ऐसे एकदंत बनें गणेश

भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू हुआ गणेशोत्सव महापर्व खत्म होने को है। कल अनंत चर्दुशी को बाप्पा विदा हो जाएंगे। यह दिन गणपति जी को समर्पित होता है और इस दिन गणेश जी की पूजा की जाती है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि गणेश जी को एकदंत के नाम से भी जान जाता है क्योंकि उनका एक दांत टूट गया था। लेकिन गणेश जी का दांत टूटने के पीछे भी एक वजह थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखने के लिए बैठे तो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उनके मुख से निकले हुए महाभारत की कहानी को लिखे। इस कार्य के लिए उन्होंने श्री गणेश जी को चुना। गणेश जी भी इस बात के लिए मान गए पर उनकी एक शर्त थी कि पूरा महाभारत लेखन को एक पल के लिए भी बिना रुके पूरा करना होगा। गणेश जी बोले -अगर आप एक बार भी रुकेंगे तो मैं लिखना बंद कर दूंगा।
महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी की इस शर्त को मान ली लेकिन वेदव्यास ने गणेश जी के सामने भी एक शर्त रखी और कहा, गणेश आप जो भी लिखेंगे समझ कर ही लिखेंगे। गणेश जी भी उनकी शर्त मान गए। दोनों महाभारत के महाकाव्य को लिखने के लिए बैठ गए। वेदव्यास जी महाकाव्य को अपने मुंह से बोलने लगे और गणेश जी समझ-समझ कर जल्दी-जल्दी लिखने लगे। कुछ देर लिखने के बाद अचानक से गणेश जी का कलम टूट गया। कलम महर्षि के बोलने की तेजी को संभाल न सका। गणेश जी समझ गए की उन्हें थोड़ा गर्व हो गया था और उन्होंने महर्षि की शक्ति और ज्ञान को न समझा। उसके बाद उन्होंने धीरे से अपने एक दांत को तोड़ दिया और स्याही में डूबा कर दोबारा महाभारत की कथा लिखने लगे। जब भी वेदव्यास को थकान महसूस होती वे एक मुश्किल सा छंद बोलते, जिसको समझने और लिखने के लिए गणेश जी को ज्यादा समय लग जाता था और महर्षि को आराम करने का समय भी मिल जाता था। महर्षि वेदव्यास जी और गणेश जी को महाभारत लिखने में ३ वर्ष लग गए। वैसे तो कहा जाता है महाभारत के कुछ छंद गुम हो गए हैं परंतु आज भी इस कविता में १००००० छंद हैं।
गणेश जी के विसर्जन की कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार श्री वेद व्यास ने गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार १० दिन तक सुनाई थी, जिसे श्री गणेश जी ने अक्षरश: लिखा था। १० दिन बाद जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि १० दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत बढ़ गया है। तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के सरोवर में ले जाकर ठंडे पानी से स्नान कराया था। इसलिए गणेश स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है। इसी कथा में यह भी वर्णित है कि श्री गणपति जी के शरीर का तापमान न बढ़े इसलिए वेद व्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित सौंधी माटी का लेप किया। यह लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई। माटी झरने भी लगी। तब उन्हें शीतल सरोवर में ले जाकर पानी में उतारा। इस बीच वेदव्यास जी ने १० दिनों तक श्री गणेश को मनपसंद आहार अर्पित किए तभी से प्रतीकात्मक रूप से श्री गणेश प्रतिमा का स्थापन और विसर्जन किया जाता है और १० दिनों तक उन्हें सुस्वादु आहार चढ़ाने की भी प्रथा है।
दूसरी मान्यता के अनुसार
मान्‍यता है कि गणपति उत्‍सव के दौरान लोग अपनी जिस इच्‍छा की पूर्ति करना चाहते हैं, वे भगवान गणपति के कानों में कह देते हैं। गणेश स्‍थापना के बाद से १० दिनों तक भगवान गणपति लोगों की इच्‍छाएं सुन-सुनकर इतना गर्म हो जाते हैं कि चतुर्दशी को बहते जल में विसर्जित कर उन्‍हें शीतल किया जाता है। गणपति बप्‍पा से जुड़े मोरया नाम के पीछे गण‍पति जी का मयूरेश्‍वर स्‍वरूप माना जाता है। गणेश-पुराण के अनुसार सिंधु नामक दानव के अत्‍याचार से बचने के लिए देवगणों ने गणपति जी का आह्वान किया। सिंधु का संहार करने के लिए गणेश जी ने मयूर को वाहन चुना और छह भुजाओं का अवतार धारण किया। इस अवतार की पूजा भक्‍त गणपति बप्‍पा मोरया के जयकारे के साथ करते हैं।

विदा होंगे बाप्पा, अनंत चतुर्दशी आज
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी व्रत किया जाता है। यह व्रत इस वर्ष १२ सितंबर (गुरुवार) को पड़ रहा है। इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है, जिससे भक्तों के सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। अनंत चतुर्दशी को विघ्नहर्ता श्रीगणेश जी का विसर्जन भी किया जाता है, हर साल गणेश चतुर्थी पर बाप्पा के भक्त उन्हें अपने घर में बैठाकर अनंत चतुर्दशी के दिन विदा कर देते हैं। गणेश चतुर्थी का उत्सव पूरे १० दिन तक मनाया जाता है। दस दिन बाद गणपति के भक्त खुशहाली की कामना करते हुए ‘गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ कहते हुए गणेश जी को प्यार से अपने घर से विदा कर देते हैं। शास्त्रों के अनुसार गणेश चतुर्थी का त्यौहार पूरी श्रद्धा के साथ मनाने से व्यक्ति के घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। लेकिन क्या आप जानते हैं गणेश जी की पूजा-अर्चना ही नहीं गणपति विसर्जन का भी एक शुभ मुहूर्त और कुछ नियम होते हैं। जिसका पालन करने पर सालभर गणेश जी की कृपा अपने भक्तों पर बनी रहती है।
गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त-
अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन कभी भी किसी भी समय किया जा सकता है लेकिन विद्वानों के अनुसार इस बार सुबह ६ से ७ बजे और दोपहर १.३० से ३ बजे तक का समय प्रतिमा विसर्जन के लिए ठीक नहीं है। इसके अलावा आप किसी भी समय विसर्जन कर सकते हैं।
गणपति विसर्जन की पूजा विधि-
विसर्जन के दिन परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ मिलकर आरती करनी चाहिए। आरती में गणपति को ५ चीजें- दीप, फूल, धूप, सुगंध और नैवेद्य आदि चढ़ाए जाते हैं। आरती करने के बाद भगवान गणेश को भोग लगाया जाता है। भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों के बीच बांट दिया जाता है। आरती और प्रसाद के बाद परिवार का एक सदस्य एकदम धीरे-धीरे गणपति की मूर्ति को थोड़ा आगे बढ़ाता है। ऐसा घर से निकलने के ५ से १० मिनट पहले किया जाता है। ऐसा करना गणपति को इशारा करता है कि अब विसर्जन का समय आ गया है।