" /> एक अलौकिक संत भविष्य दृष्टा और विकासप्रिय

एक अलौकिक संत भविष्य दृष्टा और विकासप्रिय

गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वर जी म .सा. का जन्मदिवस आज

मोहनखेड़ा तीर्थ इंदौर से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा पवित्र स्थल है, एक ऐसा तपोवन है, जहां दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेंद्रसुरीश्वरजी म.सा. की कृपा से ऐसी शीतल बयार बहती है जो भटकते हुए मन को शीतलता और स्थिरता प्रदान करती है। वहां का शुद्ध जल एक ऐसी मिठास लिए हुए है जो आने वाले श्रद्धालुओं के जीवन में मिठास घोल देता है। एक बार गर्भ गृह में जाकर जिसने दादा गुरुदेव के दर्शन कर लिए, समझ लो उसका जीवन धन्य हो गया। ऐसी पुण्य स्थली पर गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वर जी म .सा. के रूप में जैन धर्म ध्वजा वाहक विराजते हैं। आचार्य श्री को लोग पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ बापजी कहते हैं। बापजी हैं भी ऐसी ही हस्ती। यूं उनके बारे में कुछ भी लिखना या बताना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है परंतु मेरे मन के उद्गार बापजी के चरणों में श्रद्धावनत हैं। कई ज्योतिष आए और गए लेकिन बापजी ने एक बार अगर कोई भविष्यवाणी कर दी तो वह शत प्रतिशत ज्योतिष के मापदंड पर खरी उतरती है। इसीलिए तो लोग उन्हें ज्योतिष सम्राट कहते हैं। बापजी ने कई भविष्यवाणियां की हैं। वर्ष २०२० की शुरुआत में ही उन्होंने भविष्यवाणी कर दी थी कि विश्व पर महामारी के रूप में महासंकट आने वाला है। यह लंबे समय तक चलेगा और इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था तथा अन्य सभी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी। दुनिया के लोग संकट में आ जाएंगे। आज कोरोना वायरस संक्रमण से वाकई पूरी दुनिया संकट में है। इसे लंबे समय तक भी चलना है, क्योंकि पिछले ५ माह में भी इस वैश्विक महामारी को खत्म करने वाली वैक्सीन अभी तक नहीं बन पाई है। यही नहीं बल्कि उज्जैन में हुए सिंहस्थ मेले के पूर्व ही बापजी ने भविष्यवाणी कर दी थी कि मेला लगने के दौरान भारी आंधी-तूफान और बारिश होगी। तब भी ऐसा ही हुआ। आंधी-तूफान और बारिश से सिंहस्थ मेले की व्यवस्था तहस-नहस हो गई। तंबू उखड़ गए थे। बापजी की भविष्यवाणियों का यह तो सिर्फ एक उदाहरण मात्र है । वास्तव में बापजी ने अब तक जो – जो भी भविष्यवाणियां की वह सभी धरातल पर शत-प्रतिशत सही निकली। वाकई ऐसे ज्योतिष सम्राट का आज के वक्त धरती पर होना ही दुनिया के लिए सुखद है। ज्योतिष सम्राट बापजी के प्रति श्रद्धा रखने वालों की कमी नहीं है। जैन धर्म के अलावा भी कई अन्य धर्म की कई हस्तियां उनके दर्शन करने मोहनखेड़ा आती रहती हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कांतिलाल भूरिया सहित ऐसे कई आदिवासी तथा अन्य जन नेता हैं जो महाराज साहब से आशीर्वाद लेने जाते हैं। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी भी मोहनखेड़ा तीर्थ में डेरा डालकर बापजी का आशीर्वाद ग्रहण कर चुके हैं। नेताओं के नाम की फेहरिस्त काफी लंबी है। भाजपा-कांग्रेस सहित तमाम पार्टियों के राजनेता मोहनखेड़ा तीर्थ पहुंचकर बापजी का आशीर्वाद लेते हैं। बापजी हैं भी ऐसे ही। उन्हें आदिवासियों से बेहद प्यार है। गरीबों से बेहद लगाव है। वे छोटे-बड़े या गरीब-अमीर में अंतर नहीं करते। सहज, सरल निर्मल स्वभाव के बापजी ने कोरोना संक्रमण के चलते पूरे देश में हुए लॉकडाउन के दौरान अपने क्षेत्र के मोहनखेड़ा तीर्थ के आसपास बसे करीबन १०,००० जरूरतमंदों को प्रतिदिन भोजन तथा उनकी अन्य व्यवस्थाएं करवाई। बापजी अद्भुत हैं। ऐसा लगता है जैसे वे कोई महान पुरुष हैं, जो धरती पर जनकल्याण और धर्म ध्वजा फहराने आए हैं। श्रद्धालु अपनी कलाई में उनके हाथों से रक्षा पोटली बंधवाने के लिए लालायित रहते हैं। बापजी जब किसी के हाथ में रक्षा पोटली बांधते हैं और श्रद्धालु के सिर में वाक्षेप डालकर आशीष देते हैं तो इस शुभ अवसर को पाने वाला व्यक्ति अपने आप को धन्य समझता है। यही वजह है कि बापजी का चौमासा करवाने के लिए शहर – शहर और अलग-अलग क्षेत्रों के लोग पूरे साल इस कोशिश में लगे रहते हैं कि बापजी उनके शहर या क्षेत्र में कृपा कर चौमासा में प्रवचन करें। धन्य है वह पिता और धन्य है वह माता जिन्होंने ऐसे तपस्वी पुत्र को जन्म दिया। धन्य हैं वह गुरु जिनकी दीक्षा से बापजी जैसे महामानव का उदय हुआ।
ज्येष्ठ सुदी ७, संवत २०१४ दिनांक ४ जून १९५७ वह शुभ घड़ी थी जब श्रीमती रत्नावती (संयम में – तपस्वीरत्ना पूज्य सुसाध्वी श्री पीयूषलता श्रीजी म. सा.) ने सियाणा (राजस्थान) में एक सुंदर से पुत्र को जन्म दिया। पिता शा. श्रीमान मगराजजी (गोत्र थुरगोता काश्यप प्राग्वाट ‘पोरवाल’) की गोद में खेलने वाले इस बच्चे का ग्रहस्थ नाम मोहन कुमार रखा गया। मगराजजी का पूरा परिवार ही धर्म ध्वजा फहराने वाला साबित हुआ। उनके भाई नथमल (संयम में- प. पू. आचार्य देवेश श्री रवींद्रसूरीश्वरजी म. सा.) और जीवी बहन के साथ मोहन कुमार का बाल्यकाल बीता। कहते हैं पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। बड़े भाई नथमल और मोहन कुमार दोनों में बचपन से ही धर्म के प्रति विशेष रुचि रही। दोनों ही ज्ञान के अपार भंडार। यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि ऋषभचंद्र सुरीश्वरजी म.सा.का ४ जून १९५७ को जन्म हुआ और २३ जून १९८० को २३ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने दीक्षा ली।
आचार्य श्री ने द्वितीय ज्येष्ठ सुदी १० दिनांक २३ जून १९८० को श्री मोहनखेड़ा तीर्थ में दीक्षा ली। उनके गुरु प.पू . श्री मोहनखेड़ा तीर्थोधारक कवि रत्न आचार्य प्रवर श्रीमदविजय विद्याचंद्र सूरीश्वर जी म .सा. पथिक ने उन्हें दीक्षा दी। आचार्य श्री के पास न भक्तों की कमी है और न ही शिष्यों की। उनकी शिष्य संपदा में मुनिराज श्री पीयूषचंद्र विजय जी म. सा., मुनिराज श्री रजतचंद्र विजयजी म. सा., मुनिराज श्री जिनचंद्रविजयजी म. सा., मुनिराज श्री जीतचंद्र विजयजी म. सा., मुनिराज श्री जनकचंद्र विजयजी म.सा. जैसे मुनि शामिल हैं ।
आचार्य ज्ञान का भंडार हैं । उन्होंने ऐसी विधाओं में ज्ञान प्राप्त किया है जो सामान्य मानव ही नहीं बल्कि कई महामानव के लिए भी दुर्लभ होता है। व्याकरण, न्याय, आगम, प्रवचन, वास्तु, ज्योतिष, मंत्र शास्त्र, उपासना, आयुर्वेद, शिल्प, ध्यान, योग साधना, अध्यात्म, चिंतन आदि ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो आचार्य श्री के ज्ञान भंडार के विशाल और महान अंग हैं।
बापजी के ज्ञान भंडार का प्रताप ही है कि उन्होंने ४० से अधिक पुस्तकों की रचना की है। अध्यात्म का समाधान (तत्वज्ञान), धर्मपुत्र (दादा गुरुदेव का जीवन दर्शन), पुण्य पुरुष, सफलता के सूत्र (प्रवचन ), सुनयना, बोलती शिलाएं, कहानी किस्मत की, देवताओं के देश में, चुभन, (उपन्यास) सोचकर जीओ, अध्यात्म, नीति वचन (निबंध) आदि उनकी मुख्य रचनाएं हैं। महान प्रभावी श्री राजेंद्र सूरि गुरुपद महा पूजन भी आपकी ही रचना है। आध्यात्मिक, मौलिक चिंतन एवं जिन भक्ति, मंदिर विधि क्रम की पुस्तकों की रचना भी बापजी ने हीं की। इसके अलावा प्रतिवर्ष श्री गुरु सप्तमी पंचांग भी प्रकाशित होता है।
बापजी के प्रिय कार्य क्षेत्र मानव सेवा, जीवदया, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, ज्योतिष व मंत्र विज्ञान है।
बहुत ही कम समय में बापजी ने समाज में ऐसे – ऐसे योगदान दिए, जिसकी आज के समय में कल्पना भी नहीं की जा सकती। श्री मोहनखेड़ा तीर्थ में नेत्र दिव्यंगता, नशा मुक्ति, कटे हुए (कुरूप) होठों , कुष्ठ, मंदबुद्धि निवारण आदि चिकित्सा शिविरों का आयोजन आपके निर्देशन एवं निश्रा में पूर्ण किए गए। श्री मोहनखेड़ा तीर्थ विकास के लिए पूज्य गुरुवर आचार्य प्रवर श्रीमद विजय विद्याचंद्रसुरीश्वरजी म. सा. के जो सपने मुख्यतः हॉस्पिटल, गौशाला, गुरुकुल आदि के थे, वे गुरुकृपा से पूर्ण कर सच्चे गुरु के सच्चे शिष्य बनने का गौरव हासिल किया। साथ ही गुरु की दिव्य कृपा तथा आशीर्वाद से श्री मोहनखेड़ा तीर्थ को विकास पथ पर आगे बढ़ाया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न कार्य आशीष स्वरूप किए गए। राजगढ़ मोहनखेड़ा नाके पर श्री शत्रुंजय तीर्थ अनुरूप जय तलेटी निर्माण की प्रेरणा, श्री महावीर पवित्र सरोवर (तालाब), जिसकी लागत ५ करोड़ से ज्यादा है। जो आपकी प्रेरणा और प्रयास से निर्मित हुआ। दादा गुरुदेव श्रीमदविजय राजेंद्रसुरीश्वरजी म. सा. के शताब्दी महोत्सव के मद्देनजर मुख्य मंदिर को स्वर्णमय बनाने की परिकल्पना तथा प्रेरणा शताब्दी महोत्सव के लिए विशाल इतिहास की पुनः रचना करने वाला अलौकिक अनुपम सौंदर्य से युक्त भव्य कलाकृति से मंडित जैन संस्कृति पार्क की रचना में आपका योगदान है। आप तीर्थ विकास एवं तीर्थ रक्षा के सूत्रधार के रूप में भी अपना सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
आपकी धर्म प्रभावना आज के वक्त में अलौकिक है। बापजी ने श्री शत्रुंजय तीर्थ (पालीताणा) को होली सिटी (पवित्र शहर) १९९० में घोषित करवाया। सम्मेत शिखरजी तीर्थ रक्षा के लिए १५ आचार्यों के सम्मेलन का विशाल आयोजन कर अभूतपूर्व योगदान १९९४ में पालीताणा में दिया। गुरु राजेंद्र विद्याधाम तीर्थ सरोड (पालीताणा) में ३००० पशुओं का एवं मोहनखेड़ा में विशाल कैंप लगाया। श्री जय तलेटी पर कार सेवा कर तीर्थ शुद्धि अभियान पालीताणा में १९९४ – १९९५ में किया। भारत में जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने में विशेष योगदान प्रदान किया। बाबा नवसारी, सरोड ( पालीताणा ), इंदौर, राऊ, खारवां कला, राजगढ़ – शांतिनाथ मंदिर में गुरु मंदिर, ७२ जिनालय भीनमाल, पालीताणा, जावरा, रतलाम, बड़ौदा, नीमच, बागरा, झाब, सुमेरपुर प्रतिष्ठा आदि के भव्य आयोजन आपकी प्रेरणा – मार्गदर्शन तथा निश्रा में संपन्न हुए। इंदौर, पुणे, झाबुआ , श्री मोहनखेड़ा तीर्थ, जावरा , खाचरोद आदि शहरों में भव्य महा मांगलिक का आयोजन किया गया, जिसमें १०- १० हजार श्रद्धालुओं ने लाभ लिया। ये तो सिर्फ एक उदाहरण भर हैं और भी अनेक विशेषत: गौशाला, पाठशाला, गुरुकुल, जिनमंदिर, गुरुमंदिर आदि के कार्य आपकी प्रेरणा व निश्रा में निरंतर चल रहे हैं।