" /> इंसाफ का इम्तिहान!

इंसाफ का इम्तिहान!

निर्भया गैंगरेप और हत्या के चारों दोषी फांसी की सजा से बचने के लिए अंत तक संघर्ष करते रहे। इस दौरान उन्होने इंसाफ का काफी इम्तिहान लिया। उनकी फांसी पर कल देर रात तक असमंजस बना रहा। पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा आखिरी याचिका खारिज किए जाने के बाद भी देर रात तक सजा से बचने का उनका प्रयास जारी था। उनके खिलाफ पहले भी तीन बार डेथ वारंट जारी हुआ था, तब उनके वकील अपने पैंतरों से फांसी टलवाने में सफल हुए थे और चौथी बार भी दोषियों के वकील डेथ वारंट खारिज करवाने का प्रयास करते नजर आए। डेथ वारंट के अनुसार २० मार्च की सुबह ५.३० बजे निर्भया के चारों दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। पवन जल्लाद ने बीते बुधवार को फांसी के फंदे पर लटकाने की डमी रिहर्सल भी की थी क्योंकि फांसी देने में जरा-सी चूक भारी पड़ सकती थी इसीलिए जेल प्रशासन पूरी तरह चौकन्ना था। देश ही नहीं दुनियाभर के लोगों एवं मीडिया की नजर इन दरिंदों की फांसी पर टिकी थी। ऐसे में जेल प्रशासन वर्ष १९८२ में रंगा-बिल्ला की फांसी के समय हुई गलती को दोहराने से बचने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा था।
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने निर्भया मामले के चार में से तीन दोषियों की मौत की सजा पर रोक लगाने का अनुरोध करनेवाली याचिका कल खारिज कर दी, जिसके बाद माना गया कि दोषियों के पास बचाव के लिए कोई रास्‍ता नहीं बचा था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धमेंद्र राणा ने अक्षय कुमार, पवन गुप्ता और विनय शर्मा की मृत्युदंड पर रोक लगाने के अनुरोधवाली याचिका खारिज कर दी। इसके बाद दोषियों के वकील ने एक याचिका दायर करके निचली अदालत के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी और दूसरी याचिका में दोषी पवन ने राष्ट्रपति द्वारा उसकी दया याचिका खारिज करने के फैसले को चुनौती देने का प्रयास किया लेकिन उनका आखिरी प्रयास नाकाम सिद्ध हुआ और चारों दरिंदों को आज तडके 5.30 बजे फांसी पर लटका दिया गया।
मामला कुछ ऐसा है कि दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा से १६ दिसंबर, २०१२ की रात ६ लोगों ने चलती बस में दरिंदगी की थी। २६ दिसंबर को सिंगापुर में इलाज के दौरान निर्भया की मौत हो गई थी। घटना के ९ महीने बाद यानी सितंबर, २०१३ में निचली अदालत ने ५ दोषियों राम सिंह, पवन, अक्षय, विनय और मुकेश को फांसी की सजा सुनाई थी। मार्च, २०१४ में हाईकोर्ट और मई, २०१७ में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा बरकरार रखी थी। ट्रायल के दौरान मुख्य दोषी राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। एक अन्य दोषी नाबालिग होने की वजह से ३ साल में सुधार गृह से छूट चुका है। उम्मीद है कि आज भोर में निर्भया के बाकी ४ दोषी भी फांसी के फंदे पर लटक चुके होंगे।
वैसे तो फांसी पर लटकाने के चंद सेकें‍ड में ही वैâदी की जीवनलीला समाप्‍त हो जाती है लेकिन तिहाड़ जेल में देश की सबसे चौंकाने वाली फांसी का इतिहास भी दर्ज है। ३८ साल पुराना वह मामला दरिंदे रंगा की फांसी से जुड़ा था। इसलिए तिहाड़ जेल निर्भया के दरिंदों की फांसी को लेकर बहुत सतर्क था। यह बात १९८२ की है जब तिहाड़ जेल में एक शातिर वैâदी रंगा को जल्‍लाद ने फांसी पर लटकाया था लेकिन फांसी के २ घंटे बाद तक वो जिंदा रहा, जिसके बाद फांसी से पहले कई बार ट्रायल किया जाने का नियम आया। इसका खुलासा दिल्ली की तिहाड़ जेल में वर्षों कार्यरत रहे सुनील गुप्ता ने इस सनसनीखेज फांसी का जिक्र अपनी पुस्तक `ब्लैक वॉरंट कनफेशंस ऑफ अ तिहाड़ जेलर’ में किया है। उसमें उसने रंगा-बिल्ला की फांसी से जुड़े इस मामले का जिक्र करते हुए पूरा वाकया लिखा है। बिल्ला और रंगा का मामला भी निर्भया कांड जैसा ही जघन्य था।
ये था रंगा और बिल्ला का कुकर्म
वर्ष १९७८ में १६ वर्षीया किशोरी और उसका १४ वर्षीय भाई एक कार में लिफ्ट लेकर ऑल इंडिया रेडियो जा रहे थे, जहां युववाणी कार्यक्रम में उनका एक शो था। दुर्भाग्य से उन्हें लिफ्ट दो गुंडों ने दी जो मुंबई से दिल्ली आए थे। उनकी योजना थी कि वो किसी का अपहरण कर उसके घरवालों से फिरौती वसूल करेंगे लेकिन ये पूरा मामला पहले रेप और फिर हत्या में बदल गया। किडनैप के बाद दोनों दरिंदों ने किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म किया इस दौरान विरोध कर रहे उसके भाई की पहले हत्या की बाद में किशोरी को भी मार डाला। दोनों दुर्दांत दरिंदों को वर्ष १९८२ में फांसी दी गई। ३१ जनवरी, १९८२ को दोनों को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। लगभग ८ महीने तक यह मामला कोर्ट में चला। सुप्रीम कोर्ट ने ७ अप्रैल, १९७९ को दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद कानूनी विकल्पों के खत्म होने के बाद दोनों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई।
दो घंटे तक जिंदा था रंगा
तिहाड़ में रंगा और बिल्ला को १९८२ में सुबह फांसी दी गई थी। उसकी फांसी के समय वहां जल्लाद समेत आला अधिकारी-कर्मचारी सब मौजूद थे। फांसी पर लटकाए जाने के बाद सभी ने यह मान लिया था कि रंगा-बिल्ला मर चुके हैं। लेकिन दो घंटे बाद जब डॉक्टर दोनों के शव को जांचने के लिए पहुंचे तो रंगा की नब्ज चल रही थी। इसके बाद में रंगा के फंदे को नीचे से दुबारा खींचा गया, तब जाकर उसकी मौत हुई।
लेखक सुनील गुप्‍ता ने अपनी पुस्‍तक में लिखा है कि ‘रंगा बहुत जॉली किस्म का इंसान था। उसे फांसी की कोई फिक्र नहीं थी। लेकिन पेशे से टैक्सी चालक बिल्ला हमेशा रोता रहता था। फांसी से पहले दोनों एक-दूसरे पर फंसाने का आरोप लगाते रहे।