौर में जो राष्ट्रवाद का विमर्श है, वह इस भौगोलिक राष्ट्रवाद को धर्म, संस्कृति, भाषा और विरासत के आधार की कसौटी पर कसने के कारण है। हालांकि इस विमर्श में राष्ट्रवाद का जो सबसे मुखर पक्ष वामपंथ है, वह भी भ्रम पैदा करता है। जब वह अलग कश्मीर राष्ट्र की मांग का जाने-अनजाने में समर्थन करता है तो वह अपने आपको वैâसे राष्ट्रवाद का पक्षधर होने से मुक्त करता है। वह जिस धर्म को अफीम कहता है, वहीं धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग को जायज मानता है। मार्क्स की सीमा मुक्त देश की अवधारणा जिसमें विश्व के मजदूरों को एक होने का आवाहन किया गया है, को हिंदुस्थानी वामपंथ तार-तार करता है। वर्तमान में वामपंथ एवं अन्य पक्ष जिस आधार पर हिंदुस्थानी राष्ट्रवाद की आलोचना करता है, वो दरअसल सच्चाई से आंख मूंद लेने जैसा है। मार्क्स ने भले ही सीमा मुक्त समाज या मुस्लिम समाज ने नेशनहुड की जगह ब्रदरहुड को मान्यता दी हो लेकिन हिंदुस्थानी दर्शन के मामले में इनकी राष्ट्रवाद की काट बहुत कमजोर है इसलिए इनका राष्ट्रवाद को लेकर जो विमर्श है, वह शब्द संघर्ष तक ही सीमित है। वहीं भारतीय राष्ट्रवाद का शुद्ध विरोध हिंदुस्थानी दर्शन में ही छिपा है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ एवं ‘सर्वे भवंतु सुखिना’ की कल्पना की गई है। इसमें पूरे विश्व को उसकी भौगोलिक सीमाओं से परे एक ही परिवार और एक ही समाज माना गया है, जो सिर्फ अपने किसी समाज विशेष के प्रति नहीं, वर्ना सबके सुख की कल्पना करता है। वाल्मीकि रामायण में हालांकि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ का उल्लेख है लेकिन इसका भावार्थ भी राष्ट्रवाद का विरोधी है। जब लंका विजय के बाद लक्ष्मण उन्हें लंका का सुख भोगने के लिए कहते हैं तो राम कहते हैं ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’, मतलब अगर रहना है तो जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर है, यह वाक्य किसी प्रकार का राजनैतिक और साम्राज्यवादी संदेश नहीं देता।
दरअसल, राष्ट्रवाद एक विश्वास, पंथ या राजनीतिक विचारधारा है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने गृह राष्ट्र के साथ अपनी पहचान बनाता या लगाव व्यक्त करता है। यह एक ऐसी अवधारणा है, जिसमें राष्ट्र को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। यह लोगों के किसी समूह की उस आस्था का नाम है, जिसके तहत वे खुद को साझा इतिहास, परंपरा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के आधार पर एकजुट मानते हैं। इन्हीं बंधनों के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि उन्हें आत्म-निर्णय के आधार पर अपने संप्रभु राजनीतिक समुदाय अर्थात ‘राष्ट्र’ की स्थापना करने का आधार है। राष्ट्रवाद के आधार पर बना राष्ट्र उस समय तक कल्पनाओं में ही रहता है, जब तक उसे एक राष्ट्र-राज्य का रूप नहीं दे दिया जाता। हालांकि दुनिया में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है, जो इन कसौटियों पर पूरी तरह से फिट बैठता हो, इसके बावजूद अगर विश्व की एटलस उठाकर देखी जाए तो धरती की एक-एक इंच जमीन राष्ट्रों की सीमाओं के बीच बंटी हुई मिलेगी। दूसरी तरफ भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद को जबरदस्त चुनौती दी है। बीसवीं सदी के आखिरी दो दशकों और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बाद कहा जा सकता है कि कम-से-कम दुनिया का प्रभु वर्ग एक-सी भाषा बोलता है, एक-सी यात्राएं करता है, एक-सा खाना खाता है। उसके लिए राष्ट्रीय सीमाओं के कोई खास मायने नहीं रह गए हैं। इसके अलावा आर्थिक भूमंडलीकरण, बड़े पैमाने पर होनेवाली लोगों की आवाजाही, इंटरनेट और मोबाइल फोन जैसी प्रौद्योगिकीय प्रगति ने दुनिया में फासलों को बहुत कम कर दिया है। राजनीतिक ताकत के रूप में राष्ट्रवाद आज भी निर्णायक बना हुआ है। पूर्व में चल रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थानवादी आंदोलन, दुनिया भर में हो रही नस्ल और आव्रजन संबंधी बहस और पश्चिम का बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग) संबंधी विवाद इसका प्रमाण है।
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद के बोलबाले को कुछ संदिग्ध अवश्य कर दिया है, पर इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उदारतावादी और लोकतांत्रिक राज्य से गठजोड़ करके गरीबी और पिछड़ेपन के शिकार समाजों को आगे ले जाने में राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सभी उत्तर-औपनिवेशिक समाजों ने अपने वैकासिक लक्ष्यों को वेधने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लिया है। खासतौर से हिंदुस्थान जैसे बहुलतामूलक समाजों को एक राजनीतिक समुदाय में विकसित करने में राष्ट्रवाद एक प्रमुख कारक रहा है।