ऐप से आतंक!

‘अल्फा-३’ से कंट्रोल हो रहा था पुलवामा का हमलावर
वाईएसएमएस के जरिए मिल रहा था बालाकोट से आदेश
अंतरराष्ट्रीय एजेंसी से एनआईए ने कराया मैसेज डिकोट

पाकिस्तान की आतंकी पैâक्ट्री से हिंदुस्थान में आतंक पैâलानेवाले आतंकवादी, सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए नित नए-नए हथकंडे अपनाते रहते हैं। खुफिया एजेंसियां ट्रांसमीटर या फोन के संदेश पकड़ लेती हैं। इससे बचने के लिए आतंकियों ने सैटेलाइट फोन तक का इस्तेमाल किया पर इससे भी उनका लोकेशन पता चल जाता था। व्हॉट्सऐप से भी लोकेशन का पता चल जाता है इसलिए आतंकी अब ऐप ‘वाईएसएमएस’ से आतंक फैला रहे हैं। यह ऐप ‘डार्क वेब’ पर मिलता है। इसके इस्तेमाल के लिए फोन में सिम कार्ड की जरूरत नहीं होती। यह रेडियो फ्रीक्वेंसी पर काम करता है। पता चला है कि पुलवामा में हुए आतंकी हमले में संदेशों का सारा आदान-प्रदान इस आतंकी ऐप के जरिए हुआ था।

खुफिया एजेंसियों के हवाले से आई कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस ‘वाईएसएमएस’ ऐप का इस्तेमाल अल-कायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन भी करते आए हैं। पुलवामा हमले के लिए बालाकोट स्थित ‘जैश-ए-मोहम्मद’ के ठिकाने पर एक कंट्रोल रूम बनाया गया था जिसे ‘अल्फा-३’ का नाम दिया गया था। इस ‘अल्फा-३’ कंट्रोल रूम से इस आतंकी ऐप के जरिए ही पुलवामा के हमलावर आदिल अहमद डार से संपर्क बना हुआ था और उसे गाइड किया जा रहा था। अब खुफिया एजेंसियों ने इस आतंकी ऐप की बातचीत को पकड़ा है और इसे अंतर्राष्ट्रीय जांच एजेंसी से डिकोड कराया है जिससे अल्फा-३ और पुलवामा के कनेक्शन का खुलासा हुआ है। इस बातचीत में पाकिस्तान में बैठे जैश के आकाओं के खिलाफ पक्के सबूत होने की बात कही जा रही है।

पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला करनेवाले आतंकी आदिल डार और इस साजिश में शामिल अन्य आतंकी हमले से पूर्व आपस में एक आतंकी ऐप ‘वाइएसएमएस’ के जरिए लगातार संपर्क में थे। हमले के बाद हमारे मिराज २००० ने बालाकोट में जैश के जिस आतंकी कैंप को उड़ाया है, वहीं पर ‘अल्फा-थ्री’ कंट्रोल रूम था। अल्फा-थ्री में बैठे जैश के आतंकी ही पुलवामा हमले की साजिश को तैयार करने से लेकर उसे अमलीजामा पहनाने तक कश्मीर में अपने आतंकियों को लगातार निर्देश दे रहे थे। माना जा रहा है कि भारत सरकार अब यूएन से लेकर सभी प्रमुख देशों के सामने यह सबूत रखनेवाली है ताकि पाकिस्तान की इस हमले में संलिप्तता प्रमाणित हो जाए और दुनिया के सामने वह एक्सपोज हो जाए। यूएन में जैश सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की कोशिश में यह प्रमुख सबूत बननेवाला है। हालांकि चीन का रवैया अभी भी टाल-मटोलवाला बना हुआ है।

मिल रही खबरों के अनुसार गत रविवार को त्राल में मारा गया आतंकी मुदस्सर भी इस आतंकी ऐप का इस्तेमाल कर रहा था। पुलवामा हमले के चंद दिनों बाद मारा गया पाकिस्तानी जैश कमांडर कामरान और गाजी रशीद ये दोनों भी इसी ऐप का इस्तेमाल कर रहे थे। मुदस्सर और गाजी के ठिकानों से मिले मोबाइल फोन व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से भी पता चला है कि ये सभी आतंकी इस ऐप का ही इस्तेमाल कर रहे थे। इसके जरिए सिर्फ लिखा हुआ संदेश ही भेजा जा सकता है और यह पकड़ा नहीं जा सकता। यह सिर्फ उसी व्यक्ति तक पहुंचता है जिसके लिए यह हो। इसके लिए एक स्मार्ट फोन चाहिए, जिस पर यह ऐप डाउनलोड किया जाता है। इसके बाद एक वाईफाई की सुविधा वाला रेडियो सेट चाहिए, जो स्मार्ट फोन के साथ जुड़े। फोन में सिमकार्ड के बिना ही रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करते हुए संदेश भेजा जा सकता है। इसके जरिए भेजा गया संदेश अगर किसी के हाथ लग भी जाए तो उसे डिकोड नहीं किया जा सकता।

‘डार्क वेब’ पर उपलब्ध
आतंकी ऐप ‘वाईएसएमएस’ और इस जैसे अन्य ऐप और संबंधित तकनीक वर्ष २०१२ से डार्क वेब पर उपलब्ध है। अल-कायदा इसका इस्तेमाल वर्ष २००७ से कर रहा है। जम्मू -कश्मीर में पहली बार इसका खुलासा वर्ष २०१५ में पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकी सज्जाद अहमद से मिले मोबाइल फोन से हुआ था लेकिन उसके कोड को डिकोड नहीं किया जा सका था। लश्कर और जैश के कई आतंकी इस ऐप का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में कर रहे हैं। वह अक्सर मुठभेड़ में फंसने पर इस ऐप व तकनीक से लैस मोबाइल फोन को नष्ट कर देते हैं ताकि कोई सुराग न बचे।

पुलवामा का सुराग
पुलवामा हमले की जांच के दौरान ‘वाईएसएमएस’ पर जैश आतंकियों द्वारा भेजे गए संदेश पकड़े गए हैं। उनमें से अधिकांश को डिकोड किया जा चुका है। जो कुछ संदेश डिकोड किए गए हैं, उनमें से एक में जैश के आतंकियों के जनाजे का जिक्र है और एक अन्य में पुलवामा हमले का जिक्र करते हुए लिखा गया है, बड़ी संख्या में भारतीय फौजी मारे गए हैं, उनकी कई गाड़ियां तबाह हुई हैं।