कटोरा और खंजर

अधिकांश कांग्रेसवालों का ऐसा कहना है कि महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस से रिश्ता तोड़ देना चाहिए और प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी से युति करनी चाहिए। इस पर आंबेडकर ने तत्काल घोषणा कर दी है कि कांग्रेस के साथ आघाड़ी करनी है या नहीं, यह अभी कहा नहीं जा सकता। कांग्रेस को कुछ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। इन्हीं में से एक प्रमुख सवाल है कि लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के द्वारा लगाया गया आरोप ‘आंबेडकर-ओवैसी की वंचित आघाड़ी यह भारतीय जनता पार्टी की ‘बी’ टीम मतलब अंगवस्त्र है। कांग्रेस का वोट खाने के लिए ही ओवैसी-आंबेडकर ने उम्मीदवार खड़े किए हैं।’ ऐसा आरोप कांग्रेसवालों ने लगाया था। अब आंबेडकर कहते हैं कि ‘हम भाजपा की ‘बी टीम’ हैं या नहीं, कांग्रेस इसका खुलासा करे। उसके बाद हम तय करेंगे।’ वंचित आघाड़ी ने आठ-दस निर्वाचन क्षेत्रों में काफी वोट हासिल किए, जिसके कारण कांग्रेस के उम्मीदवार हारे और कुछ स्थानों पर राष्ट्रवादीवालों ने भाजपावालों की मदद की, ऐसा शिकायत भरा गीत कांग्रेसवाले गा रहे हैं। खुद अशोक चव्हाण और सुशील कुमार शिंदे की हार हुई। पुणे के ‘मावल’ में अजीत पवार के पार्थ का पहिया पराभव के कीचड़ में फंस गया। कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी ने पराभव का ठीकरा फोड़ने के लिए आंबेडकर-ओवैसी के सिर का चयन किया है। पूरे महाराष्ट्र में वंचितवालों को ४१ लाख वोट मिले। संभाजी नगर में वंचित का उम्मीदवार किसी तरह जीत गया। ये उसकी सफलता नहीं है। वहां एक ऐसा उम्मीदवार खड़ा हुआ जिसने हिंदुत्व से गद्दारी की इसीलिए संभाजी नगर पर पापी औरंग का हरा चीथड़ा लहराया। फिर भी प्रकाश आंबेडकर कहते हैं, वंचितों को मुसलमानों के वोट मिले नहीं, वो कांग्रेस को मिले। इसलिए वंचितों में इसके आगे मुसलमान आगे मुसलमान रहेंगे क्या, यह सवाल है। मुस्लिम समाज पर अब ‘एमआईएम’ या समाजवादी पार्टी का एकाधिकार नहीं रहा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने ६१ सीटों पर जीत हासिल की। उसमें मुस्लिम मतदाताओं का हिस्सा भी है। महाराष्ट्र में भी शिवसेना उम्मीदवारों को मुसलमानों के भारी वोट मिले हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मुसलमान ‘यादव’ नेताओं के पीछे नहीं गया और उसने राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल होने का समझदारी भरा निर्णय लिया। महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर के जिद्दी स्वभाव के चलते वंचित में दरार पड़ने की खबरें आ रही हैं। इसलिए ‘वंचित’ भी कांग्रेस-राष्ट्रवादी की तरह ही फूटे हुए बर्तन के समान ही है। महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के वोटों का आंकड़ा विरोधी दलों को अर्थी पर से श्मशान घाट ले जानेवाला है। विरोधियों में एकता भी नहीं है। विश्वास का माहौल भी नहीं है। उनका कोई नेता भी नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद परंपरागत अमेठी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव हार गए हैं। महाराष्ट्र में प्रदेशाध्यक्ष अशोक चव्हाण नांदेड में पराजित हुए। गांधी और चव्हाण ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया लेकिन उन पदों पर नई नियुक्तियां करने के लिए उन्हें कोई नहीं मिल रहा है इसी से उनके दल की दरिद्रता दिखाई देती है। उधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की भी कुछ अलग तस्वीर नहीं है। राज्य की जनता ने उन्हें भी चार सीटों तक ही रोक दिया है। पार्टी बचाने के लिए शरद पवार आज भी दर-दर भटक रहे हैं क्योंकि बाकी लोगों का जनमानस में स्थान ही नहीं बचा है। इस परिस्थिति में कांग्रेस पार्टी राष्ट्रवादी से तलाक लेकर वंचित आघाड़ी से ‘निकाह’ करे या राष्ट्रवादी कांग्रेस को टांग मारकर मनसेवालों के मंच पर जाकर बैठ जाए, इससे कोई फर्क पड़नेवाला है क्या? खुद प्रकाश आंबेडकर भी अकोला और सोलापुर जैसे दो निर्वाचन क्षेत्रों में पराजित हुए हैं। सच तो यह है कि आंबेडकर जब अकोला में लड़ रहे थे तो सोलापुर में आकर सुशील कुमार शिंदे को चुनौती देने की जरूरत नहीं थी और उधर संभाजी नगर में भी उत्पात और उन्माद ‘मचाने’ की आवश्यकता नहीं थी। इससे एक बात यह स्पष्ट हो जाती है कि विरोधियों को शिवसेना-भाजपा युति से मुकाबला नहीं करना है। उन्हें आपस में ही लड़ना है। कौरवों में ही युद्ध मचा है। विरोधियों के घर-घर में पैâली इस अराजकता को देखते हुए देश के लोकतंत्र की चिंता होनी स्वाभाविक है। मोदी फिर सत्ता में आए तो वे लोकतंत्र का गला घोंट देंगे, ऐसा कहनेवाले विरोधी ही एक-दूसरे का गला घोंटते हुए दिखाई दे रहे हैं। उसी का प्रदर्शन उत्तर प्रदेश और अब महाराष्ट्र में दिखाई दे रहा है। वंचित समाज की जनता को प्रकाश किरण दिखाने के लिए जिन्होंने आघाड़ी बनाई, वे विरोधी ही वंचित तथा शोषितों की कतार में कटोरा लेकर खड़े हैं। एक हाथ में कटोरा और दूसरे हाथ में खंजर। जब पीठ में खंजर घोंपने की प्रतियोगिता विरोधियों में शुरू है तो जनता उनसे क्या उम्मीद कर सकती है?