उत्तरायण की यात्रा पर सूर्यदेव, मकर संक्रांति विशेष

सूर्यदेव १५ जनवरी की प्रात: ब्रह्मवेला में दक्षिणायन की यात्रा समाप्त कर उत्तरायण की राशि ‘मकर’ में प्रवेश करनेवाले हैं। इसी के साथ ही देवताओं के दिन और पितरों की रात्रि का शुभारंभ हो जाएगा, जिसके फलस्वरूप सभी तरह के मांगलिक कार्य, यज्ञोपवीत, शादी-विवाह, गृहप्रवेश आदि आरंभ हो जाएंगे। सूर्य का मकर राशि प्रवेश पृथ्वी वासियों के लिए वरदान की तरह है, क्योंकि सृष्टि के सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर आदि इनके मकर राशि के गोचर के मध्य ‘तीर्थराज प्रयाग’ में एकत्रित होकर गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम तट पर स्नान, जप-तप, और दान-पुण्य कर अपना जीवन धन्य करते हैं।

पुण्यकाल
मकर संक्रांति १५ जनवरी, २०२० को सुबह ७ बजकर १५ मिनट से शाम ५ बजकर ४६ मिनट कर रहेगी। कुल अवधि १० घंटे ३१ मिनट
मकर संक्रांति महापुण्यकाल सुबह ७.१५ से सुबह ९ बजे तक रहेगा।
कुल अवधि १ घंटे ४५ मिनट तक
साल का पहला त्यौहार १५ जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे इसलिए इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। १५ जनवरी को सुबह ८.३३ मिनट पर सूर्य श्रवण नक्षत्र के साथ धनु से मकर राशि में प्रवेश करेगा। इस दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है। सूर्य के उत्तरायण होते ही देवताओं के दिन की शुरुआत हो जाती है।
जानिए संक्रांति पर्व कैसे मनाएं
सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते है। यह परिवर्तन मास में एक बार आता है।
इस दिन सुबह उठकर उबटन आदि लगाकर तीर्थ के जल से स्नान करें।
उबटन न हो तो दूध-दही से बी स्नान कर सकते हैं।
गंगा-यमुना-गोदावरी पवित्र नदी का स्नान करना अति शुभ होता है।
स्नान के बाद सूर्य भगवान को जल देना चाहिए और आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
पुण्यकाल में दांत माजना कठोर बोलना, फसल, वृक्ष काटना, गाय का दूध निकालना मैथुन काम विषयक कार्य नहीं करने चाहिए।
उत्तरायण देवताओं का अयन है। यह पुण्य पर्व है। इस पर्व से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।
उत्तरायण में मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उत्तरायण का समय देवताओं के दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान व दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता है।

भौगोलिक महत्व
मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में आना शुरू हो जाते हैं इसलिए रात से दिन बड़ा होना प्रारंभ हो जाता है। दिन बड़ा होने से सूर्य के प्रकाश की रोशनी ज्यादा समय तक रहती है। रात छोटी होने की वजह से अंधकार कम हो जाता है इसलिए इस संक्रांति पर सूर्य के राशि परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। यानी यह त्यौहार प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और खेती से जुड़ा हुआ है। इन्हीं तीनों चीजों को जीवन का आधार भी माना जाता है। प्रकृति के कारक तौर पर सूर्य की पूजा की जाती है। सूर्य की स्थिति के अनुसार ऋतुओं में बदलाव होने के साथ ही धरती अनाज पैदा करती है।
दिन विशेष
इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। यही नहीं कई जगहों पर तो मृत पूर्वजों की आत्मा शांति हेतु खिचड़ी का दान करने का विधान है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का प्रसाद भी बांटा जाता है। कई जगह पर पतंगें उड़ाने की परंपरा भी है।
दान
हमारे शास्त्रोेंं में दान की काफी महिमा बताई गई है। मकर संक्रांतिवाले दिन स्नान, दान, जप, तप श्राद्ध तथा अनुष्ठान का बड़ा महत्व है। कहते हैं कि संक्रांति के दिन किया दान सौ गुना होकर फलीभूत होता है। मकर संक्रांति के दिन घी, तिल, कंबल, खिचड़ी का दान अवश्य ही करना चाहिए ताकि आपको ज्यादा पुण्यफल मिले व आपके पापों का नाश हो।
आज के दिन स्नान के बाद आप गायत्री मंत्र, सूर्यकवच, आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करेंगे तो आरोग्य की प्राप्ति होगी तथा आत्मबल मजबूत होगी साथ ही रोगों से मुक्ति मिलेगी। आपके अधूरे या रुके कार्यों को गति मिलती ही है। सूर्य देवता आपको भरपूर खुशी आरोग्य प्रसन्नता दे, आप सदैव निरोगी रहें।