आश्वासन पर खत्म हुआ अन्नदाता का आंदोलन

नासिक से आाए किसानों के शिष्टमंडल से करीब चार घंटे चली मैराथन बैठक के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसानों की मान्य मांगों की घोषणा की। सीएम की इस घोषणा के साथ ही अन्नदाता का आंदोलन सरकार के आश्वासन के बाद खत्म हो गया। किसानों की मांगों में प्रमुख रूप से २००८ में आघाडी सरकार के काल में जो किसान कर्जमाफी से वंचित रह गए हैं, उन किसानों को कर्जमाफी दी जाएगी। इसी प्रकार जिस परिवार में पति-पत्नी दोनों के नाम पर कर्ज है, उनके डेढ़ लाख रुपए तक के कर्ज को माफ करने के लिए समिति गठित की गई है, इसी प्रकार आदिवासी जमीन के मामलों को छह महीने में हल करने, वनअधिकार कानून पर अमल, नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव, कलवण-मुरगांव भाग के ३१ छोटे बांधों से विस्थापन न होने, देवस्थान जमीन के संदर्भ में रिपोर्ट आने के दो महीने के भीतर नीतिगत निर्णय, बेनामी जमीन के संदर्भ में निर्णय शामिल हैं। इसके लिए विभागीय आयुक्त, नासिक की अध्यक्षता में एक समिति समस्याओं का अध्ययन करेगी और रिपोर्ट पेश करेगी। इसके अलावा चारागाह जमीन पर बने घरों को नियमित करने का निर्णय लिया गया है।
सरकारी योजनाओं का लाभ किसानों तक पहुंचे इसका खास ध्यान दिया जाएगा। जिसमें छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकरी सम्मान योजना को अमल करने के लिए एक समिति गठित करने का निर्णय हुआ जिसमें मंत्री और आंदोलनकर्ता किसानों के प्रतिनिधियों का समावेश किया जाएगा, संजय गांधी निराधार योजना, श्रावणबाल योजना का लाभ देने के संबंध में सरकार की भूमिका सकारात्मक है। कितना पारिश्रमिक बढ़ाना इसकी जानकारी लेकर मॉनसून सत्र में इस संबंध में योग्य निर्णय लिया जाएगा। इसी प्रकार कई अन्य मांगों पर किसानों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच चर्चा हुई। किसानों और सरकार के बीच हुई सकारात्मक चर्चा के बाद कल आजाद मैदान पर सार्वजनिक निर्माण मंत्री एकनाथ शिंदे, चंद्रकांतदादा पाटील, गिरीश महाजन और पांडुरंग फुंडकर ने किसानों से विस्तार में चर्चा की। जिसके बाद किसान नेताओं ने आंदोलन वापस लेने की घोषणा की।
किसान नहीं आदिवासी
नासिक से चल कर मुंबई में आंदोलन करने आए आंदोलनकारियों में ९५ प्रतिशत आदिवासी थे, किसान नहीं थे। यह बात मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान कही। उन्होंने कहा कि मीडिया ने किसान आंदोलन का जो कवरेज दिखाया वह गलत था। आंदोलनकारियों में किसान नहीं, बल्कि आदिवासी थे।