" /> इधर पढ़े-लिखे युवक आतंकवाद की राह थाम रहे हैं, उधर सेना उन्हें ताबड़तोड़ मार गिरा रही है

इधर पढ़े-लिखे युवक आतंकवाद की राह थाम रहे हैं, उधर सेना उन्हें ताबड़तोड़ मार गिरा रही है

कश्मीर में दो सिलसिले तेजी पकड़ चुके हैं। पहला बंदूक उठाकर आतंक की राह को थामने का तो दूसरा आतंकी बन रहे युवकों को मार गिराने का। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कश्मीर में अब अधिकतर पढ़े-लिखे युवक ही आतंकी बनते जा रहे हैं। ऐसे युवकों के साथ-साथ उस पार से आनेवाले आतंकियों को भी सेना बख्श नहीं रही है। इससे यह भी साबित होता है कि इस वर्ष अभी तक अगर 6 बहुत ही पढ़े-लिखे युवकों ने आतकंवाद की राह को थामा है तो पिछले 142 दिनों में 90 से अधिक आतंकी मार गिराए जा चुके हैं।

इस साल सेना द्वारा मारे गए ज्यादातर आतंकी फिदायीन थे। इन आतंकियों के निशाने पर घाटी के सैन्य कैंप थे। इस बार की गर्मियों में घाटी में दहशत पैदा करने आए ये दहशतगर्द पहले ही सेना की राडार पर आ गए और मारे गए। अधिकतर आतंकी पाकिस्तान के थे और लश्कर से जुड़े थे।

दरअसल, मुठभेड़ों में आतंकियों के मरने का आंकड़ा इसलिए बढ़ता जा रहा है क्योंकि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद घाटी के कई युवा आतंक की राह पर चल पड़े हैं। इसमें शिक्षित युवाओं की संख्या ज्यादा है। इस साल अब तक घाटी के 22 युवा कलम छोड़कर बंदूक उठा चुके हैं। इन सभी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं। सुरक्षा एजेंसियां पढ़े-लिखे युवाओं का आतंकवाद में शामिल होना बड़ी चुनौती मान रही हैं। उनका कहना है कि कुछ ऐसे तत्व घाटी में सक्रिय हैं, जो शिक्षित युवाओं को बहका रहे हैं। हालांकि हाल ही में श्रीनगर में हुई सुरक्षा समीक्षा बैठक में अधिकतर एजेंसियों ने प्रशासन को स्थानीय युवाओं की आतंकी संगठनों में भर्ती रोकने के लिए प्रयासों में सहयोग का आश्वासन दिलाया है। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 9 वर्षों में 500 से अधिक स्थानीय युवाओं ने आतंकवाद का रास्ता अपनाते हुए हाथों में बंदूक उठा लिया। वर्ष 2019 में 62, 2017 में 126, 2014 में 53, 2013 में 16, 2012 में 21, 2011 में 23 और 2010 में 54 युवा आतंकी संगठनों में शामिल हुए।

हाल ही में मारे गए आतंकियों ने आतंकी गुटों में शामिल होने पर अपनी तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल किया था। साथ ही संक्षेप में अपना बायोडाटा भी वायरल किया था। कुछ दिन पहले मारे गए तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन अशरफ सेहराई के आतंकी बने बेटे जुनैद अहमद सेहराई की 2018 में वायरल हुई तस्वीर इसका एक उदाहरण था। जब वो हिजबुल में शामिल हुआ तो उसने आतंकी बनने की तिथि के साथ ही अपनी डिग्रियों की नुमाइश भी इन तस्वीरों के साथ कर अन्य युवकों को गुमराह करने का प्रयास किया था।
जुनैद कश्मीर यूनिवर्सिटी से एमबीए था, जबकि श्रीनगर के फैज मुश्ताक वाजा और दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग जिले के रौफ बशीर खांडे ने भी ऐसा ही किया था। रौफ बीए फर्स्ट ईयर का छात्र था। कुछ साल पहले ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का स्कॉलर मन्नान वानी हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हुआ था। वो उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा का रहनेवाला था और बाद में मारा गया था। ऐसा भी नहीं है कि 142 दिनों में 90 आतंकियों के मारे जाने की घटनाओं के बाद आतंकवाद की राह पर चलने का सिलसिला थम गया हो, बल्कि यह दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, जो सुरक्षाबलों के लिए चुनौती साबित होने लगा है।