उल्हासनगर की असलियत सिंधु नगर तो नहीं बना, ईसाई नगर बन रहा है

तत्कालीन राज्यपाल सी. राजगोपालाचारी ने रखा था नाम
सिंधी बन रहे हैं ईसाई
दिया जाता है प्रलोभन

सिंधी समुदाय के लोगों ने अपनी संस्कृति व धर्म बचाने के लिए अपनी जन्म भूमि छोड़ना पसंद किया परंतु अपना धर्म नहीं छोड़ा। आज उसी सिंधी समुदाय के लोग अपने धर्म यानी हिंदू धर्म की धज्जियां उड़ा रहे हैं। हिंदुस्थान-पाकिस्तान बंटवारे में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए सिंधी समुदाय के लोगों को कल्याण वैंâप के नाम से प्रसिद्ध मिलिट्री छावनी में बसाया गया। ८ अगस्त १९४९ को तत्कालीन गवर्नर सी. राजगोपालाचारी ने उल्हास नदी के नाम पर इस शहर का नाम उल्हासनगर रखा। राजगोपालाचारी ने जब उल्हासनगर नाम रखा तो उस समय सिंधी समुदाय के कुछ लोगों ने अपने सिंध की पहचान बनाए रखने के लिए उल्हासनगर की जगह सिंधुनगर नाम रखने की मांग की थी परंतु राजगोपालाचारी ने यह कहकर टाल दिया था कि मनपा आदि बनने के बाद इस शहर का नाम सिंधु नगर रख दिया जाएगा। तब से समय-समय पर विभिन्न संगठनों द्वारा उल्हासनगर का नाम सिंधुनगर रखने की मांग की जाती रही है लेकिन आज तक उल्हासनगर का नाम सिंधुनगर नहीं हो सका। हिंदू धर्म के लिए पाकिस्तान में स्वयं की भूमि, संपत्ति सहित सबकुछ त्याग कर आए उल्हासनगर के सिंधु समुदाय के लोगों ने पिछले कुछ सालों में तकरीबन डेढ़ लाख से अधिक सिंधी लोगों ने धर्म छोड़कर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है और जिस तीव्र गति से धर्म परिवर्तन कर रहे हैं उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि आनेवाले दिनों में उल्हासनगर का नाम ईसाई नगर हो जाएगा तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी? गौरतलब हो कि हिंदू धर्म परिवर्तन करके ईसाई बननेवालों में गरीब सिंधियों के अलावा आर्थिक रूप से संपन्न सिंधियों का भी समावेश है, जो बड़े खतरे की घंटी सिंधी समुदाय के लिए बताई जा रही है।