इंसानियत शर्मसार है

धूर्त सियासत ने जनमानस को कई भागों में बांटकर रख दिया है। सियासी लाभ के लिए नेताओं ने आवाम के सिर पर दो ऐसे मुद्दे बांध दिए हैं, जिनका बोझ उनसे उठाया नहीं जा रहा। पहला अयोध्या में रामलला का मंदिर बनने का सब्जबाग और दूसरा बलात्कार से मुक्ति दिलाने का झांसा। ये दो ऐसे नासूर मसले हैं जिनका समाधान शायद किसी के पास नहीं है। बलात्कार मुद्दे पर पूरा देश इस समय आक्रोश में है, रहा दूसरा मसला राम मंदिर बनने का उसे हवा देने के लिए अभी ११ माह बचे हैं। सन् २०१२ में जब दिल्ली में निर्भया बलात्कार की घटना घटी तो पूरे देश में बढ़े जनआक्रोश को देखते हुए उस वक्त की हुकूमत ने बलात्कार को रोकने के लिए कानूनों में बदलाव भी कर डाले। साथ ही निर्भया सहायता कोष का भी गठन कर दिया, जिसमें प्रत्येक वर्ष हजार करोड़ रुपए डालने की बात कही। कहां गए वो हजार करोड़, किस काम में खर्च किए जा रहे हैं। किसी के पास इन सवालों का जवाब नहीं है? घटना के वक्त भाजपा विपक्ष में थी तो उन्होंने ही सबसे ज्यादा हंगामा किया था, लेकिन केंद्र में अब उनकी सरकार है। बलात्कार का ग्राफ पहले के मुकाबले २८ प्रतिशत बढ़ चुका है। उन्नाव रेपकांड में उनका विधायक फंसा हुआ है। उसको बचाने के लिए हर तरकीब अपनाई गई लेकिन आखिर में धरे गए।
प्रभावशाली व्यक्ति के समक्ष सुरक्षातंत्र कितना बौना हो जाता है इसका ताजा उदाहरण पिछले सप्ताह भर से पूरे देश ने उन्नाव बलात्कार कांड के रूप में दिन-रात देखा। पीड़िता हर उस चौखट पर न्याय की गुहार लगाने गई जहां उसे उम्मीद थीं। लेकिन हर जगह उसके हिस्से में सिर्फ नाकामी हाथ लगी। कोर्ट, न्यायतंत्र, पुलिस-प्रशासन व मुख्यमंत्री दरबार हर जगह से उन्हें धक्के मार कर भगा दिया गया। वो रोती-बिलखती रही लेकिन किसी ने मदद के हाथ आगे नहीं बढ़ाए। पीड़िता की दुनिया उसकी आंखों के सामने उजड़ गई। पीड़िता की हिम्मत उस वक्त जवाब दे गई जब लोग आरोपी के पक्ष में खड़े दिखाई दिए, लेकिन मुद्दा मीडिया में आने के बाद सब लोग तितर-बितर हो गए। पुलिस-प्रशासन ने बलात्कारी विधायक को बचाने के लिए हर तिकड़म अपनाई, लेकिन शुक्र है मीडिया का जिसने पूरे मसले पर ऐसी आग लगाई कि उसकी आंच हर उस पहरेदार तक पहुंच गई जो केस को दबाने के लिए मोटी चांदी से ढंके बैठे थे। रेप पीड़िता ने अपना सबकुछ गंवा दिया। इज्जत के साथ-साथ सिर से पिता का साया भी दिंरदों ने छीन लिया। उन्नाव में मानवता शर्मसार होती रही है लेकिन न पुलिस को दया आई और न ही प्रशासन ने कोई पहल की।
पूरे मामले को जब मीडिया ने तूल दे दी तो चारों ओर हंगामा मच गया। सरकार ने आनन-फानन में एसआईटी टीम गठित की। एसआईटी ने चौबीस घंटों के भीतर रिपोर्ट पेश कर सच्चाई से पर्दा हटा दिया। उसके बाद सरकार को देर रात सीबीआई को मामला सौंपना पड़ा। दुख की बात यह है कि प्रशासन ने सतर्कता पीड़िता के पिता के मरने के बाद दिखाई। देखा जाए तो उन्नाव बलात्कार केस यह पहला मौका नहीं जब किसी केस ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पहले भी कई मामले हुए, लेकिन प्रभावशाली इंसान के चलते कार्रवाई कछुए की तरह चली। खैर, गेंद अब सीबीआई के पाले में है तो उम्मीद करनी चाहिए सीबीआई बिना किसी दबाव के स्वतंत्रता के साथ मामले की जांच कर पीड़िता को न्याय दिलाएगी। उम्मीद यह भी करनी चाहिए कि आरोपियों के खिलाफ सरकार भी अपना रवैया वैसा ही रखे जैसा दूसरे आरोपियों पर रखा जाता है। सरकार को मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
किसी कवि ने ठीक ही लिखा है कि नारे बदल जाते हैं, मंजर वहीं ठहरा है। पता नहीं हमारी निगोरी नियति पर, कब तक गूंगों, अंधों, बहरों का पहरा रहेगा। बलात्कार पीड़ित महिला ने पुलिस को पूरे मामले से साल भर पहले लिखित रूप में अवगत करा दिया था। लेकिन विधायक के दबाव में एक साल से एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इस बीच विधायक की तरफ से लगातार शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डाला जाता रहा। पीड़िता नहीं मानी तो इसी माह की तीन तारीख को विधायक के भाई ने उसके पिता को घर से उठाकर किसी सुनसान जगह ले जाकर जमकर पीटा। पीटने से मन नहीं भरा तो दूसरे दिन उन्होंने अपनी पहुंच का नाजायज फायदा उठाकर उलटा पीड़ित पर ही केस दर्ज करा दिया। और पुलिस ने उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद जो हुआ वह देश के सामने है। जो कष्ट पीड़िता ने सहे वह आरोपी को मिलने चाहिए थे। पीड़िता के मरणासन्न पिता की चीख-पुकार वाला वायरल वीडियो हमारे खोखले सिस्टम की सच्चाई को उजागर करने के लिए काफी है। विधायक के गुंडों ने उसे इतना मारा की उसकी पेट की आंत तक फट गई जिससे उसकी मौत हो गई। अगर समय रहते उसे उपचार मिल जाता तो आज वह िंजदा होता। जब वह अधमरा था तो उसी हालत में उसका मेडिकल कराने की औपचारिकता पुलिस द्वारा की गई। पर, बचाने की कोई कोशिश नहीं की गई। डॉक्टरी जांच के दौरान वहां तो राक्षसी ठहाकों और लापरवाहियों के बीच मौत की अंधी गली में दाखिल होते उस शख्स की चीख और चीत्कार का मजाक उड़ाया जाता रहा।
पीड़िता के पिता का अस्पताल का वीडियो देखकर रूह कांप उठी। पूरे मामले में मानवाधिकार का किस कदर हनन हुआ, उसकी कहानी दर्शा रहा है सोशल मीडिया पर वायरल हुआ घटना का वीडियो। वीडियो में दिख रहा है कि अस्पताल में वह कैसे कराहता रहा है, लेकिन उसकी कराहने की आवाज कोई सुनने को तैयार नहीं था। उसके कराहने पर डॉक्टर सिर्फ ठहाके लगाते दिख रहे हैं। पिटाई से लहूलुहान उसकी पीठ, पैर,पेट और चेहरे को उघाड़कर देखनेवाले हाथों को उसे जिंदा रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसका जिस्म बेजान होता जा रहा था, वह स्टूल पर ठीक से बैठ भी नहीं पा रहा था। शरीर के हर अंग से लहू रिस रहा था। उसे रोकने की बजाय डॉक्टर सिर्फ मेडिकल कराने की कागजी खानार्पूित करते रहे। उनकी इन हरकतों को देखकर आज पूरी इंसानी जमात शर्मसार हो गई है।