" /> इंसान कटे, रोटियां बिखरीं!,ये भी कोरोना के शिकार!!!

इंसान कटे, रोटियां बिखरीं!,ये भी कोरोना के शिकार!!!

कोरोना संकट से महाराष्ट्र को एक साथ मिलकर बाहर निकालेंगे, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने ऐसा विश्वास व्यक्त किया। इस संबंध में राज्य सरकार के प्रयास जारी हैं। महाराष्ट्र में प्रवासियों के मुद्दे के समाधान के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। दुर्भाग्य से शुक्रवार की सुबह संभाजीनगर में रेलवे पटरियों पर एक मालगाड़ी के नीचे आ जाने से १६ प्रवासी मजदूरों की कुचले जाने से मौत हो गई। इन १६ मृतकों को भी कोरोना पीड़ितों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। इन श्रमिकों में कोरोना संक्रमण के कोई लक्षण नहीं थे। उन्हें ठंडी के साथ बुखार नहीं था। उन्हें सर्दी या खांसी नहीं थी। उन्हें सांस लेने में भी कोई कठिनाई नहीं थी। वे स्वस्थ थे फिर भी वे कोरोना के ही शिकार हैं और आखिरकार उनके मृत्यु की जिम्मेदारी सरकार पर ही आती है। संभाजीनगर में जो हुआ वह धक्कादायक है। बदनापुर और करमाड़ के रेलवे स्टेशनों के बीच रेल पटरियों पर १६ श्रमिकों की जान चली गई। ये सभी मजदूर मूल रूप से मध्यप्रदेश के थे। वे जालना में एक स्टील कंपनी में काम करते थे।
‘लॉकडाउन’ के कारण इन श्रमिकों की आजीविका रुक गई थी और वे मध्यप्रदेश स्थित अपने गांव जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े थे। इन १६ मजदूरों ने योजना बनाई थी कि संभाजीनगर के रास्ते भुसावल जाएंगे और अगर वहां से कोई साधन मिला तो वे वहां से मध्य प्रदेश जाते। ४० किलोमीटर की यात्रा करने के बाद, वे आराम करने के लिए रेलवे पटरियों पर ही रुक गए। उन्हें सुबह नींद आ गई और वे ट्रेन से कुचले गए। जिस ‘रोटी’ की खातिर उन्होंने ये यात्रा शुरू की थी, उन रोटियों के रेल की पटरियों पर बिखरी तस्वीरें प्रकाशित हुर्इं जो हृदयविदारक हैं। बिखरी हुई रोटियों की तस्वीरें जितनी दिल दहला देने वाली हैं, उतनी ही भीषण हकीकत दिखाने वाली भी हैं। कोरोना के कारण जनता की जान को खतरा न हो, इसके लिए ‘लॉकडाउन’ किया गया, लेकिन मजदूर वर्ग लॉकडाउन में या तो भूख से मर रहा है, पैदल चलते समय यात्रा के दौरान कुचल कर या दम घुटने से मर रहा है। ये भी कोरोना और ‘लॉकडाउन’ के ही शिकार हैं। रोज कोरोना पीड़ितों की और उससे होनेवाली मौतों की संख्या प्रकाशित हो रही है, इस सूची में इन १६ लोगों का अपघात के शिकार के रूप में नहीं, बल्कि कोरोना के शिकार के रूप में ही किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार ने मराठवाड़ा में इस दुर्घटना में मरनेवालों के परिजनों को ५-५ लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। मध्य प्रदेश सरकार भी इसी तरह की वित्तीय सहायता देने को तैयार है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सहित कई गणमान्य लोगों ने इस हादसे पर दुख व्यक्त किया है। हादसे की जांच के भी आदेश दिए गए हैं। यह सब सही है, लेकिन मृतकों का क्या? उनके बेसहारा परिवारों का क्या? ऐसे कई प्रवासी मजदूर लॉकडाउन के कारण जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए जीवन-यापन कर रहे हैं। प्रवासी श्रमिकों की यह समस्या केवल मुंबई-महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैली हुई है। लॉकडाउन के कारण व्यवसाय बंद हो गए हैं। इन सभी मजदूरों को अपने घर जाना है। लेकिन कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण वे अपने बाल-बच्चों के साथ कई किलोमीटर पैदल ही चल रहे हैं और सरकार यह सब खुली आंखों से देख रही है। पांच से दस साल के बच्चे भीषण गर्मी में चल रहे हैं। एक महिला द्वारा एक हाथ में सामान और गोद में अपने बच्चे को लेकर १६०० किमी की यात्रा करना दुखद और समाज को आईना दिखानेवाला है। लेकिन देश का श्रमिक वर्ग भूखे पेट पैदल चल रहा है। इस दौरान कई दुर्घटनाएं हुर्इं और कई लोगों की मौत भी हुई। अब हम यह पूछ रहे हैं कि इन प्रवासी मजदूरों के मामले में सरकार ने वास्तव में काम क्या किया है? न उनके लिए कोई विशेष ट्रेन छोड़ी गई और न ही उनके पेट भरने की व्यवस्था की गई। अगर सरकार लॉकडाउन करना ही चाहती थी तो पहले समाज के इन गरीब तबकों के बारे में सोचना चाहिए था। पहले लॉकडाउन तक ठीक था, लेकिन जब दूसरा लॉकडाउन बढ़ाया गया तो लोगों ने अपना धैर्य खो दिया और लोग बदहवास होकर बाहर निकल पड़े। अलग-अलग स्थानों पर अटके हुए लोगों को उनके गांव पहुंचाने की व्यवस्था नहीं की गई और अगर ऐसी व्यवस्था सरकार ने कागज पर बनाई भी होगी तो उसमें इन मजदूरों का कोई स्थान नहीं है। यदि वे दूसरे राज्य में जाना चाहते हैं तो हजारों लोगों को मूल राज्य से चिकित्सा प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए कतार में खड़ा कर दिया गया। इस व्यवस्था के चरमराने पर इस शर्त को रद्द कर दिया गया। मेडिकल सर्टिफिकेट की काला बाजारी शुरू हो गई थी। जिन मजदूरों के पास भोजन की भी व्यवस्था नहीं है, वे ऐसे प्रमाण पत्र के लिए १०००-५०० रुपए कहां से लाएंगे? ट्रेन के किराए के लिए पैसा नहीं है, यात्रा की कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में श्रमिक वर्ग पैदल ही निकल पड़ता है और इस तरह से जान गंवा बैठता है। प्रधानमंत्री मोदी और हर राज्य के मुख्यमंत्री रोजाना अपील कर रहे हैं, ‘घर से बाहर मत निकलो। जहां हो वहीं रहो।’ लेकिन लोग सुन नहीं रहे हैं और बाहर निकल रहे हैं। सरकार ने ‘लॉकडाउन’ के नियम कड़े कर दिए हैं। फिर भी ऐसे मजदूर गुट बनाकर बाहर निकलते हैं और उन्हें कोई सरकारी यंत्रणा नहीं रोकती। इसका मतलब यह है कि सरकारी तंत्र कमजोर हो गया है लेकिन इससे भी अधिक, लोगों का धैर्य खत्म हो चला है। घर पर या झोपड़ी में रहकर मरना ही है। शायद कोरोना से भी मरना पड़े। इससे अच्छा है कि बाहर निकलो और घर की ओर चलो। मर गए तो भी चलेगा… यदि लोग इस विचार तक पहुंच गए हैं तो ये खतरनाक है।संभाजीनगर-जालना रेलवे पटरी पर बिखरी लाशें यही कह रही हैं। उन्होंने अपने गांव को रोटी के लिए छोड़ा था, जिसे ‘लॉकडाउन’ ने छीन लिया। उसी रोटी की तलाश में वे रेल की पटरियों के किनारे चले गए। वे घर नहीं पहुंचे, और उनकी लाशों के बगल में वो रोटियां दिखीं जो उन्होंने यात्रा के लिए रखी हुई थीं। ऐसी रोटी के शिकार लोग कोरोना और लॉकडाउन के ही शिकार हैं। यह कब रुकेगा?