उषा काल है वैदिक समाज का जागरण काल

ऋग्वेद में सविता महत्वपूर्ण देव हैं। गायत्री नाम से विश्व चर्चित मंत्र में सविता की ही स्तुति है- तत्सविर्तुरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात। (३.६२.१०) संभवत: यह विश्व की प्राचीनतम काव्य रचना है। सातवलेकर के अनुवाद में कहते हैं ‘हम सविता देव के उस श्रेष्ठ, वरण करने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, यह सविता हमारी बुद्धियों को उत्तम मार्ग में प्रेरित करें।’ सविता देव बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग में प्रेरित करनेवाले हैं। इनका संबंध विवेक और अनुभूति से है। सविता का दर्शन हमारी बुद्धि का प्रेरक है। गायत्री मंत्र की ही तरह एक अन्य मंत्र (५.८२.१) में भी सविता के लिए वैसी ही शब्दावली वाली स्तुति है, ‘तत्सवितुर्वृणी वयं देवस्य भोजनम्, श्रेष्ठं सर्वधातम तुरं भगस्य धीमहि- हम सविता देव से उपभोग योग्य ऐश्वर्य की प्रार्थना करते हैं, हम उन भगदेव (भगवान) के सर्वधारक ऐश्वर्य को ग्रहण करें।’
सविता प्रत्यक्ष देव हैं। ऋग्वेद में सविता के लिए ११ सूक्त हैं और १७० से ज्यादा जगह सविता का उल्लेख है। सूर्य के लिए १० सूक्त हैं। सूर्य उपासना यूनान में भी थी। प्लेटों ने रिपब्लिक में इसका उल्लेख किया है। ऊषा के लिए २० सूक्त हैं और ३०० बार ऊषा का उल्लेख हुआ है। वैदिक समाज में सविता, सूर्य और ऊषा अलग-अलग उपास्य है लेकिन भौतिक यथार्थ में वे एक ही सूर्य के विभिन्न रूप आयाम हैं। सूर्य प्रत्यक्ष हैं, सविता और ऊषा प्रगाढ़ अनुभूति की अभिव्यक्तियां हैं। डॉ. कपिल देव द्विवेदी (वैदिक देवों का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक स्वरूप, पृष्ठ ७१) ने जोर देकर लिखा है ‘सविता ही सूर्य है’। डॉ. द्विवेदी ने स्पष्ट किया है ‘सविता का अर्थ है – प्रेरणा शक्ति देनेवाला प्रेरक, गति देनेवाला। सूर्य संसार को गति प्रेरणा और प्रकाश देता है। अत: सूर्य को सविता कहते हैं।’
सविता ‘विश्वारूपाणि’ हैं और ऊषा के बाद प्रकाशित होते हैं। (५.८१.२) यहां सविता और सूर्य एक हैं लेकिन अगले मन्त्र (वही, ४) में दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं, ‘हे सविता देव, आप तीनों लोको में प्रकाशित होते हैं और सूर्य रश्मियों से संयुक्त होते हैं- सूर्यस्य रश्मिभि: समुच्यसि।’ सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती है। सविता देव का मंडल १ सूक्त ३५ में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, ‘सविता देव ‘हिरण्याक्ष’ स्वर्ण आखों- दृष्टिवाले हैं। (वही, ८) उनका रथ भी ‘हिरण्येन’ स्वर्णिम है। (वही, १ व ५) वे ‘हिरण्यपाणि सविता’ हैं। (वही, व १०) उनके हाथ भी सोने के हैं। मंत्र (६.७१.३) में उनकी जीभ ‘हिरण्य जिह्व:’ स्वर्णिम है। हिरण्यगर्भ भी स्वर्णिम है। उनका रूप में भी सूर्य जैसा है। उनसे यह संसार उत्पन्न हुआ है।
सूर्य ही सविता हैं। वे अग्नि रूप भी हैं। एक मंत्र (१.१४१.२) में ‘अग्नि के ३ रूप हैं, प्रथम भौतिक अग्नि, दूसरे मेघों में विद्युत रूप और तीसरे सूर्य हैं।’ दिव्य शक्ति एक है वही विभिन्न नाम रूप धारण करती है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त १६४ के प्रथम मंत्र में ‘सूर्य देव ३ भाई हैं, प्रथम वे स्वयं हैं, उनके ७ पुत्र हैं। दूसरे सर्वव्यापक वायु और तीसरे तेजस्वी अग्नि।’ फिर सूर्य के रथ का वर्णन करते हुए कहते हैं ‘सूर्य के एक चक्रवाले रथ में ७ घोड़े जुड़े हैं। ७ नामों वाला (७ रंग) एक ही घोड़ा रथ को खींचता है। (वही, २) फिर ‘सप्त’-सात शब्द के कई दोहराव हैं ‘सप्त तस्यु, सप्त चक्रं, सप्त वहन्त्यश्वा:, सप्त स्वसारो, सप्तनाम – सात दिन, सात अश्व, सात स्वरों में सविता की स्तुति करती सात बहिनें। (वही, ३) सूर्य प्रकाश में ७ रंग हैं। ध्वनि में ७ सुर हैं। दिन भी ७ हैं। इसके बाद सृष्टि के प्रथम जन्मा पर सुंदर जिज्ञासा है ‘को ददर्श प्रथमं जायमान – प्रथम जन्मा को किसने देखा, जो अस्थिरहित होकर भी संपूर्ण संसार का पोषण करते हैं।’ (वही, ४) सूर्य प्रत्यक्ष हैं, गोचर है, ऋषि इसके पीछे छुपे परमतत्व के प्रति जिज्ञासु है, ‘ये विज्ञ सप्त तंतुओं (किरणों, सुरों, दिवसो) को वैâसे पैâलाते है?’ (वही, ५) ऋषि विद्वानों का आह्वान करते हैं और अपना अज्ञान स्वीकार करते हैं, मैं अज्ञानी हूं लेकिन जानना चाहता हूं। (वही, ६ व ७) ऋषि सृष्टिकर्त्ता का जन्म रहस्य जानना चाहते हैं। जन्म के लिए मां-पिता का मिलन चाहिए। कहते हैं ‘माता ने पिता का सेवन किया। नमनपूर्वक विचार-विमर्श हुआ। माता गर्भ रस से निबद्ध हुई। माता की सामर्थ्यसूर्यदेव की धारक क्षमता पर आधारित है।’ (वही, ७ व ८) फिर कहते हैं ‘सृष्टि का १२ अरों (राशियों) वाला चक्र द्युलोक में घूमता रहता है। यह कभी जीर्ण नहीं होता।’ (वही ११) यहां प्रत्यक्ष भौतिक विज्ञान और काव्य साथ-साथ हैं।
सविता प्रत्यक्ष तेज हैं। सूर्य इस तेज की अभिव्यक्ति हैं और ऊषा सूर्योदय के पूर्व का सौंदर्य। ऋग्वेद के एक सूक्त (१.१२४) में ऊषा की स्तुति पर सुंदर काव्य रचना है। कहते हैं ‘ये ऊषा देवी नियम पालन करती हैं। नियमित रूप से आती हैं और मनुष्यों की आयु को लगातार कम करती हैं।’ (वही मंत्र २) फिर कहते हैं, ‘ऊषा स्वर्ग की कन्या जैसी प्रकाश के वस्त्र धारण करके प्रतिदिन पूरब से वैसे ही आती हैं जैसे विदुषी नारी ऋत-नियम मार्ग से ही चलती है।’ (वही, ३) यहां प्रकाश ही ऊषा का वस्त्र है। आगे कहते हैं, ‘जैसे भद्र नारियां सोए हुए परिजनों को जगाती हैं वैसे ही ऊषा भी सोतों को जगाने के लिए आई हैं।’ (वही ४) ऊषाकाल वैदिक समाज का जागरण काल है। ऊषा आनंदित करती हैं। वे देवी हैं, इसीलिए उनकी स्तुतियां है, ‘वे सबको प्रकाश आनंद देती हैं। अपने पराए का भेद नहीं करतीं, छोटे से दूर नहीं होती, बड़े का त्याग नहीं करती।’ (वही, ६) फिर कहते हैं, ‘ये ऊषा सूर्य रूपी पति से मिलने के लिए मुस्कुराती हुई अपना सौंदर्य प्रकट करती हैं।’ (वही, ७) ऊषा का सौंदर्य अप्रतिम है, ऋषियों का भावबोध भी रसयुक्त है। कहते हैं, ‘जैसे छोटी बहिन बड़ी बहिन के लिए अपना स्थान छोड़ती है वैसे ही रात्रि रूपी छोटी बहिन बड़ी बहिन ऊषा के लिए अपने स्थान से हट जाती है।’ (वही, ८) ऊषा देवी बड़ी बहन है। रात्रि छोटी बहन है। बड़ी बहन ऊषा आती है तो छोटी बहन रात्रि चली जाती है। लेकिन ऊषा समद्रष्टा हैं। भेदभाव नहीं करतीं लेकिन स्तोता उनसे भेदभाव की भी स्तुतियां भी करते हैं ‘हे ऊषा आप कृपण लोभी को न जगाएं। श्रमशील कर्मठों को जगाएं।