" /> ई-रिक्शे ला रहे हैं हिंदुस्थान में इलेक्ट्रिक क्रांति

ई-रिक्शे ला रहे हैं हिंदुस्थान में इलेक्ट्रिक क्रांति

दिल्ली के किसी भी मेट्रो स्टेशन के पास आपको ई-रिक्शा की लंबी कतारें दिख जाएंगी। मेट्रो स्टेशन आने और वहां से अपने घर जानेवाले मुसाफिरों के ‘लास्ट माइल’ यानी सार्वजनिक परिवहन केंद्र से किसी यात्री की आखिरी मंजिल तक पहुंचानेवाले प्रमुख साधन बन गए हैं।

१०-२० रुपए में कोई भी मेट्रो स्टेशन से अपने घर या किसी अस्पताल, स्कूल या दफ्तर तक पहुंच सकता है। ये तिपहिया वाहन, हिंदुस्थान की राजधानी की ट्रैफिक से भरी सड़कों पर आपको जाम में फंसे बिना मंजिल तक पहुंचा देते हैं।
लंबी दूरी जैसे पंद्रह से पच्चीस किलोमीटर तक का सफर तय करने के लिए आपको ऑटो या टैक्सी की मदद लेनी पड़ती है। दो-चार किलोमीटर दूरी तय करने में ई-रिक्शा और सामान्य रिक्शे काम आते हैं। अगर हम ये कहें ये तिपहिया वाहन, यानी ई-रिक्शा भारत में बड़ी खामोशी से इलेक्ट्रिक वाहन की क्रांति ला रहे हैं, तो गलत नहीं है।
क्या भारत में इलेक्ट्रिक कारों का दौर
यूरोप, अमेरिका और चीन जैसे क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक वाहनों में लोगों की निजी इलेक्ट्रिक कारों का हिस्सा ज्यादा है। इसके उलट, हिंदुस्थान में इलेक्ट्रिक क्रांति की अगुवाई ई-रिक्शा कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह ये है कि अमेरिका में जहां हर एक हजार में से ८०० लोगों के पास कारें हैं तो हिंदुस्थान में ये अनुपात हर एक हजार की आबादी में बस २० कारों का है। हिंदुस्थान में इलेक्ट्रिक वाहनों से आवाजाही से एक साथ कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। पहली बात तो ये कि इससे प्रदूषण कम होता है। प्रदूषण से वैंâसर, फेफड़ों और दिल की बीमारियां होने का डर बढ़ जाता है।
‘गरीबों के लिए रोजगार’
इससे ई-रिक्शा का चलन भी बढ़ा है। हालांकि, अभी भी ये स्वच्छ वाहन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयला या गैस से बननेवाली बिजली पर निर्भर हैं। फिर भी, इलेक्ट्रिक गाड़ियां प्रदूषण कम पैâलाती हैं। एक मोटे अंदाज के मुताबिक, दिल्ली में करीब १५ लाख ई-रिक्शा हैं। इनसे एक बार में चार सवारियों को ढोया जा सकता है। परिवहन और शहरी प्रशासन के विशेषज्ञ श्री प्रकाश कहते हैं, ‘ई-रिक्शा, बहुत से शहरी गरीबों के लिए रोजगार का अच्छा माध्यम बन गए हैं। ये हल्के होते हैं और कम बिजली से चलते हैं।’

सौर ऊर्जा से चार्ज होते रिक्शे
बहुत से उद्यमी ई-रिक्शा के बढ़ते चलन में अपने लिए अवसर देख रहे हैं। बंगलुरु की रहनेवाली रोजमेरी पियर्स-मेसिक, थ्री व्हील्स यूनाइटेड कंपनी चलाती हैं जो ई-रिक्शा खरीदने के इच्छुक लोगों को सस्ती दरों पर कर्ज देती है। फिर एक ऐप के जरिए उनकी निगरानी करती है, ताकि वो कंपनी का पैसा तय समय पर चुका दें। ई-रिक्शा के साथ एक बड़ी चुनौती ये है कि इसे चार्ज होने में काफी समय लग जाता है। कुछ कंपनियों ने इसका विकल्प भी ढूंढ निकाला है। सन मोबिलिटी के चेतन मैनी ऐसे ही शख्स हैं। वो ई-रिक्शा के लिए पूरी तरह चार्ज बैटरियां उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए वो देशभर में ई-रिक्शा निर्माताओं और बैटरी बनानेवालों के साथ साझेदारी कर रहे हैं।