एक खुद्दार गजल गायक थे राजेंद्र मेहता

डॉ. बशीर बद्र का एक मशहूर शेर है कि-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो!
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए!
कुछ ऐसा ही हो रहा है इस काल चक्र में। कब किसका नंबर आएगा पता नहीं। अभी इसी नवंबर महीने की पिछली १३ तारीख को मशहूर गजल गायक राजेंद्र मेहता का चौरासी साल की उम्र में निधन हो गया। उनकी पत्नी नीना मेहता का चार साल पहले ही निधन हो गया था जबकि बिटिया मीरा इन दोनों से काफी पहले तैंतालीस साल की उम्र में दिवंगत हो गर्इं थी। फिलहाल इनके सुपुत्र नीरज संगीतकार हैं और दुबई में रहते हैं। गौरतलब है कि राजेंद्र मेहता-नीना मेहता गजल गायकी की दुनिया की मशहूर जोड़ी रही है। वैसे तो इस जोड़ी को ज्यादातर पैâज अहमद फैज की गजलों को गाने के लिए जाना जाता है लेकिन इनका गाया सबसे लोकप्रिय नगमा रहा-
जब आंचल रात का लहराए
जब सारा आलम सो जाए
तुम मुझसे मिलने शम्मां जलाकर
ताजमहल में आ जाना ..!!
प्रेम वारबर्टोनी की लिखी इस रचना की धुन बनाई थी गोविंद प्रसाद जयपुरवाले ने। वैसे यह गैरफिल्मी नगमा था जिसे राजेंद्र मेहता ने फिल्म निर्मात्री सती शौरी के अनुरोध पर फिल्म ‘यहां-वहां’ के लिए उन्हें दे दिया था।
राजेंद्र मेहता का जन्म अखंड भारत के लाहौर में हुआ था। गुजरांवाला के काकोमी मंडी में इनके परिवार का ‘इंडिया टी कंपनी’ नाम से व्यापार था। उन दिनों काकोमी चावल की बहुत बड़ी मंडी हुआ करती थी। भारत विभाजन के बाद इनके पिता बलदेवराज मेहता (मां-सत्यवती देवी) उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद चले आए और ‘राजसन टी कंपनी’ के नाम से व्यापार शुरू किया।
राजेंद्र मेहता की शिक्षा-दीक्षा नजीबाबाद के पास कोटद्वार और लखनऊ में हुई। बकौल राजेंद्र मेहता साल उन्नीस सौ साठ में वह मुंबई आ गए और वेटर के रूप में काम करते हुए भी संगीत की दुनिया में अपनी कोशिशें जारी रखीं। इन्हीं दिनों रेडियो में संगीतकार जमाल सेन (संगीतकार दिलीप सेन के पिता) के निर्देशन में बन रही एक संगीत नाटिका- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ की रिहर्सल के दौरान नीना शाह से मुलाकात हुई और आगे की एक दो मुलाकातों में सारी उम्र साथ-साथ रहने का पैâसला हो गया। देखते ही देखते गजल की दुनिया में राजेंद्र मेहता-नीना मेहता की गूंज पैâल गई। उन्होंने अपने वैâरियर में सिर्फ गजलें ही नहीं, कई भजन भी गाए। जिनमें कबीरदास की रचना- मन मस्त हुआ तब क्यों बोलें…! काफी लोकप्रिय है।
राजेंद्र मेहता से मिलना किसी अनुभव के खजाने में कदम रखने से कम नहीं था। उस पर उनकी बेबाकी, पारदर्शिता, खुद्दारी और सच्चाई किसी को भी अपना कायल बना सकती थी। मसलन, जब वह मुंबई आए तो उन दिनों उनके एक मामा मित्तर बेदी एक मशहूर फोटोग्राफर हुआ करते थे जो कि राजेंद्र मेहता के ऊपर वेटर की नौकरी को लेकर खासा नाराज रहते थे। लेकिन राजेंद्र मेहता ने वेटर की नौकरी छोड़ने से यह कहकर मनाकर दिया कि मुझे खुद के दम पर कुछ करना है। उनकी यह खुद्दारी ताउम्र कायम रही।
आपको बताता चलूं कि राजेंद्र मेहता, कल्याणजी आनंदजी और भारतरत्न लता मंगेशकर यह सभी मुंबई में जसलोक अस्पताल के पास पैडर रोड के ही निवासी यानी पड़ोसी रहे हैं।
श्री मेहता के अनुसार- ‘एक बार कल्याणजी-आनंदजी ने एक गाने की रिहर्सल तो मेरी आवाज में की लेकिन रिकॉर्ड मुकेश की आवाज में कर लिया।’ ऐसा कहने के पीछे उनका इशारा मतलबपरस्ती से था। चूंकि मुझे राजेंद्र मेहता समेत लता दीदी और आनंदजी (कल्याणजी-आनंदजी) से भी साक्षात्कार लेने का मौका मिल चुका है तो, हमने यह बात आनंदजी से पूछी भी जिसको वह हंसकर यह कहते हुए टाल गए कि यह राजेंद्र जी का भरम (भ्रम) है और कोई बात नहीं। बहरहाल, सच्चाई कुछ भी हो लेकिन दो वाकया जगजीत सिंह के बारे में राजेंद्र मेहता बहुत बताते थे। उनके अनुसार मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह उनसे आठ साल छोटे थे। जब राजेंद्र मेहता ने जगजीत सिंह को ‘सुर सिंगार संसद’ में गाने का मौका दिलाने के लिए स्वर्गीय संगीतदास ब्रजनारायण से मिलवाया तो, उन्होंने कहा कि ऊपर पगड़ी नीचे दाढ़ी और गजल गाओगे! दूसरे दिन जगजीत एकदम ‘क्लीन शेव’, होकर आ गए। जगजीत के बारे में एक और बात बताते हुए वह कहते थे कि एक बार एक ज्योतिषी ने जगजीत को कहा कि २६, ५२, ७० यानी २६ साल की उम्र में सफलता, ५२ की उम्र में झटका (बेटे की मृत्यु हुई) और ७० कि उम्र में मृत्यु। यह सारी बातें आगे चलकर सिद्ध हुर्इं। गीत-संगीत के शौकीन मुंबई के कई प्रभावशाली नौकरशाह राजेंद्र मेहता के निवास पर उनसे मिलने-जुलने और उनकी घरेलू महफिल में शिरकत करने आते रहते थे, जिनसे कई बार कई जरूरत मंदों के काम भी बन जाते थे जो कि शायद, किसी नेता के लिए भी आसान न होते। वह जगजीत की कम्पोजिशन प्रतिभा के बहुत बड़े प्रशंसक थे। कुल मिलाकर राजेंद्र मेहता एक जिंदादिल, नेक इंसान और सहयोगी प्रकृति सच्चे कलाकार थे जो दूसरे कलाकार की तारीफ करने में कंजूसी नहीं रखते थे।
उनसे मिलकर जितना अच्छा लगता था, अब उनसे बिछड़कर उतना ही दु:ख लगता है। लेकिन मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है- मृत्यु जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।
मैंने उनके संगीत सफर और जीवनभर के अनुभवों के बारे में उनसे पूछा था तो उन्होंने कहा था कि- ‘दो-चार गजलें गाकर कोई तानसेन नहीं हो जाता। एक से एक बड़े साधक हुए हसीन भारत में।’ साथ ही गुलजार का एक शेर वह अक्सर कहते थे कि-
आदतन तुमने कर दिए वादे
आदतन हमने एतबार किया
तुमने तो दिल पे इख्तियार किया
हमसे होता नहीं हजार किया।