" /> इस्लामिक विश्व खतरे में!

इस्लामिक विश्व खतरे में!

कोरोना काल के बीच इन दिनों वैश्विक राजनीति में अचानक आए बदलाव के बाद यह सवाल उठने लगा है कि इस्लामिक विश्व क्या खत्म होने जा रहा है? ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि इस इस्लामिक विश्व की आधारशिला रखनेवाले इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी में फूट पड़ गई है। १९६७ में ये संगठन तब बना था, जब पश्चिमी गाजापट्टी को लेकर इजराइल और सीरिया में जमकर लड़ाई खिंची हुई थी। इधर अमेरिका के दवाब के बाद सऊदी अरब और इजराइल में बरसों से बंद बातचीत शुरू हो गई है और दोनों में राजनयिक संबंध भी शुरू हो गए हैं।
दरअसल १९६७ में जब इजराइल ने वेस्ट बैंक की जमीन पर कब्जा कर लिया था तो सबको लगा था कि अब इसी नाम पर इस्लामिक देशों खासकर तेल उत्पादक देशों को मिलाकर एक-दूसरे की मदद की जाए। इसी नाम पर पाकिस्तान जैसे देश को भी खूब मदद मिली और जिहाद के नाम पर इकट्ठे हुए आतंकियों और मौलानाओं को भी खूब मदद मिली। लेकिन कोरोना के बाद अब हालात एकदम बदल गए हैं। एक तरफ जहां तेल और गैस के दाम औंधे मुंह गिर गए हैं, वहीं बाकी बाजार भी ठप हैं। ऐसे में अपना विकास ही पहली प्राथमिकता बची है। उसी के चलते सऊदी अरब के प्रिंस ने अमेरिका की बात मान ली। इतना ही नहीं इजराइल के कब्जेवाले हिस्सों को छोड़ने की जिद भी नहीं है यानी इजराइल जहां है, वहीं डटा रहेगा। खुद इजराइल के बेंजामिन नेतन्याहू ने कह दिया है कि वो कहीं नहीं हटनेवाले।
इजराइल की स्थापना १९४८ में हुई लेकिन पश्चिम एशिया के राष्ट्रों में से सिर्फ दो देशों ने उसे अभी तक कूटनीतिक मान्यता दी थी। एक मिस्र और दूसरा जोर्डन। ये दोनों इजराइल से लगे राष्ट्र हैं। इन दोनों के इजराइल के साथ जबरदस्त युद्ध हुए हैं। इन युद्धों में दोनों की जमीन पर इजराइल ने कब्जा कर लिया था लेकिन १९७८ में मिस्र ने और १९९४ में जोर्डन ने इजराइल के साथ शांति-संधि कर ली और कूटनीतिक संबंध स्थापित कर लिए। इजराइल ने मिस्र को उसका सिनाई का क्षेत्र वापस किया और जोर्डन ने पश्चिमी तट और गाजा में फिलस्तीनी सत्ता स्थापित करवाई लेकिन संयुक्त अरब अमीरात यानी आबूधाबी के साथ इजराइल का जो समझौता हुआ है, उसमें इजराइल को कुछ भी त्याग नहीं करना पड़ा है। आबूधाबी इसी बात पर राजी हो गया है कि इजराइल ने उसे आश्वस्त किया है कि वह पश्चिमी तट के जिन क्षेत्रों का इजराइल में विलय करना चाहता था, वह नहीं करेगा। इस समझौते का श्रेय डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी सरकार ले रही है, जो वाजिब है। उसने ईरान के विरुद्ध इजराइल, सउदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात आदि कई सुन्नी देशों का एक सम्मेलन पिछले साल पोलैंड में बुलाया था। उसी में इजराइल और आबूधाबी का प्रेमालाप शुरू हुआ था। इस समझौते से ईरान और तुर्की बेहद खफा हैं लेकिन ट्रंप अपने चुनाव में इसका दोहन करना चाहते हैं। ट्रंप की टोपी में यह एक मोरपंख जरूर बन गया है।
अब अमेरिका की नजर ईरान पर है और वो हर हाल में ईरान को सबक सिखाना चाहता है। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ परमाणु हथियार पाबंदी का प्रस्ताव भी सुरक्षा परिषद में लाया लेकिन उसे किसी बड़े देश का साथ नहीं मिला लेकिन अमेरिका चुप नहीं बैठेगा। असल में पश्चिम एशिया के ज्यादातर तेल उत्पादक और मुस्लिम देश लीबिया, सीरिया, लेबनान, तुर्की, तेहरान जैसे देश बरबादी की कगार पर हैं और ब्राजील जैसे दक्षिण अप्रâीकी मुस्लिम देश कोरोना से कराह रहे हैं। ऐसे में सऊदी अरब ने तो पाकिस्तान तक को खाली हाथ लौटा दिया। चीन और रूस मदद दे सकते हैं लेकिन दोनों खुद इस्लामिक उपद्रव से परेशान हैं। ऐसे में इस्लामिक विश्व में बरबादी और हिंसा से बदलाव की लहर दिख रही है। भारत को ऐसे में संभलकर चलना होगा। उसको पूरी तरह से अमेरिका का पिछलग्गू नहीं बनना चाहिए क्योंकि तब अमेरिका से खफा जिहादी पाकिस्तान के रास्ते भारत को परेशान कर सकते हैं। भारत को खुद को मजबूत करना चाहिए और अपने खतरों से ही निपटना चाहिए।