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‘उनकी मौत से काफी दिनों तक रही बेचैन!’-मीरा देवस्थले

२०११ में ‘ससुराल सिमर का’ से टीवी की दुनिया में कदम रखनेवाली मीरा देवस्थले गुजरात के वड़ोदरा शहर से मायानगरी मुंबई पहुंची हैं। शोख और चुलबुले अंदाज के लिए मशहूर मीरा को कामयाबी ‘जिंदगी विंस’, ‘दिल्लीवाली ठाकुर गर्ल्स’ और ‘उड़ान’ से मिली। ५ वर्ष की छोटी उम्र में मीरा ने रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत की। ‘कलर्स’ चैनल पर मीरा अभिनीत शो ‘विद्या’ का आरंभ हुआ था, जो लॉकडाउन के चलते बंद हो गया। पेश है मीरा से हुई पूजा सामंत की बातचीत के प्रमुख अंश-

 लॉकडाउन का दौर आपके लिए कैसा रहा?
मुझे किताबों पढ़ने का बहुत शौक है। इसके अलावा मैंने मां के साथ केक, पास्ता और इटालियन खाना बनाना सीखा है। इस दौरान मैंने महसूस किया है कि गृहिणियां कितनी मेहनत करती हैं और उनका काम कभी खत्म नहीं होता।

 इस फील्ड में कैसे आना हुआ?
बारहवीं की परीक्षा पास करने के बाद मैं मुंबई आ गई। एक्टिंग का कोर्स लिया। पहले मैं इंजीनियर बनना चाहती थी लेकिन मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना, एक्टिंग और डांस करना अधिक अच्छा लगता था इसलिए मैंने अभिनय की ओर जाने का मन बनाया। मुझे हमेशा परिवार का सहयोग और आजादी मिली।

 बड़े टीवी शोज कैसे मिले?
बड़े टीवी शोज के लिए मैंने अलग से ऑडिशंस और लुक टेस्ट ही दिए। ‘ससुराल सिमर का’ इस धारावाहिक में मुझे सबसे अंत में साइन किया गया। याद है मुझे वो दिन जब मैं साइन हुई और मैंने एक मेकअप किट खरीदने के साथ-साथ शॉपिंग की। इस शो के प्रोड्यूसर और लोग बहुत अच्छे थे। सीखने और समझने के लिए वहां बहुत कुछ मिला।

 धारावाहिक ‘विद्या’ के बंद होने पर मायूसी तो हुई होगी?
हां, थोड़ी मायूसी तो हुई क्योंकि कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से उन्होंने इसे बंद किया। दो-तीन दिनों तक तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। लेकिन मां ने बातचीत के जरिए मेरी मायूसी कम कर दी।

 क्या आप बड़े पर्दे पर काम करना चाहती हैं?
मैं अभी वेब सीरीज में काम करना चाहती हूं क्योंकि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है। सीखने के बाद मैं फिल्मों में आना चाहूंगी। जीवन हो या करियर, सीढ़ी-दर-सीढ़ी आगे बढ़ने से ग्रोथ होती है। छलांग लगाने से बेहतर है धीरे-धीरे चलना।

 नेपोटिज्म, डिप्रेशन और खेमेबाजी के बारे में आपकी क्या सोच है?
मेरे परिवार में कोई अभिनय से संबंधित नहीं है। लेकिन टीवी क्षेत्र में राजनीति और नेपोटिज्म की हवा अभी नहीं बह रही है। वैसे ये हर क्षेत्र में होता है, परंतु अभी तक मुझे इसका सामना नहीं करना पड़ा। डिप्रेशन एक बीमारी है और लोग इसे छिपाते हैं, जो उचित नहीं। डॉक्टर की सलाह लेने से घबराना नहीं चाहिए। साथ ही दोस्तों और परिवार से संवाद बनाना जरूरी है, जो आपकी बात सुनें और सही निर्देश दें। इंडस्ट्री में कॉम्पीटिशन और इनसिक्युरिटी बहुत अधिक है इसलिए यहां डिप्रेस्ड होना या अकेले पड़ना आम बात है। ऐसे में सपोर्ट सिस्टम का स्ट्रॉन्ग होना बेहद जरूरी है। सुशांत सिंह राजपूत की घटना से मैं बेहद शॉक्ड थी क्योंकि इतना मेहनत करनेवाला इंसान ऐसा भी कदम उठा सकता है, विश्वास नहीं होता। मुझे काफी दिनों तक बेचैनी रही उनकी मौत से!