ईदी ने पूरी करवाई ‘मुगल-ए-आजम’

आजकल फिल्मों का प्रमोशन कर यह कहा जाता है कि फलां फिल्म ने इतने करोड़ का बिजनेस किया। आज फिल्मों की पब्लिसिटी के लिए हर तरह के संसाधन मौजूद हैं लेकिन १९६० में रिलीज हुई फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ ने ५० करोड़ का बिजनेस कर पूरे हिंदुस्थान में तहलका मचा दिया था। बात उन दिनों की है जब हिंदुस्थान में एक रुपए में ५ धरा यानी २० किलो गेहूं बिकता था। उस समय सिनेमा की टिकटों की दर ६ आने से लेकर २ रुपए तक हुआ करती थी। जबकि आज ५० से लेकर २००-३०० रुपए तक का टिकट बिकता है। उस जमाने में फिल्मों की पब्लिसिटी ‘स्क्रीन’, ‘ट्रेड गाइड’, ‘फिल्म इंफॉर्मेशन’ तथा देश में प्रकाशित होनेवाली पत्र-पत्रिकाओं एवं होर्डिंग्स के माध्यम से की जाती थी। लेखक, डायरेक्टर के. आसिफ ने मुगलिया सल्तनत पर आधारित फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का निर्माण ५० के दशक में शुरू किया था। इस फिल्म में संगीत नौशाद अली का था।
फिल्म की कहानी शहंशाह अकबर का बेटा शहजादा सलीम राजनर्तकी अनारकली के प्रेम में फंसकर अपने पिता से बगावत कर देता है। इस फिल्म के गीत ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे…’, ‘प्यार किया तो डरना क्या…’, ‘मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए…’ आदि गाने आज भी दर्शकों में लोकप्रिय हैं। दिलीप कुमार, मधुबाला, पृथ्वीराज कपूर, दुर्गा खोटे, अजीत आदि कलाकारों द्वारा अभिनीत इस फिल्म के निर्माण में कई वर्ष बीत गए। कभी कलाकारों की डेट्स न मिलना, तो कभी पैसों की तंगी, तो कभी कोर्ट-कचहरी का चक्कर। उस जमाने में इस फिल्म के निर्माण पर तकरीबन १५ करोड़ रुपए खर्च हुए। स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन के शापुरजी पालनजी इस फिल्म को फाइनांस कर रहे थे। ‘मुगल-ए-आजम’ का निर्माण करते-करते निर्देशक के. आसिफ कंगाल हो गए। वे उधारी के सिगरेट पीने लगे थे। यहां तक कि उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना तक बंद कर दिया था। इस बीच ईद आ गई। के. आसिफ का काम उधारी में चल रहा था। फाइनांसर शापुरजी पालनजी ने सोचा कि चलो आज ईद का शुभ दिन है। आज के. आसिफ से मिलकर उसे ईदी दे दी जाए। एक किलो मिठाई का डिब्बा तथा एक लिफाफे में ५००१ रुपए भरकर के. आसिफ के घर पहुंचे। उस समय आसिफ साहब घर में अकेले लुंगी-बनियान पहनकर बैठे थे। पारसी बाबा शापुरजी पालनजी ने उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा तथा रुपयों का पैकेट थमाते हुए उन्हें ईद की मुबारकबाद दी। के. आसिफ ने कहा कि मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि आप हमारे यहां आए। उन्होंने रुपयों से भरा पैकेट खोला और उसमें से एक रुपया निकालकर अपने पास रख लिया और कहा कि इन ५ हजार रुपयों में और रुपए मिलाकर हम एक दिन की शूटिंग पूरी कर लेते। के. आसिफ की भावनाओं और फिल्म के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए शापुरजी पालनजी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने के. आसिफ से कहा, ‘डीकरा, ये फिल्म अब जरूर पूरी होगी। फिल्म के निर्माण में जितना भी पैसा खर्च होगा हम करेंगे, आप शूटिंग की तैयारी करो।’ फिर क्या था फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। ५ अगस्त, १९६० को मुंबई के ‘मराठा मंदिर’ सिनेमा हॉल में लगी इस फिल्म को देखने के लिए लोगों को टिकट पाने के लिए कई-कई दिनों तक कतार में खड़े रहना पड़ा।