कचरे से बना ‘भाऊचा धक्का’

मुंबई को हिंदुस्थान की आर्थिक राजधानी होने के सम्मान के पीछे मुंबई बंदरगाह ही है। इसी वजह से दुनिया के नक्शे में मुंबई का महत्वपूर्ण स्थान है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मुंबई में एक समय कई प्रमुख बंदरगाह थे। सभी बंदरगाहों का अपने आप में एक खास महत्व था। हल्दी, धनिया, मिर्च-मसाले आदि एक बंदरगाह पर उतरते थे तो बांस, भवन निर्माण के काम में आनेवाली सामग्रियां- र्इंट, पत्थर, चूना, लकड़ियां आदि दूसरे बंदरगाह पर उतरती थीं। स्टीमर से यात्रा करनेवाले यात्रियों का आवागमन किसी अन्य बंदरगाह से होता था तो शाही व नामचीन मेहमानों का स्वागत और विदाई दूसरे बंदरगाह पर किया जाता था। मुंबई शहर के दक्षिणी कोने से शुरू होनेवाले बंदरगाहों की शृंखला मुंबई शहर की पूर्व दिशा से प्रारंभ होकर मरीन लाइंस-क्वींस नेकलेस समुद्र तट पर लाइन से अवस्थित थी। आज का अपोलो बंदर यानी हिंदुस्थान का प्रवेश द्वार कहा जानेवाला बंदरगाह (गेटवे ऑफ इंडिया) डेढ़ सौ साल पहले मुंबईकरों के लिए ‘पोलो बंदर’ के रूप में था। इस बंदरगाह से शाही मेहमानों का आवागमन होता था। यही मुंबई का सबसे पुराना बंदरगाह है।
‘भाऊचा धक्का’ दूसरे स्थान पर है। कर्नाक बंदरगाह और क्लेयर बंदरगाह ये दोनों बंदरगाह, मुंबई के कचरा ठेकेदार लक्ष्मण हरिश्चंद्र उर्फ ‘भाऊ’ ने कचरा फेंक-फेंककर बनाया। लिहाजा इन्हें ‘भाऊ’ नाम से पहचाना जाता है। आज का ‘भाऊचा धक्का’ भाऊ ने ही निर्मित करवाया था। दरअसल, मुंबई मनपा का समस्त कचरा इकट्ठा कर समुद्र के उसी किनारे पर भाऊ फेंकते थे। कुछ साल में वहां कचरे का पहाड़ खड़ा हो गया, तब भाऊ ने अपने खर्च से उसे समतल करवाकर उसे एक बंदरगाह का रूप दे दिया। गोवा, रत्नागिरी व नजदीकी इलाकों में समुद्री मार्ग से आवागमन करनेवाले यात्रियों के लिए इस बंदरगाह में उस समय तकरीबन ८-९ लाख रुपए का खर्च आया था, जिसे भाऊ ने स्वेच्छा से वहन किया। क्लेयर बंदर मुंबई के गवर्नर अर्ल
ऑफ क्लेयर (१८३१-३५) के कार्यकाल में तो कर्नाक बंदर सर जेम्स रिवेट कर्नाक (१८३९ से १८४१ के दौरान मुंबई के गवर्नर रहे) के कार्यकाल में निर्मित किया गया इसीलिए इसे उनका नाम दिया गया। इन दोनों बंदरगाहों पर गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि अनाज उतरते थे। इसके एवज में इनके निर्माता लक्ष्मण हरिश्चंद्र उर्फ भाऊ को सालाना ३-४ लाख रुपए की आय हो जाती थी। मुंबई शहर का कचरा इकट्ठा कर उन्हें डंप करने के कॉन्ट्रैक्ट के साथ भाऊ को मुंबई बंदरगाह पर उतरनेवाले सभी तंबाकू का ठेका भी मिला था। यह तंबाकू भाऊ के बीस-पच्चीस गोदामों में रखा जाता था। तब तंबाकू का होलसेल रेट ३ रुपए प्रति मन था। ३ रुपए और चुंगी की रकम भर दुकानदार तंबावूâ खुदरा बिक्री के लिए लाते थे। तंबाकू सिर्फ लाइसेंसी दुकानदारों को ही दी जाती थी, पर एक मन से कम तंबावूâ वे नहीं खरीद सकते थे, यह सरकारी आदेश था। उस समय के महत्वपूर्ण बंदरगाहों में तीसरा स्थान ‘बोरीबंदर’ का था, यानी आज का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस जहां पर है, उसी जगह था बोरीबंदर। पर बोरीबंदर में यात्रियों के उतरने और माल उतारने व बैलगाड़ियों के लिए कोई सुविधा नहीं थी। पूरा तट बड़े-बड़े पत्थरों से भरा था। यात्री गणों को एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर कूदना पड़ता था, इस प्रक्रिया में गिर जाने से यात्रियों को चोट भी लग जाती थी। अगर कभी दस-पंद्रह यात्रियों को एक साथ उतरना पड़ा तो ज्यादा आफत। पर मुंबई में उस समय भी जगह की कमी थी, इसलिए सरकार ने इस बंदरगाह को बनाने में १८५२ में हजारों रुपए खर्च कर एक ‘धक्का’ निर्मित कर ही डाला जिस पर से चार-पांच हजार यात्रियों का आवागमन होता था और कई लाख टन माल के भंडारण करने की भी सुविधा थी। सन् १८५३ में रेलवे के सारे साजो सामान व उपकरण और पानी के बड़े-बड़े नल व पाइपें इसी बंदरगाह पर उतारे जाते थे। सन् १८५३ तक यह बंदरगाह मुंबई के अन्य दूसरे बंदरगाहों की तुलना में ज्यादा सुख-सुविधाओं से लैस हो गया था। यहां पर जो भी जाता था, उसका मन यहां पर दो घड़ी रुकने का होता था। पूर्वाभिमुख इस बंदरगाह के पूरे परिसर को शाम के समय समुद्र से आती ठंडी हवाएं चूमती थीं। ऐसा सुरम्य परिसर तब मुंबई के किसी अन्य बंदरगाह का नहीं था, उस पर सोने में सुहागा यह कि सामने खानेरी हुनेरी, कान्हेरी गुफा, छिनाल टेकड़ी (जी हां, छिनाल टेकड़ी ही, दरअसल पुर्तगालियों ने एलीफेंटा की पहली बार खोज करने के बाद वहां से वापस आते समय छिनाल टेकड़ी पर निशानी के लिए झंडा-सिग्नल फहाराया था)। बोरीबंदर से सटा हुआ एक और बंदरगाह था ‘चिंचबंदर’। यहां पर चने, मटर व अन्य परचून सामान उतरता था। इसी चिंचबंदर की जगह आज कस्टम कमिश्नर का दफ्तर है।
(जारी…)