एक ‘पगड़ी’ राजनीति

राष्ट्रवादी के स्थापना समारोह में शरद पवार ने अपने दिल की बात कही। दिल की बात कहने के लिए उन्होंने जो विषय चुना, वह भीमा-कोरेगांव दंगे का था। इस मामले से जिनका संबंध नहीं है उन पर सरकार कार्रवाई कर रही है, ऐसा विचार पवार ने व्यक्त किया है। भीमा-कोरेगांव मामला निश्चित तौर पर किसने किया? यह सभी को पता होने की बात भी उन्होंने कही। भीमा-कोरेगांव दंगे से महाराष्ट्र झुलस उठा था। दलित संगठनों द्वारा चारों ओर आगजनी करने के बावजूद महाराष्ट्र के अन्य वर्गों ने संयम रखा, यह बात कई लोगों को खराब लगी। सांप्रदायिक नेताओं के उकसाने के बावजूद जनता ने शांति बनाए रखी, इसे ही महाराष्ट्रीयता कहना पड़ेगा। राहुल फटांगडे नामक युवक की हत्या हुई और उसके आरोपी भी पकड़े गए हैं। थोड़ा समय लगा पर पुलिस ने काम कर दिया। दंगे के पीछे शहरी नक्सलवाद तो था ही और उसके सुराग हाथ लगे हैं। मोदी की हत्या की साजिश का सुराग इसी जांच में लगा पर उस पर बोलना उचित नहीं। दंगे के जो सूत्रधार पकड़े गए हैं, उनका दंगे से कोई संबंध नहीं है, ऐसे लोग पकड़े गए हैं। पवार ऐसा कहते हैं तो किस आधार पर? श्री शरद पवार, प्रकाश आंबेडकर आदि नेताओं ने जांच की दिशा को भटकाने का बीड़ा ही उठा रखा है क्या? पुलिस के काम में बाधा डालना और जांच पर आशंका व्यक्त करना, यह राज्य के मुख्यमंत्री पद पर तीन-चार बार विराजमान होनेवाले पवार जैसे नेता को शोभा नहीं देता। पुलिस ने गलत लोगों को पकड़ा है, ऐसा कहकर पवार किसको बचाने की कोशिश कर रहे हैं? भीमा-कोरेगांव मामले में महाराष्ट्र जब जल रहा था उस समय श्री पवार ने ‘कैमरे’ के सामने आकर शांति रखने का आह्वान नहीं किया बल्कि दंगे के पीछे हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ होने का बयान देकर भ्रम पैदा किया। पवार से जनता को ऐसी उम्मीद थी कि उन्हें सड़क पर उतरकर दंगाइयों को शांत करवाना चाहिए था। मुंबई में हुए भीषण शृंखलाबद्ध बम विस्फोट के बाद मुख्यमंत्री रहे पवार दूसरे दिन शेयर बाजार में गए और ‘बाजार’ शुरू किया लेकिन दंगे के बाद उन्होंने महाराष्ट्र को व्यवस्थित करने की कोशिश नहीं की और राज्य जलने दिया। ‘जाणता राजा’ (जानकार राजा) के रूप में पवार यह सब-कुछ रोक सकते थे। पवार क्या करें यह उनका सवाल है पर उनकी राजनीति महाराष्ट्र के सामाजिक सौहार्द को अस्थिर कर रही है। फुले, आंबेडकर, शाहू के महाराष्ट्र में जातिगत राजनीति जिस तरीके से ‘तीखी’ लगी है, उस तीखे रसेदार की हड्डियों को राजनीतिक नेता चबाते हुए दिखाई दे रहे हैं इसलिए महाराष्ट्र विभाजित हुए बिना नहीं रहेगा। राष्ट्रवादी के पुणे समारोह में क्रांतिवीर छगन भुजबल ने सिर पर महात्मा फुले की पगड़ी पहनी थी जबकि शरद पवार के सिर पर पुणेरी पगड़ी पहनाने की कोशिश की गई तो उन्होंने साफ नकार दिया। यह ‘पगड़ी’ नाट्य पहले से ही तय कर एक विशेष समाज को संदेश देने के लिए ही किया गया। पुणेरी पगड़ी धारण कर लोकमान्य तिलक ने देश भर ख्याति अर्जित की। तिलक सिर्फ ब्राह्मण नहीं थे बल्कि भारतीय असंतोष के जनक और तेली-तंबोलियों के नेता थे। बहुजन समाज में स्वतंत्रता की प्रेरणा निर्माण करने का कार्य उन्होंने किया। इतना ही नहीं बल्कि छत्रपति शिवाजी राजे को स्वतंत्रता आंदोलन का ‘नायक’ बनाकर शिवजयंती उत्सव शुरू किया। जाति के खिलाफ लड़नेवाले और स्वतंत्रता की बजाय सामाजिक सुधार पहले, ऐसा कहनेवाले आगरकर के सिर पर भी यही पगड़ी थी। न्याय. गोखले, चिपलूणकर भी ‘पगड़ी’ बहादुर थे। इस पगड़ी को नकार देकर श्री पवार ने क्या हासिल किया? भटशाही के खिलाफ प्रबोधनकार ठाकरे ने भी आंदोलन शुरू किया लेकिन उन्होंने ‘ब्राह्मण’ के रूप में अन्य जातियों से द्वेष नहीं किया। पेशवा के न्यायमूर्ति रामशास्त्री प्रभुणे ब्राह्मण थे और वे मर्द थे। पवार ने ‘पगड़ी’ नकार कर समाज में छिद्र निर्माण किया। वैसे तो पवार को सम्मान का ‘फेटा’ भी बांधा जा सकता था। ऐसा न करते हुए आयोजकों ने ‘पगड़ी’ पहनाने की कोशिश की क्योंकि पटकथा के प्रसंगानुसार ‘पगड़ी’ नकार कर पुणे-पश्चिम महाराष्ट्र के मतदाताओं को उन्हें संदेश देना था। पवार ने संदेश दिया। इसलिए पवार का नेतृत्व बौना साबित हुआ है। छत्रपति शिवाजी महाराज, यशवंतराव चव्हाण के ऐसे व्यवहार के उदाहरण नहीं मिलते। शरद पवार का संयम टूट गया है या उनका आत्मविश्वास डगमगा गया है। भीमा-कोरेगांव दंगे के बाद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी को नई जाति का सुर पकड़ में आया है। महाराष्ट्र की जनता को सावधान रहना होगा। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर, कैराना के धार्मिक दंगों ने वोटों का धार्मिक ध्रुवीकरण किया। महाराष्ट्र में जातिगत धु्रवीकरण करने की कोशिश जारी है। शरद पवार ने अब जो एक ‘पगड़ी’ राजनीति शुरू की है वह महाराष्ट्र के लिए घातक है, इतना हम निश्चित तौर पर कह सकते हैं।