" /> उम्मीद की किरण दिखी तो टूटने लगा मजदूरों के सब्र का बांध

उम्मीद की किरण दिखी तो टूटने लगा मजदूरों के सब्र का बांध

◼️तपती धूप में ट्रेन का रजिस्ट्रेशन कराने दर-दर की ठोकर खा रहे हैं मजदूर
◼️न हो रहा ट्रेन का रजिस्ट्रेशन, न ही पता चल रही ट्रेन की सही समय-सारणी
◼️भय व भूख से लाचार मजदूरों का मुलुक जाने के लिए हाइवे पर लगा तांता
कोरोना संकट में रोजगार ठप होने से देशभर में प्रवासी मजदूर परेशान हैं। लगभग 40 दिन से ज्यादा समय से जारी लॉक डाउन का दूसरा चरण समाप्त होने तक जहां तहां फंसे मजदूर एक तरफ दो वक्त के भोजन को तरसने लगे थे दूसरी तरफ काम न होने के कारण उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना भी करना पड़ रहा है। इन तमाम दुश्वारियों के बावजूद मजदूर अपने गांव नहीं लौट पा रहे थे। लेकिन लॉक डाउन 3 की शुरूआत के साथ राज्य सरकारों के प्रयासों से केंद्र सरकार ने मजदूरों को उनके गंतव्य तकत पहुंचाने के लिए बस एवं श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के संचालन को मंजूरी दे दी है। मजदूरों को लेकर कई ट्रेनें एवं बसें रवाना भी हो चुकी हैं। इससे दूसरे मजदूरों को भई अपने गांव पहुंचने के लिए उम्मीद की किरण नजर आने लगी है लेकिन उम्मीद की इस किरण के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रहे मजदूरों के सब्र का बांध भई अब टूटता नजर आ रहा है।

भिवंडी के पावरलूम मजदूरों के सब्र का बांध अब टूटता जा रहा है। लॉकडाउन के कारण बेरोजगारी व भूख से परेशान उक्त मजदूर ट्रेन से अपने मुलुक जाने के लिए रजिस्टेशन करने के लिए तपती धूप में जहां दर-दर की ठोकर खा रहे हैं, वहीं ट्रेन का सही पता न लगने व नंबर न आने की निराशा के बाद थक-हारकर मजदूर पैदल ही अपने गांव की तरफ रवाना हो रहे हैं। सरकार द्वारा मजदूरों को अपने गांव पहुंचाने व उन्हें खाना मुहैया कराने का सारा दावा खोखला साबित हो रहा है। गौरतलब है कि कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन से सभी काम-धंधे फिलहाल बंद हैं, जिसके कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्यों से आए मजदूर बेरोजगारी, लाचारी, भूख व भय से परेशान हैं। तालाबंदी के कारण रोजी-रोजगार बंद होने से अपने-अपने दड़बानुमा खोलियों में भूखे कैदी सा जीवन काट रहे प्रवासी मजदूरों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। बेकारी और भूख ने इन्हें इतना हताश, निराश और बदहवास कर दिया है कि ये हर हाल में किसी भी तरह अपने मुलुक जाने के लिए छटपटा रहे हैं। हालांकि विशेष ट्रेन चलने की शुरूआत ने प्रवासी मजदूरों में घर जाने की आस व बेचैनी की रफ़्तार और बढ़ा दी है। इस कारण वे पुलिस प्रशासन द्वारा तय किए गए जगहों पर रोजाना धूप में जाकर लाइन तो लगा रहे है लेकिन उनके ट्रेन में रजिस्ट्रेशन नहीं हो पा रहा है। रजिस्ट्रेशन कराने के लिए मजदूर एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन का चक्कर काट रहे है, जिसका रजिस्ट्रेशन हो भी जा रहा है उसे पता ही नही चल पा रहा है कि उनके नंबर की ट्रेन कब जाएगी? जिसके कारण लॉकडाउन-3 लागू होने के बाद पावरलूम सहित अन्य मजदूर इक्का-दुक्का या टोली बनाकर अपने मुलुक की तरफ पलायन करना शुरू कर दिए हैं। जगह-जगह सीमाएं सील होने के साथ-साथ पुलिस की नाकाबंदी के बावजूद लोग पैदल, साइकिल, मोटरसाइकिल अथवा टेंपो आदि से जान-जोखिम में डालकर अपने मूल निवास की ओर लगातार कूच कर रहे हैं। इधर मजदूरों का कहना है कि जब यह पता ही नहीं लग रहा कि उनका नंबर कब आएगा तो वे यहां भूखे-प्यासे कैसे और कहा रुकें? इसलिए वे अपने गांव की तरफ कूच कर रहे हैं।नम आंखों से मजदूर कहते हैं कि जब किस्मत में मरना ही लिखा है तो गांव के नजदीक जाकर मरेंगे। यहां भूखों रहकर मरने से अच्छा है कि संघर्ष करके मरें।