कच्छ की जान है मुंबई

मुलुंड, घाटकोपर, डोंबिवली, कांदिवली, वगैरह से मस्जिद स्टेशन पर उतरे कुछ लोगों के हाथ में आपने एक झोला जरूर देखा होगा। सुबह मस्जिद उतरते वक्त यह झोला खाली होता है, घर लौटते वक्त भरा। लोकल ट्रेन में आते-जाते गुजराती से मिलती किसी ‘लट्ठमार’ भाषा से भी पाला पड़ा होगा। ये सब कच्छी हैं। नवनीत ग्रुप, गणेश पापड़, ऐंकर स्विच, सत्यम कलेक्शन, बेंजर, अमरसंस, रूपमिलन, मारू, एशियाटिक, सम्राट रेस्टोरेंट, कच्छी बियर, दाबेली, कल्याण्ीजी-आनंदजी-ये नाम जो आपने सुने होंगे, या जिनसे आपका साबका तकरीबन रोज ही पड़ता होगा-ये भी कच्छी ही हैं।

कच्छी दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए, उसका मन कच्छ में ही बसा रहेगा। कंधार में हो या कनाडा में, किसी कच्छी से वह केवल कच्छी में ही बात करेगा और कुलदेवी के वंदन और विवाह, मुंडन, उपनयन जैसे संस्कार कच्छ ही जाकर करेगा। जिस तरह उसका मन कच्छ में बसा है, उसी तरह कच्छ ही जान हैं मुंबई में बसे कच्छी। कच्छियों ने बहुत बड़े पैमाने पर प्रगति भले नहीं की हो, पर खुशहाली के पैमाने पर वे देश के दूसरे समुदायों में ज्यादातर से आगे हैं। देश के हर भाग में आप कच्छियों को पा लेंगे। खेत जोतनेवाले किसान से लेकर सीमा पर सेना के जवान और शेयर मार्वेâट के दलाल से लेकर अपनी किराने शॉप के दुकानदार के रूप में। कच्छी आज सफलता के शिखर पर बैठे हैं, तो इसके पीछे कड़ी लगन, मेहनत, मिष्ठ भाषण की कला और मिलनसारिता के साथ उनके लंबे संघर्ष का सबसे बड़ा योगदान है।

कारोबारी समझ घुट्टी में-कच्छी मुख्यत: कारोबारी समुदाय है और उसकी पूंजी है कड़ी मेहनत और लगन। कंधों और सिर पर अनाज के बोरे लादकर दूसरी जगह और कई-कई मंजिल ऊपर पहुंचाना-मुंबई में आज जिसे ‘होम डिलिवरी’ कहते हैं कच्छियों की ही आरंभ की हुई है। अनाज से यह सफर शुरू करके कच्छियों ने रेडिमेड गार्मेंट, शूटिंग-शर्टिंग, साड़ी, पैâशन व ट्रेडिशनल वियर, स्टील, कटलरी, स्टेशनरी, प्लास्टिक, प्रॉविजन स्टोर, शो रूम, डिपार्टमेंटल स्टोर, प्रकाशन, होटल, उत्पादन, भवन निर्माण आदि जिस भी व्यापार-उद्योग में हाथ आजमाए, उसमें सिरमौर हो गए। अपनी कामयाबी में वे अपने मूल गांव-देश को भूले नहीं। माटुंगा की चंदावरकर रोड पर गुर्जर कुटीर उद्योग गरबे में ‌अति लोकप्रिय घाघरा और चणिया -चोली जैसे कच्छी परिधानों का सबसे बड़ा न सही, पर सबसे प्रामाणिक ठिकाना है। इसके संचालक नरेंद्र सेजपाल ने कारोबार का गुर समझाया, ‘दूसरे दुकानदार व्यापारियों से माल खरीदते हैं और हम सीधे कच्छ के कारीगरों से। हमारे पुराने ग्राहक भी इसीलिए हमारे साथ बने हुए हैं और हमारे वतन के लोग भी।’

 मुंबई पर टिकी है कच्छ की अर्थव्यवस्था
कच्छियों में व्यवसाय वृत्ति भौगोलिक विवशताओं से उपजी। कच्छ कभी एक संपन्न द्वीप हुआ करता था, जिसके सिंधु और सरस्वती के जलमार्गों के जरिए पंजाब से सीधे संपर्क थे। कच्छ के व्यापारियों ने समुद्र मार्ग से दूर देशों तक कारोबार करके ही वहां की संपन्नता की राह खोली थी। पर भूकंप ने कच्छ का समुद्र सुखा दिया। तीन ओर सागर से घिरे, दुर्गम रेगिस्तान धरती पर केवल खेती से गुजारा संभव नहीं थे, न थे परिवहन के साधनों के अभाव के कारण क्षेत्र में ही रहकर दूसरी जगह काम-धंधे के दूसरे अवसर। इसलिए कच्छ से बाहर जाकर रोजगार खोजना यहां के लोगों की मजबूरी हो गई। ऐसे में करीब सवा दो सौ वर्ष पहले परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए जीवराज बालु कपास भरे एक कोटिया जहाज से पहली बार मुंबई आए थे। मजदूरी और पानी पिलाने जैसे छोटे-मोटे काम करके उन्होंने ५०० रुपए जमा किए और अंग्रेज सरकार से एक नन्हा-सा कांट्रेक्ट हथिया लिया। यही छोटा सा कांट्रेक्ट बाद में उन्होंने अपनी खुद की मिल का साधन बना लिया।
कच्छियों की सफलता का सबसे बड़ा मंत्र था आपस में एका और आज भी है। व्यवसाय के थोड़ा पनपते ही वे कच्छ से अपने नाते-रिश्तेदारों और जाति भाइयों को बुला लेते। इस तरह थोड़ी-थोड़ी करते कच्छ की तकरीबन ७५ प्रतिशत आबादी मुंबई में आ बसी। धीरे-धीरे कच्छ मुंबई से आनेवाले मनीऑर्डरों पर निर्भर हो चला। मुंबई आनेवालों में सबसे पहले लोहाणा, भाटिया और दशा-वीशा ओसवाल जैन थे। आज कच्छी वीसा ओसवाल समुदाय आर्थिक रूप से मुंबई के समृद्धतम समुदायों में से है, बड़ी संख्या में जिसके लोग साहूकारी और दलाली के धंधों से जुड़े हुए हैं। कच्छी भाटिया, भट्टी व भाटी राजपूत आपको भारतीय सेना में अच्छी संख्या में मिलेंगे।
मुंबई या कहीं दूसरी जगह बस जानेवाले कच्छियों ने चाहे उन्हें वहां से आए कितना भी समय बीत गया हो पूर्वजों की धरती से नाता बनाकर रखा हुआ है। कच्छ की अर्थव्यवस्था आज भी कुल मिलाकर मुंबई से आए मनीऑर्डरों से ही पल रही है। कच्छ से पलायन अभी भी थमा नहीं है। रोजगार की तलाश में आनेवाले समाज के हजारों युवक डोंबिवली, नालासोपारा, जैसी दूर-दराज की बस्तियों में रहते हुए संघर्ष में जुटे हैं।

सादगी फितरत में
सादा खान-पान और सादगी फितरत में। ‘कच्छी माडु’ को षटरस व्यंजन नहीं, बाजरे की रोटी, गुड़ के लड्डू और मूंग दाल की खिचड़ी का सादा भोजन ही सुहाता है। हाथ से छोटे से छोटा काम करते उसे कभी संकोच नहीं होता। सादगी का आलम यह कि बाहर बहुत शूं-शां दिखनेवाले शख्स को आप घर में बनियाइन में फर्श पर पोंछा लगाते भी देख लेंगे।

सामाजिकता है ताकत
व्यवसाय बुद्धि के साथ आत्मविश्वास चरम पर होता है। इससे भी बढ़कर स्वाभिमान। विगत महीनों महाराष्ट्र के कई इलाकों में बाढ़ ने बहुत कहर मचाया, पर मुंबई सहित प्रदेश के कई क्षेत्रों से कच्छी वीसा ओसवाल डेरावासी महाजन, कच्छी वीसा ओसवाल स्थानकवासी महाजन, श्री कच्छी कहवा पाटीदार ट्रस्ट और कच्छी वीसा ओसवाल सेवा समाज सरीखे संगठनों के साथ समुदाय के लोगों ने अपने जाति भाइयों के लिए दिल के साथ थैलियों के मुंह खोल दिए। सांगली के व्यापारी हरीश लालन बताते हैं, ‘हमारा कारोबार तबाह हो गया था, ऐसे में हमें सबसे अधिक जरूरत कार्यशील पूंजी की थी। भाइयों के सहयोग से हमें इसकी भी कमी नहीं पड़ी।’ कच्छ आज भी अक्सर अकाल का मारा रहता है, फिर भी वहां हालत काबू से बाहर नहीं होते तो क्यों? मुंबई में मौजूद ‌इन्हीं हाथों की वजह से। मुंबई में बसे कच्छी केवल मनुष्यों की ही नहीं, पशुओं की भी मदद करते हैं। कच्छ ऐसा स्थान है, जहां जनधन से दोगुनी संख्या में पशुधन मौजूद है और दुष्काल में उनकी सांसत हो जाती है।
कच्छियों की सामाजिकता की परीक्षा होती है सुख-दु:ख के अवसर पर, जब वे तुरंत एकत्र हो जाते हैं। किसी समाज कार्य के लिए लाखों रुपए बैठे-बैठे, सिर्फ मोबाइल पर संपर्क से एकत्र कर लेना इस समुदाय के लिए बाएं हाथ का काम है। शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में ही नहीं, अकाल और प्राकृतिक आपदा जैसे संकट के मौकों पर भी दुनियाभर में पैâले जाति भाइयों से संपर्क में उनकी मदद करती है उनकी डॉयरेक्टरियां।

कच्छी महिलाओं में नई जागृति
आज कच्छी समुदाय संपन्नता के साथ आधुनिकता की दौड़ में किसी से पीछे नहीं। इनमें महिलाएं भी शामिल हैं। अल्पायु में ही शादी करके विदा कर दी जानेवाली समुदाय की लड़कियां अब वकालत और डॉक्टरी से लेकर मैनेजमेंट और पायलट तक की पढ़ाई के लिए विदेश जा रही हैं और पिता और पति के लकदम बिजनेस संभालते हुए शूटिंग, अभिनय, पत्रकारिता, नृत्य और शास्त्रीय संगीत तक में नाम कमा रही हैं।

कच्छी मुख्यत: बोलचाल की भाषा है, पर इसलिए साहित्य और कला जैसे क्षेत्रों की ओर पर्याप्त ध्यान अभी नहीं जा पाया है। मुख्यत: कारोबारी कौम होने के कारण कच्छी समुदाय इसमें कुछ पिछड़ गया है। शिक्षा के क्षेत्र को भी अभी यथोचित सम्मान नहीं मिल पाया है। इधर कुछ वर्षों से पिछले वर्षों में कुछ प्रगति जरूर नजर आ रही है। गुजराती व देवनागरी लिपियों में साहित्य सृजन भी हो रहा है। समुदाय में सेहत और फिटनेस के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है। श्री कच्छी जैन मंडल पिछले कई वर्षों से चेंबूर से मानखुर्द तक कच्छी मिनीथॉन आयोजित कर रहा है। ऐसे आयोजन महानगर के अन्य क्षेत्रों में भी हो रहे हैं। वागड़ महिला समाज ने समाज की महिलाओं के सामाजिक उत्कर्ष के लिए बहुत काम किया है। महावीर एजुकेशन ट्रस्ट यही काम शिक्षा के लिए कर रहा है।