" /> उपचार खोजने की होड़ में सुपर कंप्यूटर भी!

उपचार खोजने की होड़ में सुपर कंप्यूटर भी!

दुनिया के सबसे तेज कंप्यूटर का दर्जा प्राप्त जापानी सुपर कंप्यूटर फुगाकू अब कोरोना वायरस से जंग में भी काम आने जा रहा है। वैसे, कोरोना के नया वायरस होने के कारण जानकारी के अभाव को पाटने के लिए भी साइंटिस्ट सुपर कंप्यूटर का सहारा ले रहे हैं यानी कि सुपर कंप्यूटिंग तकनीक कोविड-१९ महामारी की रोकथाम में योगदान भी दे रही है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व चीन में सुपर कंप्यूटरों की मदद से कोरोना पर कई महत्वपूर्ण शोध हो चुके हैं और यह सिलसिला अभी जारी है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी सुपर कंप्यूटर्स ने ही अल्जाइमर्स जैसी बीमारी के इलाज की दिशा में अहम खोज की थी। लिनोवो कंपनी ने इस मार्च में घोषणा की कि कंप्यूटर विशेषज्ञ और जैव विज्ञान शास्त्री सहयोग कर नोवेल कोरोना वायरस के जीन्स ग्रुप के अध्ययन में तेजी लाएंगे। जापान से पहले अमेरिका के सुपर कंप्यूटर आईबीएम समिट ने कई तरह की जांच के जरिए पता लगाया कि दवाओं की किस तरह की प्रॉपर्टी के जरिए वायरस को फैलने से रोका या नियंत्रित किया जा सकता है। इस खोज में ७७ ऐसे रसायनों की पहचान हुई है, जो कोरोना वायरस को जहां के तहां रोक देंगे। ओक रिज नेशनल लैब के हेल्थ एक्सपर्ट्स की यह खोज विज्ञान पत्रिका के आरएक्स आईवी पत्रिका में छप चुकी है। ये बताती है कि कैसे कोरोना वायरस इंसानी शरीर में अपने लिए होस्ट कोशिका चुनते हैं और कैसे धीरे-धीरे अपना संक्रमण फैलाते हैं। इस होस्ट कोशिका यानी स्पाइक की पहचान के बाद सुपर कंप्यूटर ने देखा कि किस तरह से दवाएं सीधे उस कोशिका से ही जुड़ जाएं ताकि संक्रमित कोशिका से दूसरी कोशिकाओं तक संक्रमण फैलने से रोका जा सके। कोरोना वैक्सीन के विकास में इस खोज का भी हाथ है।
फुगाकू को जापान की ही एक कंपनी रिकेन साइंटिफिक रिसर्च सेंटर ने फुजित्सु के सहयोग से बनाया है। फुगाकू की रफ्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ये एक सेकंड में ४१५ क्वाड्रिलियन की गणना कर सकता है। इसने ये भी पता लगा लिया है कि सांस से कैसे पानी की बूंदें (वॉटर ड्रॉपलेट्स) फैलती हैं। ध्यान रहे कि कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा खतरा सांस से निकली पानी की सूक्ष्म बूंदों से है, जो मास्क के साथ भी कई बार फैल जाती हैं।
फुगाकू जापानी वैज्ञानिकों की ६ सालों की दिन-रात की मेहनत का नतीजा है। सेकंड्स में मुश्किल से मुश्किल चीजें हल कर सके, इसके लिए वैज्ञानिकों ने इसमें डेढ़ लाख प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाई है। इसे ऑलराउंडर बनाने में काफी मेहनत की गई है। जैसे जापान भूकंप के लिए काफी संवेदनशील है। वहां जब-तब इसके कारण बड़े नुकसान होते रहे हैं। लिहाजा फुगाकू को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि ये भूकंप का भी अंदाजा लगा सके और साथ ही उससे हुए नुकसान की गणना कर सके। सुनामी जैसी आपदाओं के वक्त का सही अंदाजा करते हुए ये सुझा सकता है कि कम से कम वक्त में लोगों और जरूरी चीजों को कैसे बचाया जाए। कोरोना के मामले में भी फुगाकू मदद देने के लिए तैयार है। वैज्ञानिकों के मुताबिक वायरल बीमारियों के इलाज के लिए मौजूद २००० से ज्यादा दवाओं से भी फुगाकू पहचान कर सकेगा कि कौन सी दवा ज्यादा फायदेमंद है। इसके साथ ही वे दवाएं भी शामिल होंगी, जिनका अब तक क्लिनिकल ट्रायल नहीं हो सका है।
यह कंप्यूटर रिकेन सेंटर ऑफ कंप्यूटेशनल साइंस, कोबे में इंस्टॉल किया गया है। इसे सॉफ्टबैंक ग्रुप कॉर्पोरेशंस आर्म्स लिमिटेड की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके बनाया गया है। आर्म्स का दावा है कि यह कंप्यूटर इंटेल कॉर्प को भी हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के मामले में टक्कर दे सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि सन २०११ के बाद जापान के किसी कंप्यूटर को सुपर कंप्यूटर का दर्जा मिल सका है। सन २०११ में फुजित्सु के कंप्यूटर ने पहली रैंकिंग हासिल की थी। अब जापान ने चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल कर लिया है।
इससे पहले पूरे ९ सालों तक लगातार ये खिताब कभी अमेरिका तो कभी जर्मनी के पास जा रहा था पर चाहे अमेरिका हो, चीन हो या जर्मनी उनके सुपर कंप्यूटर की रफ्तार भी फुगाकू के आगे कुछ नहीं है। जापानी कंप्यूटर उनसे २.८ गुना तेज है। वहीं सामान्य कंप्यूटरों से भी यह १००० गुना तेज है।
आज कोरोना का कहर जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसने दुनियाभर के औषधि वैज्ञानिक व शोधकर्ता समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अब तक दुनियाभर में कोरोना के १ करोड़ से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। जबकि इससे ५ लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। अमेरिका में २५,४८,६१३, ब्राजील में १३,४४,१४३, रूस में ६,३३,५६३, हिंदुस्थान में ५,४८,३१८ तथा ब्रिटेन में ३,१२,६४४ मामले दर्ज किए गए हैं। इसके उपचार के लिए दुनियाभर में १२० जगहों पर वैक्सीन के विकास भी प्रकिया तेजी से चल रही है। ऐसे में सुपर कंप्यूटरों पर वैज्ञानिकों का ध्यान जाना लाजिमी है। इनकी सहायता से ही १२५ ऐसे प्राकृतिक पदार्थों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें कोविड-१९ वायरस से लड़ने की क्षमता मौजूद है। हंट्सविले में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ अलबामा में किए गए शोध में सुपर कंप्यूटर ने अब तक ५०,००० ऐसे प्राकृतिक पदार्थों की जांच की है। यह कोविड-१९ के खिलाफ लड़ाई में पहला मौका था जब सुपर कंप्यूटर का उपयोग वायरस द्वारा बनाए गए प्रोटीन के खिलाफ प्राकृतिक रूप से पाए जानेवाले यौगिकों की उपचार प्रभावकारिता का आकलन करने के लिए किया गया। यूनिवर्सिटी की शेल्बी सेंटर फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी में स्थित प्रयोगशाला ऐसी दवाओं की खोज कर रही है जो हेवलेट पैकार्ड एंटरप्राइज (एचपीई) क्रे सेंटिनल सुपर कंप्यूटर का उपयोग करके वैश्विक महामारी से निपटने में मदद करेगी। डॉक्टर जेरोम बॉड्री के मुताबिक हमने सुपर कंप्यूटरों का इस्तेमाल ऐसे प्राकृतिक पदार्थों की खोज के लिए किया है जो कोरोना वायरस के तीनों प्रोटीनों को बांध सकेगी। ५०,००० प्राकृतिक पदार्थों की हमने सुपर कंप्यूटर की मदद से जांच की है और हमें पता चला है कि १२५ ऐसे पदार्थ हैं जो वायरस के प्रोटीन को बांधकर वायरस को नष्ट करने में मदद कर सकते हैं। आगे के प्रयोगों में और भी ऐसे प्राकृतिक पदार्थ सामने आ सकते हैं। इन प्राकृतिक पदार्थों को अमेरिका में मिलनेवाले कई औषधीय पौधों से लिया गया है। इसके अलावा दक्षिण पूर्वी एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई पौधों से भी पदार्थों को जुटाया गया है। साथ ही समुद्र में पाए जानेवाले पौधों से भी नमूने लिए गए हैं। अब वैज्ञानिक लैब में जीवित वायरस के ऊपर इन पदार्थों का प्रयोग करेंगे और देखेंगे कि कौन-सा पदार्थ सबसे ज्यादा असरदार साबित होता है। इन पदार्थों की मदद से कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भविष्य में दवाइयां तैयार की जा सकती हैं।
सुपर कंप्यूटर के गुण सचमुच कमाल के हैं। अभी कुछ दिन पहले ही ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने एक सुपर कंप्यूटर की मदद से कोरोना वायरस के इलाज के लिए एंटी वायरल दवा खोजने का दावा किया है। मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने सुपर कंप्यूटर से की गई गणितीय मॉडलिंग की मदद से पाया कि इस दवा में संक्रमण के लिए जिम्मेदार सार्स-कोव-२ वायरस को ब्लॉक करने की ताकत होती है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इनहेलर से ली जानेवाली इस दवा को साल के अंत तक बाजार में उतारा जा सकेगा।