" /> ‘इश्क और फसाद’ में  सब-कुछ जायज नहीं होता?

‘इश्क और फसाद’ में  सब-कुछ जायज नहीं होता?

कहा जाता है कि ‘इश्क और सियासत‘ में सबकुछ जायज होता है। पर, ये सच नहीं ? सच्चाई ये है कि इश्क पर्दे का फलसफा है, जिसमें लिहाज, शर्म-हया अब भी है। लेकिन सियासत में ये दूर-दूर तक नहीं। वह दिनों दिन बदनाम और बेशर्म होती जा रही है। हर बड़े फसाद की जड़ सियासत ही होती है। दिल्ली दंगों का जिन्न एक फिर बोतल से बाहर निकला है। राजधानी में बीते २३ से २७ फरवरी के बीच भड़के दंगों की रिपोर्ट को दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की जांच कमेटी ने सार्वजनिक किया है। रिपोर्ट कहती है, दंगे दो समुदायों के बीच हुए थे जिसमें दोनों तरफ से ५३ लोगों की जानें गई थीं। जबकि, सैकड़ों की संख्या में लोग चोटिल हुए थे। दंगों के दंश को याद करके आज भी रूहें कांप उठती हैं। लोग एक दूसरे को सरेआम मार रहे थे। चारों ओर आगजनी, हाहाकार, चिल्ल-पुकार, घर-दुकानें जलाईं जा रही थी। उन दृश्यों को जिन्होंने भी अपनी आंखों से देखा था उनकी आंखों में आज भी आंसू भर आते हैं। र्इंट-पत्थरों से दंगाई एक दूसरों पर वार कर रहे थे। दंगाई खून के प्यासे हो गए थे। दंगों पर सार्वजनिक हुई अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक दंगे सुनियोजित थे और संगठित थे। निशाना बनाकर तय समय पर दंगे भड़काए गए। लेकिन कुछ लोग उन दंगों को शाहीन बाग में हुए मूवमेंट से जोड़कर देखते हैं।
सीएए और एनआरसी के विरोध को लेकर करीब दो महीनों तक दिल्ली के जामिया इलाके में खासकर मुस्लिम महिलाओं ने मूवमेंट जारी रखा था। वैसे ही कुछ और मूवमेंट दिल्ली के दूसरे जगहों पर भी आयोजित हुए थे। पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद में भी एक प्रदर्शन शुरू कर दिया। उसे खत्म करने के लिए भाजपा नेताओं ने मोर्चा संभाला था। अगुआई भाजपा नेता कपिल मिश्रा कर रहे थे। शुरुआत में उनका भी नाम दंगों से जोड़ा गया। लेकिन बीते सप्ताह आई पुलिस एक रिपोर्ट में उनको क्लीन चिट दे दी गई। उनका दंगों में हाथ नहीं था, ऐसा दिल्ली पुलिस ने बताया है। जबकि, एक विशेष समुदाय शुरू से कपिल मिश्रा का नाम दंगों से जोड़ रहा है। उनका आरोप है कि दंगे वाले जगहों पर उनकी मौजूदगी थी।
दिल्ली दंगों पर मुकम्मल जांच हो, इसको लेकर भी राजनीति हुई। दंगों की जांच कोई और करे इस पर विशेष समुदाय को एतराज था। पुलिस व केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं था। इन सबसे अलग उनकी एक स्वतंत्र जांच की मांग थी। उनकी मांग को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की नौ सदस्यीय कमेटी को जिम्मा सौंपा। कमेटी में सुप्रीम कोर्ट ने वकील एमआर शमशाद कमेटी के चेयरमैन बनाए गए थे। जबकि गुरिंदर सिंह मथारू, तहमीना अरोड़ा, तनवीर काजी, प्रोफेसर हसीना हाशिया, अबु बकर सब्बाक, सलीम बेग, देविका प्रसाद और अदिति दत्ता को शामिल किया। उन सभी लोगों ने अपने स्तर पर दंगों की सच्चाई जानी। पांच-सात महीनें जमकर मेहनत की। लेकिन जब रिपोर्ट सामने आई तो उसे सुनियोजित करार दिया।
भाजपा ने विरोध जताया है। उनका कहना है कि वह खुद शुरू से कहते आए हैं कि दंगा सुनियोजित था। पर किसने कराया ये कोई नहीं बताया। वैसे, अल्पसंख्यक आयोग का इशारा भाजपा नेताओं पर है। तो वहीं भाजपा का शक अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े नेताओं पर है। दोनों का आपास में आरोप प्रत्यारोपों का दौर भी शुरू हो गया है। गनीमत इस बात की है, ये समय कोरोना संकट का है। वरना मसला और गर्म होता, विरोध में लोग सड़कों पर भी उतरते। फिर से माहौल दंगों जैसा होता। दंगों की आड़ में तब से लेकर आज तक जमकर सियासत हुई। उसका सीधा खामियाजा दिल्ली की आवाम ने भुगता। लोगों महीनों डर के कारण घरों से नहीं निकले, काम धंधे ठप्प हो गए। मोहल्ले का आपसी सौहार्द बिगड़ गया।
इलाके में दंगों के काले दाग आज भी दिखाई पड़ते हैं। मोहल्ले वासियों का जिनसे रोजाना दुआ-सलाम हुआ करती थी, उनसे नजरें चुरानी पड़ती हैं। दंगों का फर्क किसी राजनेता पर नहीं पड़ा। नुकसान सिर्फ आवाम को उठाना पड़ा। नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम कराके सिर्फ सियासी लाभ उठाया। ये बात लोगों को बाद में समझ आई। लेकिन जब तक समझ में आई उससे पहले बहुत कुछ लुट चुका था। फिलहाल दंगों वाले इलाकों में आज शांति बनी हुई है। ये किसी नेता ने नहीं, बल्कि लोगों ने आपस में मिलकर पुरानी बातों को भुलाया। वहां जिंदगी एक बार फिर से पहले जैसी हो रही है। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे। कहीं से भी हताहत की खबरें नहीं आईं, लेकिन सिर्फ पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़के। क्यों भड़के, किसने भड़काए, इसका जवाब किसी के पास नहीं है?
दंगों के वक्त दिल्ली में दो मुद्दे एक साथ गर्म थे। अव्वल, सीएए का विरोध और दूसरा विधानसभा चुनाव की सरगर्मिययां? सभी को पता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपाईयों ने सीएए के विरोधियों के खिलाफ भड़काऊ भाषण भी दिए थे। वैसे, कई भाषणों का अपनी जांच कमेटी ने आयोग ने ज्रिक भी किया। भाजपा नेता कपिल मिश्रा के मौजपुर में दिए गए भाषण के फौरन बाद दंगे भड़के थे। उस भाषण में कपिल मिश्रा ने जाफराबाद में सीएए के विरोध में बैठे प्रदर्शनकारियों को बल पूर्वक हटाने की बात कही थी। उस दौरान उनके साथ दिल्ली पुलिस के डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या भी मौजूद थे। तब हिंदू दक्षिणपंथी गुटों के जरिए सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को डराने धमकाने के लिए उनपर हमले भी किए गए थे। तीस जनवरी को जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रदर्शनकारियों पर राम भक्त गोपाल नामक व्यक्ति ने गोली भी चलाई थी। उसके दूसरे दिन कपिल गुर्जर नाम ने लड़के ने भी शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इश्क और सियासत में सब कुछ जायज नहीं होता। दोनों के रास्ते भिन्न-भिन्न हैं।