एपोफिस मचाएगा आफत! २०३६ में महाप्रलय, नासा का संकेत

धरती पर महाप्रलय की भविष्यवाणी काफी समय से वैज्ञानिक करते रहे हैं। ऐसा ही एक संकेत अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने दिया है। इस संकेत के मुताबिक १८ वर्ष बाद यानी वर्ष २०३६ के अप्रैल में धरती महफूज नहीं रहेगी। वैज्ञानिकों ने दूरबीनों और कंप्यूटरों से जुटाए गए डाटा के आधार पर आकलन किया है कि एक विशाल उल्का पिंड धरती से टकरा सकता है। एपोफिस नामक इस उल्का पिंड की खोज वैज्ञानिकों ने वर्ष २००४ में की थी, तभी से वैज्ञानिक इस पर अपनी रिसर्च कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि २५० मीटर आकारवाला उल्का पिंड १३ अप्रैल २०२९ को पृथ्वी से केवल ३६ हजार किलोमीटर की दूरी से गुजरेगा। उस समय अगर यह धरती से नहीं टकराया तो दोबारा सात वर्ष बाद लौटकर यानी २०३६ में इसके टकराने की प्रबल संभावना नासा ने जताई है। एपोफिस उल्का पिंड इतना शक्तिशाली है कि अगर यह धरती से टकराया तो उसकी विस्फोटक शक्ति हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से भी दस लाख गुना अधिक होगी। इससे धरती पर तबाही मचेगी और जीव-जंतुओं की प्रजातियों का पृथ्वी पर से पूरी तरह से अंत हो जाएगा। यह महाप्रलय ऐसा होगा, जैसे साढ़े छह करोड़ साल पहले हुआ था, जब एक प्रलयकारी पिंड पृथ्वी से टकराया था और उस समय इस टक्कर से डायनासोर जैसी प्रसिद्ध प्रजाति लुप्त हो गई थी।
आफत से बचने के लिए नासा जुटी

धरती को तबाह करनेवाले उल्का पिंड एपोफिस से बचने की तैयारी में अभी से ही अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा जुट गई है। इस प्रलय को टालने के लिए नासा अन्य देशों के अंतरिक्ष संगठनों का सहयोग पाने के लिए प्रयासरत है।
बता दें कि वर्ष २००४ में खोजा गया एपोफिस नामक उल्का पिंड २०३६ में धरती पर आफत ढा सकता है। इसके टकराने से धरती का विनाश होने की भविष्यवाणी नासा के वैज्ञानिकों ने की है। इस महाप्रलय से बचने के लिए नासा सहित विभिन्न देशों के वैज्ञानिक इस पर जुट गए हैं। एपोफिस जैसे २० लाख से अधिक उल्का पिंड हैं, जिससे कहीं न कहीं तो धरती को खतरा बना हुआ है। इन उल्का पिंडों की धरती से होनेवाली टक्कर को टालने की परियोजना पर काम भी हो रहा है। खगौल भौतिकी के हारवर्ड स्मिथ सोनियन सेंटर के डॉ. अर्विंग शापिरा का कहना है कि पृथ्वी को अतीत में कई बार इस तरह के पिंडों के साथ टक्कर झेलनी पड़ी है। वैज्ञानिक माइकल खान की मानें तो किसी पिंड को उसके रास्ते से विचलित करने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि उसकी भीतरी बनावट कैसी है, जिसके लिए उसके पास पहुंचना जरूरी होगा। इन अध्ययनों के बाद प्रेक्षक यान के माध्यम से उसकी परिक्रमा पथ (दिशा) बदलने का प्रयास किया जा सकता है।