एकला चलो रे

तमाम कोशिशों के बावजूद
हम हमारा वजूद
संभालते रह गए
मिट्टी में मिलकर
मिट्टी बन जाने की ख्वाहिश
कल भी थी, आज भी है
और कल भी रहेगी
जब कभी सहारे की जरूरत थी
तब खुद को हरदम बेसहारा पाया
जमाना तेरे लिए
हम दौड़कर चले आए
हमने तो सिर्फ ‘एकला चलो रे’ का
हरदम राग अलापा
हमें वो अधिकार कहां
जमाने की खामियां हम ढूं़ढ़ें
उल्टा जमाना ढूंढ़ रहा था
खामियां हमारी और दिखा रहा आईना
बेमतलब का तमाशा हम बनते रह गए
दुनिया में आए हैं तो
पूरी जिंदगी शानोशौकत से
जी कर ही हम जाएंगे
हम जिल्लत सहते गए
जमाना जख्म देता गया
लेकिन जब हमने किया यलगार
तो मौत भी थर्रा गई
-सौ. स्वरूपारानी उबाले-पाटील, डोंबिवली